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सूरए बक़रह – इक्कीसवाँ रूकू

ऐ लोगों खाओ जो कुछ ज़मीन में (1) हलाल और पाकीज़ा है और शैतान के क़दम पर क़दम न रखो बेशक वह तुम्हारा खुला दुश्मन है (168) वह तो तुम्हें यही हुक़्म देगा बदी और बेहयाई का और यह कि अल्लाह पर वह बात जोड़ो जिसकी तुम्हें ख़बर नहीं (169) और जब उनसे कहा जाए अल्लाह के उतारे पर चलो (2) तो कहे बल्कि हम तो उसपर चलेंगे जिसपर अपने बाप दादा को पाया क्या अगरचे (यद्यपि) उनके बाप दादा न कुछ अक़्ल रखते हो न हिदायत(3)(170) और क़ाफिरों की कहावत उसकी सी है जो पुकारे ऐसे को कि ख़ाली चीख़ पुकार के सिवा कुछ न सुने (4) बहरे गूंगे अंधे तो उन्हें समझ नहीं (5)(171) ऐ ईमान वालो खाओ हमारी दी हुई सुथरी चीजें और अल्लाह का अहसान जानो अगर तुम उसी को पूजते हो (6) (172) उसने यही तुम पर हराम किये हैं मुर्दार (मृत) (7)और ख़ून (8) और सुअर का गोश्त (9) और वो जानवर जो ग़ैर ख़ुदा का नाम लेकर ज़िब्ह किया गया (10)
तो जो नाचार हो (11) न यूं कि ख़्वाहिश से खाए और न यूं कि ज़रूरत से आगे बढ़े तो उसपर गुनाह नहीं, बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (173) वो जो छुपाते हैं (12) अल्लाह की उतारी किताब और उसके बदले ज़लील क़ीमत ले लेते हैं(13) वो अपने पेट में आग ही भरते है (14) और अल्लाह क़यामत के दिन उनसे बात न करेगा और न उन्हें सुथरा करे और उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है (174) वो लोग है जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही मोल ली और बख़्शिश (इनाम) के बदले अज़ाब तो किस दर्जा उन्हें आग की सहार है(175)ये इसलिये कि अल्लाह ने किताब हक़ के साथ उतारी, और बेशक जो लोग किताब से इख़्तिलाफ (मतभेद) डालने लगे (15) वो ज़रूर पहले सिले के झगड़ालू हैं (176)
तफ़सीर : सूरए बक़रह – इक्कीसवाँ रूकू
(1) ये आयत उन लोगों के बारे में उतरी जिन्हों ने बिजार वग़ैरह को हराम क़रार दिया था. इससे मालूम हुआ कि अल्लाह तआला की हलाल फ़रमाई हुई चीज़ों को हराम क़रार देना उसकी रिज़्क़ देने वाली शक्ति से बग़ावत है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, अल्लाह तआला फ़रमाता है जो माल मैं अपने बन्दों को अता फ़रमाता हूं वह उनके लिये हलाल है. और उसी में है कि मैंने अपने बन्दों को बातिल से बेतअल्लुक पैदा किया, फिर उनके पास शैतान आए और उन्होंने दीन से बहकाया, और जो मैंने उनके लिये हलाल किया था, उसको हराम ठहराया. एक और हदीस में है, हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया मैंने यह आयत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सामने पढ़ी तो हज़रत सअद इब्ने अबी वक़्क़ास ने खड़े होकर अर्ज़ की, या रसूल्लल्लाह दुआ फ़रमाईये कि अल्लाह तआला मुझे मुस्तजाबुद दावत (यानी वह आदमी जिसकी हर दुआ अल्लाह क़ुबूल फ़रमाए) कर दे. हुज़ूर ने फ़रमाया ऐ सअद, अपनी ख़ुराक पाक करो, मुस्तजाबुद दावत हो जाओगे. उस ज़ाते पाक की क़सम जिसके दस्ते क़ुदरत में मुहम्मद की जान है, जो आदमी अपने पेट में हराम का लुक़मा डालता है, तो चालीस रोज़ तक क़ुबूलियत से मेहरूमी रहती है. (तफ़सीरे इब्ने कसीर) (2) तौहीद व क़ुरआन पर ईमान लाओ और पाक चीज़ों को हलाल जानो, जिन्हें अल्लाह ने हलाल किया. (3) जब आप दादा दीन की बातों को न समझते हों और सीधी राह पर न हों तो उनका अनुकरण करना मूर्खता और गुमराही है. (4) यानी जिस तरह चौपाए चरवाहे की सिर्फ़ आवाज़ ही सुनते हैं, कलाम के मानी नहीं समझते, यही हाल उन काफ़िरों का है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की आवाज़ को सुनते हैं, लेकिन उसके मानी दिल में बिठाकर आपके इरशाद से फ़ायदा नहीं उठातें. (5) यह इसलिये कि वो सच्ची बात सुनकर लाभ न उठा सके, सच्ची बात उनकी ज़बान पर जारी न हो सकी, नसीहतों से उन्होंने कोई फ़ायदा न उठाया.(6) इस आयत से मालूम हुआ कि अल्लाह तआला की नेअमतों पर शुक्र वाजिब है.(7) जो हलाल जानवर बग़ैर ज़िब्ह किये मर जाए या उसको शरई तरीक़े के ख़िलाफ़ मारा गया हो जैसे कि गला घोंट कर, या लाठी, पत्थर, ढेले, ग़ुल्ले, गोली मार कर हलाल किया गया हो, या वह गिरकर मर गया हो, या किसी जानवर ने सींग से मारा हो या किसी दरिन्दे ने हलाल किया हो, उसको मुर्दार कहतें. और इसी के हुक्म में दाख़िल है ज़िन्दा जानवर का वह अंग जो काट लिया गया हो. मुर्दार जानवर का खाना हराम है, मगर उसका पका हुआ चमड़ा काम में लाना और उसके बाल, सींग, हड्डी, -पट्ठे,— खुरी वग़ैरह से फ़ायदा उठाना जायज़ है. (तफ़सीर अहमदी)(8) ख़ून हर जानवर का हराम है, अगर बहने वाला हो. दूसरी आयत में फ़रमाया “ओ दमम मस्फ़ूहन” (यानी या रगों का बहता ख़ून या बद जानवर का गोश्त, वह नजासत है) (सूरए अनआम-145).(9) सुअर नजिसुल ऐन है, यानी अत्यन्त अपवित्र है, उसका गोश्त पोस्त, बाल, नाख़ुन वग़ैरह तमाम अंग नजिस, नापाक और हराम हैं. किसी को काम में लाना जायज़ नहीं. चूंकि ऊपर से खाने का बयान हो रहा है इसलिये यहाँ गोश्त के ज़िक्र को काफ़ी समझा गया.(10) जिस जानवर पर ज़िब्ह के वक़्त ग़ैर ख़ुदा का नाम लिया जाए, चाहे अकेले या ख़ुदा के नाम के साथ “और” मिलाकर, वह हराम है. और अगर ख़ुदा के नाम के साथ ग़ैर का नाम “और” कहे बिना मिलाया तो मकरूह है. अगर ज़िब्ह फ़क़त अल्लाह के नाम पर किया और उससे पहले या बाद में ग़ैर का नाम लिया, जैसे कि यह कहा अक़ीक़े का बकरा या वलीमे का दुम्बा या जिसकी तरफ़ से वह ज़बीहा है उसी का नाम लिया या जिन वलियों के लिये सवाब पहुंचाना मन्ज़ूर है, उनका नाम लिया, तो यह जायज़ है, इसमें कुछ हर्ज नहीं. (तफ़सीरे अहमदी)(11) “मुज़्तर” अर्थात नाचार वह है जो हराम चीज़ खाने पर मजबूर हो और उसको न खाने से जान जाने का डर हो, चाहे तो कड़ी भूक या नादारी के कारण जान पर बन जाए और कोई हलाल चीज़ हाथ न आए या कोई व्यक्ति हराम के खाने पर जब्र करता हो और उससे जान का डर हो. ऐसी हालत में जान बचाने के लिये हराम चीज़ का ज़रूरत भर यानी इतना खालेना जायज़ है कि मरने का डर न रहे.(12) यहूदियों के उलमा और सरदार, जो उम्मीद रखते थे कि आख़िरी ज़माने के नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उनमें से आएंगे. जब उन्होंने देखा कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम दूसरी क़ौम में से भेजे गए, तो उन्हें यह डर हुआ कि लोग तौरात और इंजील में हुज़ूर के गुण देखकर आपकी फ़रमाँबरदारी की तरफ़ झुक पडेंगे और उनके नज़राने, तोहफ़े, हदिये, सब बन्द हो जाएंगे, हुकूमत जाती रहेगी. इस ख़याल से उन्हें हसद पैदा हुआ और तौरात व इंजील में जो हुज़ूर की नअत और तारीफ़ और आपके वक़्ते नबुव्वत का बयान था, उन्होंने उसको छुपाया. इसपर यह मुबारक आयत उतरी. छुपाना यह भी है कि किताब के मज़मून पर किसी को सूचित न होने दिया जाए, न वह किसी को पढ़ के सुनाया जाए, न दिखाया जाए. और यह भी छुपाना है कि ग़लत मतलब निकाल कर मानी बदलने की कोशिश की जाए और किताब के अस्ल मानी पर पर्दा डाला जाए.(13) यानी दुनिया के तुच्छ नफ़े के लिये सत्य को छुपाते है.(14) क्योंकि ये रिश्वतें और यह हराम माल जो सच्चाई को छुपाने के बदले उन्होंने लिया है, उन्हें जहन्नम की आग में पहुंचाएगा.(15) यह आयत यहूदियों के बारे में उतरी कि उन्होंने तौरात में विरोध किया. कुछ ने उसको सच्चा कहा, कुछ ने बातिल, कुछ ने ग़लत सलत मतलब जोड़े, कुछ ने इबारत बदल डाली. एक क़ौल यह है कि यह आयत शिर्क करने वालों के बारे में नाज़िल हुई. उस सूरत में किताब से मुराद क़ुरआन है और उनका विरोध यह है कि उनमें से कुछ इसको शायरी कहते हैं, कुछ जादू, कुछ टोना टोटका.

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Shaheel Khan

As-salam-o-alaikum my selfshaheel Khan from india , Kolkatamiss Aafreen invite me to write in islamic blog i am very thankful to her. i am try to my best share with you about islam.
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