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सूरए बक़रह – अठ्ठारहवाँ रूकू

और एक के लिये तवज्जह की सम्त (दिशा) है कि वह उसी की तरफ़ मुंह करता है तो ये चाहो कि नेकियों में औरों से आगे निकल जाएं तुम कहीं हो अल्लाह तुम सब को इकट्ठा ले आएगा (1) बेशक अल्लाह जो चाहे करें(148) और जहां से आओ (2) अपना मुंह मस्जिदें हराम की तरफ़ करों और वह ज़रूर तुम्हारे कामों से ग़ाफ़िल नहीं (149) और ऐ मेहबूब तुम जहां से आओ अपना मुंह मस्जिदें हराम की तरफ़ करो और ऐ मुसलमानों तुम जहां कहीं हो अपना मुंह उसी की तरफ़ करो कि लोगों को तुमपर कोई हुज्जत (तर्क) न रहे(3) मगर जो उनमें ना इन्साफ़ी करें (4) तो उनसे न डरो और मुझसे डरो और यह इसलिये है कि मैं अपनी नेअमत (अनुकम्पा) तुमपर पूरी करूं और किसी तरह तुम हिदायत पाओ (150) जैसा हमने तुममें भेजा एक रसूल तुम में से (5) कि तुमपर हमारी आयतें तिलावत करता है (पढ़ता है) और तुम्हें पाक करता (6)
और किताब और पुख़्ता इल्म सिखाता है (7) और तुम्हें वह तालीम फ़रमाता है जिसकी तुम्हें जानकारी न थी (151) तो मेरी याद करो, मैं तुम्हारा चर्चा करूंगा (8) और मेरा हक़ मानो और मेरी नाशुक्री ना करो (152)
तफ़सीर : सूरए बक़रह – अठ्ठारहवाँ रूकू
(1) क़यामत के दिन सबको जमा फ़रमाएगा और कर्मों का बदला देगा. (2) यानी चाहे किसी शहर से सफ़र के लिये निकलो, नमाज़ में अपना मुंह मस्जिदे हराम (काबे) की तरफ़ करो. (3) और काफ़िर को यह ताना करने का मौक़ा न मिले कि उन्होंने क़ुरैश के विरोध में हज़रत इब्राहीम और इस्माईल अलैहिमस्सलाम का क़िबला भी छोड़ दिया जबकि नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उनकी औलाद में है और उनकी बड़ाई और बुज़ुर्गी को मानते भी हैं. (4) और दुश्मनी के कारण बेजा ऐतिराज़ करें. (5) यानी सैयदे आलम मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम. (6) नापाकी, शिर्क और गुनाहों से. (7) हिकमत से मुफ़स्सिरीन ने फ़िक़्ह मुराद ली है. (8) ज़िक्र तीन तरह का होता है (1) ज़बान से (2) दिल में (3) शरीर के अंगों से. जबानी ज़िक्र तस्बीह करना, पाकी बोलना और तारीफ़ करना वग़ैरह है. ख़ुत्बा, तौबा इस्तिग़फार, दुआ वग़ैरह इसमें आते हैं. दिल में ज़िक्र यानी अल्लाह तआला की नेअमतों को याद करना, उसकी बड़ाई और शक्ति और क्षमता में ग़ौर करना. उलमा जो दीन की बातों में विचार करते हैं, इसी में दाख़िल है. शरीर के अंगों के ज़रिये ज़िक्र यह है कि शरीर अल्लाह की फ़रमाँबरदारी में मशग़ूल हो, जैसे हज के लिये सफ़र करना, यह शारीरिक ज़िक्र में दाख़िल है. नमाज़ तीनों क़िस्मों के ज़िक्र पर आधारित है. तस्बीह, तकबीर, सना व क़ुरआन का पाठ तो ज़बानी ज़िक्र है. और एकाग्रता व यकसूई, ये सब दिल के ज़िक्र में है, और नमाज़ में खड़ा होना, रूकू व सिजदा करना वग़ैरह शारीरिक ज़िक्र है. इब्ने अब्बास रदियल्लाहो तआला अन्हुमा ने फ़रमाया, अल्लाह तआला फ़रमाता है तुम फ़रमाँबरदारी के साथ मेरा हुक्म मान कर मुझे याद करो, मैं तुम्हें अपनी मदद के साथ याद करूंगा. सही हदीस की किताबों में है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर बन्दा मुझे एकान्त में याद करता है तो मैं भी उसको ऐसे ही याद फ़रमाता हूँ और अगर वह मुझे जमाअत मे या सामूहिक रूप से याद करता है तो मैं उसको उससे बेहतर जमाअत में याद करता हूँ. क़ुरआन और हदीस में ज़िक्र के बहुत फ़ायदे आए हैं, और ये हर तरह के ज़िक्र को शामिल हैं, ऊंची आवाज़ में किये जाने वाले ज़िक्र भी और आहिस्ता किये जाने वाले ज़िक्र को भी.

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Shaheel Khan

As-salam-o-alaikum my selfshaheel Khan from india , Kolkatamiss Aafreen invite me to write in islamic blog i am very thankful to her. i am try to my best share with you about islam.
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