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शबे बराअत में क़ब्रिस्तान की ह़ाज़िरी का सुबूत

क़ब्रिस्तान की ह़ाज़िरी के 10 मसाइल*
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उम्मुल मोअमिनीन ह़ज़रते आ़इशा सिद्दीक़ा رَضِىَ اللّٰهُ تَعَالٰى عَنٔه‍َا फ़रमाती हैं: “मैने एक रात हुज़ूर, पुरनूर صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَئهِ وَ اٰلِهٖ وَسَلَّم को न देखा तो बक़ीए़ पाक (जन्नतुल बक़ी) में मुझे मिल गए, आप صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَئهِ وَ اٰلِهٖ وَسَلَّم ने मुझसे फ़रमाया:
🌹क्या तुम्हे इस बात का ड़र था कि अल्लाह عَزَّ وَجَلَّ और उसका रसूल صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَئهِ وَ اٰلِهٖ وَسَلَّم तुम्हारी ह़क़तलफ़ी करेंगे?
🌺मैने अ़र्ज़ की: या रसूलल्लाह صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَئهِ وَ اٰلِهٖ وَسَلَّم मैने ख़याल किया था कि शायद आप अज्वाज़े मुत़ह्हरात में से किसी के पास तशरीफ़ ले गए होंगे!
तो फ़रमाया:
🌹बेशक अल्लाह عَزَّ وَجَلَّ शाबान की 15वी रात आसमाने दुनिया पर तजल्ली फ़रमाता हैं, पस क़बीलए बनी कल्ब की बकरियों के बालों से भी ज़्यादा गुनाहगारों को बख़्श देता हैं”!
*📗(सुनने तिरमिज़ी, जिल्द-2, सफ़ह़ा-183, ह़दीस-739)*
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*🕌क़ब्रिस्तान की ह़ाज़िरी के 10 मसाइल🕌*
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*01-* नबिय्ये करीम, रऊफुर्रह़ीम صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَئهِ وَ اٰلِهٖ وَسَلَّم का फ़रमान हैं: 🌹मैने तुमको ज़ियारते क़ुबूर से मना किया था, अब तुम क़ब्रों की ज़ियारत करो कि वो दुनिया में बे रग़्बती का सबब हैं और आख़िरत की याद दिलाती हैं!
*📙(सुनने इब्ने माजा, जिल्द-2, सफ़ह़ा-252, ह़दीस-1571)*
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*02-* (वलिय्युल्लाह के मज़ार शरीफ़ या) किसी भी मुसलमान की क़ब्र की ज़ियारत को जाना चाहे तो मुस्तह़ब ये हैं कि पहले अपने मकान पर (ग़ैर मकरूह वक़्त में) दो रक्अ़त नफ़्ल पढ़े, हर रक्अ़त में सूरतुल फ़ातिह़ा के बाद एक बार आयतुल कुरसी और तीन बार सूरतुल इख़्लास पढ़े और इस नमाज़ का सवाब साह़िबे क़ब्र को पहुंचाए, अल्लाह عَزَّ وَجَلَّ उस फ़ौत शुदा बन्दे की क़ब्र में नूर पैदा करेगा और इस (सवाब पहुंचाने वाले) शख़्स को बहुत ज़्यादा सवाब अ़त़ा फ़रमाएगा!
*📘(फ़तावा आ़लमगीरी, जिल्द-5, सफ़ह़ा-350)*
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*03-* मज़ार शरीफ़ या क़ब्र की ज़ियारत के लिए जाते हुए रास्ते में फुज़ूल बातों में मश्ग़ूल न हो! *📕(ऐज़न)*
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*04-* क़ब्रिस्तान में उस आ़म रास्ते से जाए जहां माज़ी में कभी भी मुसलमानों की क़ब्रें न थी, जो रास्ता नया बना हुआ हो उस पर न चले!
“रद्दुल मुह़तार” में हैं: (क़ब्रिस्तान में क़ब्रें पाट कर) जो नया रास्ता निकाला गया हो उस पर चलना ह़राम हैं”!
*📔(रद्दुल मुह़तार, जिल्द-1, सफ़ह़ा-612)*
बल्कि नए रास्ते का सिर्फ़ गुमाने ग़ालिब हो तब भी उस पर चलना ना जाएज़ व गुनाह हैं!
*📓(दुर्रे मुख़्तार, जिल्द-3, सफ़ह़ा-183)*
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*05-* कईं मज़ाराते औ़लिया पर देखा गया हैं कि ज़ाइरीन की सुहूलत की ख़ातिर मुसलमानों की क़ब्रें मिस्मार (यानी तोड़ फोड़) कर के फ़र्श बना दिया जाता हैं, ऐसे फ़र्श पर लेटना, चलना, खड़ा होना, तिलावत और ज़िक्रो अज़्कार के लिए बैठना वग़ैरा ह़राम हैं, (अगर इस त़रह़ का मुआमला हो तो) दूर ही से फ़ातिह़ा पढ़ लीजिए!
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*06-* ज़ियारते क़ब्र मय्यित के मुवाजहा में (यानी चेहरे के सामने) खड़े हो कर हो और उस (यानी क़ब्र वाले) की पाइंती (यानी कदमों) की त़रफ़ से जाए कि उसकी निगाह के सामने हो, सिरहाने से न आए कि उसे सर उठा कर देखना पड़े!
*📗(फ़तावा रज़विय्या, मुख़र्रजा जिल्द-9, सफ़ह़ा-532)*
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*07-* क़ब्रिस्तान में इस त़रह़ खड़े हो कि क़िब्ले की त़रफ़ पीठ और क़ब्र वालों के चेहरों की त़रफ़ मुंह हो, इसके बाद कहिए:
*اَلسَّلَامُ عَلَئكُمٔ يَا اَهٔلَ الٔقُبُر يَغٔفِرُاللّٰهُ لَنَا وَلَكُمٔ اَنٔتُمٔ لَنَا سَلَفٌ وَّنَحنُ بِالٔاَثَر*
तरजमा- “ऐं क़ब्र वालों तुम पर सलाम हो, अल्लाह عَزَّ وَجَلَّ हमारी और तुम्हारी मग़्फ़िरत फ़रमाए, तुम हम से पहले आ गए और हम तुम्हारे बाद आने वाले हैं”!
*📙(फ़तावा आ़लमगीरी, जिल्द-5, सफ़ह़ा-350)*
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*08-* जो क़ब्रिस्तान में दाख़िल हो कर ये कहे:
*اَللّٰهُمَّ رَبَّ الٔاَجٔسَادِ الٔبَالِيَةِ وَالٔعِظَام النِّخِرَةِ الَّتِىٔ خَرَجَتٔ مِنَ الدُّنٔيَا وَهِىَ بِكَ مُؤمِنَةٌ اَدٔخِلٔ عَلَئهَا رَؤحًا مِّنٔ عِنٔدِكَ وَسَلَامًا مِّنِّىٔ*
तरजमा- “ऐं अल्लाह, (ऐं) गल जाने वालों जिस्मों और बोसीदा हड्डियों के रब, जो दुनिया से ईमान की ह़ालत में रुख़्सत हुए तू उन पर अपनी रह़मत और मेरा सलाम पहुंचा दे”!
तो ह़ज़रते सय्यिदुना आदम عَلَئهِ السَّلَام से लेकर इस वक़्त तक जितने मोमिन फ़ौत हुए सब उस (यानी दुआ़ पढ़ने वाले) के लिए दुआ़ए मग़्फ़िरत करेंगे!
*📘(मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबह, जिल्द-10, सफ़ह़ा-15)*
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*09-* शफ़ीए़ मुजरिमान صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَئهِ وَ اٰلِهٖ وَسَلَّم का फ़रमान हैं: 🌹जो शख़्स क़ब्रिस्तान में दाख़िल हुआ फिर उसने सूरतुल फ़ातिह़ा, सूरतुल इख़्लास और सूरतुत्तकासुर पढ़ी फिर ये दुआ़ मांगी- ‘या अल्लाह عَزَّ وَجَلَّ, मैने जो कुछ कुरआन पढ़ा उसका सवाब इस क़ब्रिस्तान के मोमिन मर्दों और मोमिन औ़रतों को पहुंचा’! तो वो तमाम मोमिन क़यामत के रोज़ इस (यानी ईसाले सवाब करने वाले) के सिफ़ारिशी होंगे”!
*📕(शरहुस्सुदूर, सफ़ह़ा-311)*
ह़दीसे पाक में हैं:🌹“जो ग्यारह बार सूरतुल इख़्लास यानी ‘क़ुल हू वल्लाहु अह़द’ (पूरी सूरत) पढ़ कर इसका सवाब मुर्दों को पहुंचाए, तो मुर्दों की गिनती के बराबर उसे (यानी ईसाले सवाब करने वाले को) सवाब मिलेगा”!
*📔(दुर्रे मुख़्तार, जिल्द-3, सफ़ह़ा-183)*
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*10-* क़ब्र के ऊपर अगरबत्ती न जलाई जाए इसमें सूए अदब (यानी बे अदबी) और बद फ़ाली हैं (और इससे मय्यित को तकलीफ़ होती हैं) हां अगर (ह़ाज़िरीन को) ख़ुश्बू (पहुंचाने) के लिए (लगाना चाहे तो) क़ब्र के पास खाली जगह हो वहां लगाए कि ख़ुश्बू पहुंचाना मह़बूब (यानी पसन्दीदा) हैं!
*📓(मुलख़स्सन फ़तावा रज़विय्या, मुख़र्रजा, जिल्द-9, सफ़ह़ा-482,525)

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Noor Aqsa

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