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सूरए बक़रह – उन्नीसवाँ रूकू

ऐ ईमान वालो सब्र और नमाज़ से मदद चाहो (1) बेशक अल्लाह साबिरों (सब्र करने वालों) के साथ है (153) और जो ख़ुदा की राह में मारे जाएं उन्हें मुर्दा न कहो(2) बल्कि वो ज़िन्दा हैं, हाँ तुम्हें ख़बर नहीं (3)(154) और ज़रूर हम तुम्हें आज़माएंगे कुछ डर और भूख से (4) और कुछ मालों और जानों और फलों की कमी से(5) और ख़ुशख़बरी सुना उन सब्र वालों को (155) कि जब उनपर कोई मुसीबत पड़े तो कहे हम अल्लाह के माल में है और हमको उसी की तरफ़ फिरना(6)(156) ये लोग हैं जिनपर उनके रब की दुरूदें हैं और रहमत, और यही लोग राह पर हैं (157) बेशक सफ़ा और मर्वा (पहाड़ियां) (7) अल्लाह के निशानों से हैं (8) तो जो उस घर का हज या उमरा करे उस पर कुछ गुनाह नहीं कि इन दोनों के फेरे करे (9) और जो कोई भली बात अपनी तरफ़ से करे तो अल्लाह नेकी का सिला (इनाम) देने वाला ख़बरदार है (158) बेशक वो हमारी उतारी हुई रौशन बातों और हिदायत को छुपाते हैं(10) बाद इसके कि लोगों के लिये हम उसे किताब में वाज़ेह (स्पष्ट) फ़रमा चुके उनपर अल्लाह की लअनत है और लअनत करने वालों की लअनत (11) (159) मगर वो जो तौबह करें और संवारे और ज़ाहिर करें तो मैं उनकी तौबह क़ुबूल फ़रमाऊंगा और मैं ही हूँ बड़ा तौबह क़ुबूल फ़रमाने वाला मेहरबान(160) बेशक वो जिन्हों ने कुफ़्र किया और क़ाफ़िर ही मरे उनपर लअनत है अल्लाह और फ़रिश्तों और आदमियों सबकी (12)(161) हमेशा रहेंगे उसमें न उनपर से अज़ाब हल्का हो और न उन्हें मोहलत दी जाएं (162)
तफ़सीर : सूरए बक़रह – उन्नीसवाँ रूकू
(1) हदीस शरीफ़ में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को जब कोई सख़्त या कड़ी मुहिम पेश आती तो नमाज़ में मशग़ूल हो जाते, और नमाज़ से मदद चाहने में बरसात की दुआ वाली नमाज़ और हाजत की दुआ वाली नमाज़ भी शामिल है. (2) यह आयत बद्र के शहीदों के बारे में उतरी. लोग शहीदों के बारे में कहते थे कि वह व्यक्ति मर गया. वह दुनिया की सहूलतों से मेहरूम हो गया. उनके बारे में यह आयत उतरी. (3) मौत के बाद ही अल्लाह तआला शहीदों को ज़िन्दगी अता फ़रमाता है. उनकी आत्माओं पर रिज़्क पेश किये जाते हैं, उन्हें राहतें दी जाती हैं, उनके कर्म जारी रहते हैं, सवाब और इनाम बढ़ता रहता है. हदीस शरीफ़ में है कि शहीदों की आत्माएं हरे परिन्दों के रूप में जन्नत की सैर करती हैं और वहाँ के मेवे और नेअमते खाती हैं. अल्लाह तआला के फ़रमाँबरदार बन्दों को क़ब्र में जन्नती नेअमतें मिलती हैं. शहीद वह सच्चा मुसलमान है जो तेज़ हथियार से ज़बरदस्ती मारा गया हो और क़त्ल से माल भी वाजिब न हुआ हो. या यु़द्ध में मुर्दा या ज़ख़्मी पाया गया हो, और उसने कुछ आसायश न पाई. उसपर दुनिया में यह अहकाम हैं कि उसको न नहलाया जाय, न कफ़न. अपने कपड़ों ही में रखा जाय. उसी तरह उसपर नमाज़ पढ़ी जाए, उसी हालत में दफ़्न किया जाए. आख़िरत में शहीद का बड़ा रूत्बा है. कुछ शहीद वो हैं कि उनपर दुनिया के ये अहकाम तो जारी नहीं होते, लेकिन आख़िरत में उनके लिए शहादत का दर्जा है, जैसे डूब कर या जलकर या दीवार के नीचे दबकर मरने वाला, इल्म की तलाश में या हज के सफ़र में मरने वाला, यानी ख़ुदा की राह में मरने वाला, ज़चमी के बाद की हालत में मरने वाली औरत, और पेट की बीमारी और प्लेग और ज़ातुल जुनुब और सिल की बीमारी और जुमे के दिन मरने वाले, वग़ैरह. (4) आज़मायश से फ़रमाँबरदार और नाफ़रमान के हाल का ज़ाहिर करना मुराद है. (5) इमाम शाफ़ई अलैहिर्रहमत ने इस आयत की तफ़सीर में फ़रमाया कि ख़ौफ़ से अल्लाह का डर, भूख से रमज़ान के रोज़े, माल की कमी से ज़कात और सदक़ात देना, जानों की कमी से बीमारियों से मौतें होना, फलों की कमी से औलाद की मौत मुराद है. इसलिये कि औलाद दिल का फल होते हैं. हदीस शरीफ़ में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जब किसी बन्दे का बच्चा मरता है, अल्लाह तआला फ़रिश्तों से फ़रमाता है तुमने मेरे बन्दे के बच्चे की रूह निकाली. वो अर्ज़ करते हैं, हाँ. फिर फ़रमाता है तुमने उसके दिल का फल ले लिया. अर्ज़ करते हैं, हाँ या रब. फ़रमाता है उसपर मेरे बन्दे ने क्या कहा? अर्ज़ करते हैं उसने तेरी तारीफ़ की और “इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजिऊन” (यानी हम अल्लाह की तरफ से है और उसीकी तरफ़ हमें लौटना है) पढ़ा, फ़रमाता है उसके लिये जन्नत में मकान बनाओ और उसका नाम बैतुल हम्द रखो. मुसीबत के पेश आने से पहले ख़बर देने में कई हिकमते हैं, एक तो यह कि इससे आदमी को मुसीबत के वक़्त सब्र आसान हो जाता है, एक यह कि जब काफ़िर देखें कि मुसलमान बला और मुसीबत के वक़्त सब्र, शुक्र और साबित क़दमी के साथ अपने दीन पर कायम रहता है तो उन्हें दीन की ख़ूबी मालूम हो और उसकी तरफ़ दिल खिंचे. एक यह कि आने वाली मुसीबत पेश आने से पहले की सूचना अज्ञात की ख़बर और नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का चमत्कार है. एक हिकमत यह कि मुनाफ़िक़ों के क़दम मुसीबत की ख़बर से उखड़ जाएं और ईमान वाले और मुनाफ़िक़ का फ़र्क़ मालूम हो जाए. (6) हदीस शरीफ़ में है कि मुसीबत के वक़्त “इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजिऊन” पढ़ना अल्लाह की रहमत लाता है. यह भी हदीस में है कि मूमिन की तकलीफ़ को अल्लाह गुनाह मिटाने का ज़रिया बना देता है.(7) सफ़ा और मर्वा मक्कए मुकर्रमा के दो पहाड़ हैं, जो काबे के सामने पूर्व की और स्थित हैं. मर्वा उत्तर की तरफ़ झुका हुआ और सफ़ा दक्षिण की तरफ़ जबले अबू क़ुबैस के दामन में है. हज़रत हाजिरा और हज़रत इस्माईल ने इन दोनों पहाड़ों के क़रीब उस मक़ाम पर जहाँ ज़मज़म का कुआँ है, अल्लाह के हुक्म से सुकूनत इख़्तियार की. उस वक़्त यह जगह पथरीली वीरान थी, न यहाँ हरियाली थी न पानी, न खाने पीने का कोई साधन. अल्लाह की खुशी के लिये इन अल्लाह के प्यारे बन्दों ने सब्र किया. हज़रत इस्माईल बहुत छोटे से थे, प्यास से जब उनकी हालत नाजुक हो गई तो हज़रत हाजिरा बेचैन होकर सफ़ा पहाड़ी पर तशरीफ़ ले गई. वहाँ भी पानी न पाया तो उतर कर नीचे के मैदान में दौड़ती हुई मर्वा तक पहुंचीं. इस तरह सात बार दोनों पहाड़ियों के बीच दौड़ीं और अल्लाह तआला ने “इन्नल्लाहा मअस साबिरीन” (अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है) का जलवा इस तरह ज़ाहिर फ़रमाया कि ग़ैब से एक चश्मा ज़मज़म नमूदार किया और उनके सब्र और महब्बत की बरकत से उनके अनुकरण में इन दोनों पहाड़ियों के बीच दौड़ने वालों को अपना प्यारा किया और इन दोनों जगहों को दुआ क़ुबूल होने की जगहें बनाया.(8) “शआइरिल्लाह” से दीन की निशानियाँ मुराद हैं, चाहे वो मकानात हों जैसे काबा, अरफ़ात, मुज़्दलिफ़ा, शैतान को कंकरी मारने की तीनों जगहें, सफ़ा, मर्वा, मिना मस्जिदें, या ज़माने जैसे रम़जान, ज़िलक़ाद, ज़िलहज्ज और मुहर्रम के महीने, ईदुल फ़ित्र, ईदुल अज़हा, जुमा, अय्यामे तशरीक़ यानी दस, ग्यारह, बारह, तेरह ज़िल हज्जा, या दूसरे चिन्ह जैसे अज़ान, अक़ामत, बा-जमाअत नमाज़, जुमे की नमाज़, ईद की नमाज़ें, ख़तना, ये सब दीन की निशानियाँ हैं. (9) इस्लाम से पहले के दिनों में सफ़ा और मर्वा पर दो मूर्तियाँ रखी थीं. सफ़ा पर जो मूर्ति थी उसका नाम असाफ़ था और जो मर्वा पर थी उसकानाम नायला था. काफ़िर जब सफ़ा और मर्वा के बीच सई करते या दौड़ते तो उन मूर्तियों पर अदब से हाथ फेरते. इस्लाम के एहद में बुत तो तोड़ दिये गए थे लेकिन चूंकि काफ़िर यहाँ शिर्क के काम करते थे इसलिये मुसलमानों को सफ़ा और मर्वा के बीच सई करना भारी लगा कि इसमें काफ़िरों के शिर्क के कामों के साथ कुछ मुशाबिहत है. इस आयत में उनका इत्मीनान फ़रमा दिया गया कि चूंकि तुम्हारी नियत ख़ालिस अल्लाह की इबादत की है, तुम्हें मुशाबिहत का डर नहीं करना चाहिये और जिस तरह काबे के अन्दर जाहिलियत के दौर में काफ़िरों ने मूर्तियाँ रखी थीं, अब इस्लाम के एहद में वो मूर्तियाँ उठा दी गई याँ काबे का तवाफ़ दुरूस्त रहा और वह दीन की निशानियों में से रहा, उसी तरह काफ़िरों की बुत परस्ती से सफ़ा और मर्वा के दीन की निशानी होने में कोई फ़र्क़ नहीं आया. सई (यानी सफ़ा और मर्वा के बीच दौड़ना) वाजिब है, हदीस से साबित है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हमेशा इसे किया है. इसे छोड़ देने से दम यानी क़ुर्बानी वाजिब हो जाती है. सफ़ा और मर्वा के बीच दौड़ना हज और उमरा दोनों में ज़रूरी है. फ़र्क़ यह है कि हज के अन्दर अरफ़ात में जाना और वहाँ से काबे के तवाफ़ के लिये आना शर्त है. और उमरे के लिये अरफ़ात में जाना शर्त नहीं. उमरा करने वाला अगर मक्का के बाहर से आए, उसका सीधे मक्कए मुकर्रमा में आकर तवाफ़ करना चाहिये और अगर मक्के का रहने वाला हो, तो उसको चाहिये कि हरम से बाहर जाए, वहाँ से काबे के तवाफ़ के लिये एहराम बाँधकर आए. हज व उमरा में एक फ़र्क़ यह भी है कि हज साल में एक ही बार हो सकता है, क्योंकि अरफ़ात में अरफ़े के दिन यानी ज़िलहज्जा की नौ तारीख़ को जाना, जो हज में शर्त है, साल में एक बार ही सम्भव हो सकता है. उमरा हर दिन हो सकता है, इसके लिये कोई वक़्त निर्धारित नहीं है. (10) यह आयत यहूदियों के उन उलमा के बारे में उतरी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नात शरीफ़ और आयते रज्म और तौरात के दूसरे आदेश छुपाया करते थे. यहाँ से मालूम हुआ कि दीन की जानकारी को ज़ाहिर करना फ़र्ज़ है. (11) लानत करने वालों से फ़रिश्ते और ईमान वाले लोग मुराद हैं. एक क़ौल यह है कि अल्लाह के सारे बन्दे मुराद हैं. (12) मूमिन तो काफ़िरों पर लानत करेंगे ही, काफ़िर भी क़यामत के दिन एक दूसरे पर लानत करेंगे. इस आयत में उन पर लानत फ़रमाई गई जो कुफ़्र पर मरे. इससे मालूम हुआ कि जिसकी मौत कुफ़्र पर मालूम हो, उसपर लानत करनी जायज़ है. गुनहगार मुसलमान पर तअय्युन के साथ लानत करना जायज़ नहीं. लेकिन अलल इतलाक़ जायज़ है, जैसा कि हदीश शरीफ़ में चोर और सूद ख़ौर वग़ैरह पर लानत आई है.(13) काफ़िरों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा, आप अपने रब की शान और सिफ़त बयान कीजिये. इसपर यह आयत उतरी और उन्हें बता दिया गया कि मअबूद सिर्फ़ एक है न उसके टुकडे हो सकते हैं, न उसको बाँटा जा सकता है, न उसके लिये मिस्ल न नज़ीर. पूजे जाने और रब होने के मामले में कोई उसका शरीक नहीं, वह यकता है, अपने कामों में. चीज़ों को तनहा उसीने बनाया, वह अपनी ज़ात में अकेला है, कोई उसका जोड़ नहीं. अपनी विशेषताओं और गुणों में वह यगाना है, कोई उस जैसा नहीं. अबूदाऊद और तिरमिज़ी की हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह तआला का इस्में आज़म इन दो आयतों में है. एक यही आयत “व इलाहोकुम” दूसरी “अलिफ़ लाम मीम अल्लाहो लाइलाहा इल्लाहुवा…

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Shaheel Khan

As-salam-o-alaikum my selfshaheel Khan from india , Kolkatamiss Aafreen invite me to write in islamic blog i am very thankful to her. i am try to my best share with you about islam.
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