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सूरए बक़रह – पंद्रहवाँ रूकू

ऐ यअक़ूब की सन्तान, याद करो मेरा एहसान जो मैं ने तुमपर किया और वह जो मैंने उस ज़माने के सब लोगों पर तुम्हें बड़ाई दी (122) और डरो उस दिन से कि कोई जान दूसरे का बदला न होगी और न उसको कुछ लेकर छोड़े और न क़ाफ़िर को कोई सिफ़ारिश नफ़ा दे (1) और न उनकी मदद हो (123) और जब (2) इब्राहिम को उसके रब ने कुछ बातों से आज़माया (3) तो उसने वो पूरी कर दिखाई (4) फ़रमाया मैं तुम्हें लोगों का पेशवा बनाने वाला हूँ अर्ज़ की मेरी औलाद से, फ़रमाया मेरा एहद ज़ालिमों को नहीं पहुंचता (5) (124) और याद करो जब हमने उस घर को (6) लोगों के लिये मरजअ (शरण स्थल) और अमन बनाया (7) और इब्राहीम के खड़े होने की जगह को नमाज़ का मक़ाम बनाओ (8) और हमने ताक़ीद फ़रमाई इब्राहीम व इस्माईल को कि मेरा घर ख़ूब सुथरा करो तवाफ़ वालो (परिक्रमा वालों) और एतिक़ाफ़ वालों (मस्जिद में बैठने वालों) और रूकू व सिजदे वालों के लिये (125) और जब अर्ज़ की इब्राहीम ने कि ऐ मेरे रब इस शहर को अमान वाला कर दे और इसके रहने वालों को तरह तरह के फलो से रोज़ी दे जो उनमें से अल्लाह और पिछले दीन पर ईमान लाएं (9)
फ़रमाया और जो क़ाफिर हुआ थोड़ा बरतने को उसे भी दूंगा फिर उसे दोज़ख़ के अज़ाब की तरफ़ मजबूर कर दूंगा और वह बहुत बुरी जगह पलटने की की (126) और जब उठाता था इब्राहीम उस घर की नींव और इस्माईल यह कहते हुए ऐ रब हमारे हम से क़ुबूल फ़रमा(10) बेशक तू ही है सुनता जानता (127) ऐ रब हमारे और कर हमें तेरे हुज़ूर गर्दन रखने वाला (11) और हमारी औलाद में से एक उम्मत (जन समूह) तेरी फ़रमाँबरदार (आज्ञाकारी) और हमें हमारी इबादत के क़ायदे बता और हम पर अपनी रहमत के साथ रूजू (तवज्जुह) फ़रमा (12) बेशक तू ही है बहुत तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान (128) ऐ रब हमारे और भेज उनमें (13) एक रसूल उन्हीं में से कि उन्हें तेरी आयतें तिलावत फ़रमाए और उन्हें तेरी किताब (14) और पुख़्ता (पायदार) इल्म सिखाए (15) और उन्हें ख़ूब सुथरा फ़रमा दे (16) बेशक तू ही है ग़ालिब हिक़मत वाला (129)
तफ़सीर : सूरए बक़रह – पंद्रहवाँ रूकू
(1) इसमें यहूदियों का रद है जो कहते थे हमारे बाप दादा बुजु़र्ग गुज़रे है, हमें शफ़ाअत (सिफ़ारिश) करने छु़ड़वा लेंगे. उन्हें मायूस किया जाता है कि शफ़ाअत काफ़िर के लिये नहीं.
(2) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की पैदाइश अहवाज़ क्षेत्र में सूस रुथान पर हुई फिर आपके वालिद आपको नमरूद के मुल्क बाबुल में ले आए.यहूदि और ईसाई और अरब के मु्श्रिक सब आपकी बुजु़र्गी मानते और आपकी नस्ल में होने पर गर्व करते हैं. अल्लाह तआला ने आपके वो हालात बयान फ़रमाए जिनसे सब पर इस्लाम क़ुबूल करना लाज़िम हो जाता है, क्योंकि जो चीज़ें अल्लाह तआला ने आप पर वाजिब कीं वो इस्लाम की विशेषताओं में से हैं. (3) खु़दाई आज़माइश यह है कि बन्दे पर कोई पाबन्दी लाज़िम फ़रमाकर दूसरों पर उनके खरे खोटे होने का इज़हार कर दे. (4) जो बातें अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर आज़माइश के लिये वाजिब की थीं, उनमें तफसीर करने वालों के चन्द कौ़ल है. क़तादा का कहना है कि वो हज के मनासिक है. मुजाहिद ने कहा इससे वो दस चीज़ें मुराद है जो अगली आयतों में बयान की गई हैं. हज़रत इब्ने अब्बास का एक कौ़ल यह है कि वे दस चीज़ें ये हैं, मूंछें कतरवाना , कुल्ली करना, नाक में सफा़ई के लिये पानी इरुतेमाल करना, मिरुवाक करना, सर में मांग मिकालना, नाख़ुन तरशवाना, बग़ल के बाल दूर करना, पेडू के नीचे की सफ़ाई, ख़तना, पानी से इरुतंजा करना. ये सब चीज़ें हज़रत इब्राहीम पर वाजिब थीं और हम पर उनमें से कुछ वाजिब हैं. (5) यानी आपकी औलाद में जो ज़ालिम (काफ़िर) हैं वो इमारत की पदवी न पाएंगे. इससे मालूम हुआ कि काफ़िर मुसलमानों का पेशवा नहीं हो सकता और मुसलमानों को उसका अनुकरण जायज़ नहीं. (6) बैत से काबा शरीफ़ मुराद है और इसमें तमाम हरम शरीफ़ दाख़िल है.(7) अम्न बनाने से यह मुराद है कि हरमे काबा में क़त्ल व लूटमार हराम है या यह कि वहाँ शिकार तक को अम्न है. यहाँ तक कि हरम शरीफ़ में शेर भेड़िये भी शिकार का पीछा नहीं करते, छोड़ कर लौट जाते हैं. एक क़ौल यह है कि ईमान वाला इसमें दाख़िल होकर अज़ाब से सुरक्षित हो जाता है. हरम को हरम इसलिये कहा जाता है कि उसमें क़त्ल, ज़ुल्म, शिकार हराम और मना है. (अहमदी) अगर कोई मुजरिम भी दाख़िल हो जाए तो वहाँ उसपर हाथ न डाला जाएगा. (मदारिक)(8) मक़ामे इब्राहीम वह पत्थर है जिसपर खड़े होकर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने काबए मुअज़्ज़मा की बिना फ़रमाई और इसमें आपके क़दम मुबारक का नशान था. उसको नमाज़ का मक़ाम बनाने का मामला महबबत के लिये है. एक कौ़ल यह भी है कि इस नमाज़ से तवाफ़ की दो रकअतें मुराद हैं. (अहमदी वग़ैरह)(9) चूंकि इमारत के बारे में “ला यनालो अहदिज़ ज़ालिमीन” (यानी मेरा एहद ज़ालिमों को नहीं पहुंचता)इरशाद हो चुका था, इसलिये हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने इस दुआ में ईमान वालों को ख़ास फ़रमाया और यही अदब की शान थी. अल्लाह ने करम किया. दुआ क़ुबूल हुई और इरशाद फ़रमाया कि रिज़्क़ सब को दिया जाएगा, ईमान वालो को भी, काफ़िर को भी. लेकिन काफ़िर का रिज़्क़ थोड़ा है, यानी सिर्फ दुनियावी ज़िनदगी में वह फ़ायदा उठा सकता है.(10) पहली बार काबए मुअज़्ज़मा की बुनियाद आदम अलैहिस्सलाम ने रखी और तूफाने नूह के बाद फिर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उसी बुनियाद पर तामीर फ़रमाई . यह तामीर ख़ास आपके मुबारक हाथ से हुई. इसके लिये पत्थर उठाकर लाने की ख़िदमत और सआदत इरुमाईल अलैहिस्सलाम को प्राप्त हुई. दोनों हज़रात ने उस वक्त यह दुआ की कि या रब हमारी यह फ़रमाँबरदारी और ख़िदमत क़ुबूल फ़रमा.(11) वो हज़रत अल्लाह तआला के आज्ञाकारी और मुख़लिस बन्दे थे, फिर भी यह दुआ इसलिये है कि ताअत और इख़लास में और ज़्यादा कमाल की तलब रखतें हैं. ताअत का ज़ौक़ सेर नहीं होता, सुब्हानल्लाह ,हर एक की फ़िक्र उसकी हिम्मत पर है.(12) हज़रत इब्राहीम और हज़रत इरुमाईल अलैहिस्सलाम मासूम हैं. आपकी तरफ़ तो यह तवाज़ो है और अल्लाह वालों के लिये तालीम है. यह मक़ाम दुआ की क़ुबूलियत की जगह है, और यहाँ दुआ और तौबह हज़रत इब्राहीम की सु्न्नत है.(13) यानी हज़रत इब्राहीम और हज़रत इरुमाईल अलैहिस्सलाम की ज़ुर्रियत में यह दुआ सैयदुल अम्बिया सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिये थी, यानी काबए मुअज़्ज़मा की तामीर की अज़ीम ख़िदमात बजा लाने के लिये और तौबह और प्रायश्चित करने के बाद हज़रत इब्राहीम और हज़रत इरुमाईल ने यह दुआ की, कि या रब, अपने मेहबूब नबीये आख़िरूज़्ज़माँ सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हमारी नरुल में प्रकट फ़रमा और यह बुज़ुर्गी हमें इनायत कर. यह दुआ क़ुबूल हुई और उन दोनों साहिबों की नरुल में हुज़ूर के सिवा कोई नबी नहीं हुआ, औलादे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम में बाक़ी तमाम नबी हज़रत इसहाक़ की नरुल से हैं. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपना मीलाद शरीफ़ ख़ुद बयान किया. इमाम बग़वी ने एक हदीस रिवायत की, कि हुज़ूर ने फ़रमाया मैं अल्लाह तआला के नज़्दीक ख़ातिमुन नबिय्यीन लिखा हुआ था. उस वक़्त भी जब हज़रत आदम के पुतले का ख़मीर हो रहा था. मैं तुम्हें अपनी शुरूआत की ख़ूर दूँ. मैं इब्राहीम की दुआ हूँ. ईसा की ख़ुशख़बरी हूँ, अपनी वालिद के उस ख़्वाब की ताबीर हूँ जो उन्होंने मेरी पैदाइश के वक़्त देखा और उनके लिये एक चमकता नूर ज़ाहिर हुआ जिससे मुल्के शाम के महल उनके लिये रौशन हो गए. इस हदीस में इब्राहीम की दुआ से यही दुआ मुराद है जो इस आयत में दी गई है. अल्लाह तआला ने यह दुआ क़ुबूल फ़रमाई और आख़िर ज़माने में हुज़ूर सैयदे अम्बिया मुहम्मदे मुरुतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अपना आख़िरी रसूल बनाकर भेजा. यह हम पर अल्लाह का एहसान है. (जुमल व ख़ाज़िन)(14) इस किताब से क़ुरआने पाक और इसकी तालीम से इसकी हक़ीक़तों और मानी का सीखना मुराद है.(15) हिकमत के मानी में बहुत से अक़वाल हैं. कुछ के नज़्दीक हिकमत से फ़िक़्ह मुराद है. कतादा का कहना है कि हिकमत सुन्नत का नाम है. कुछ कहते हैं कि हिकमत अहकाम के इल्म को कहते हैं. खुलासा यह कि हिकमत रहरुयों की जानकारी का नाम है.(16) सुथरा करने के मानी यह हैं कि नफ़्स की तख़्ती और आत्मा को बराईयों से पाक करके पर्दे उठा दें और क्षमता के दर्पण को चमका कर उन्हें इस क़ाबिल करदें कि उनमें हक़ीक़तों की झलक नज़र आने लगे.

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Noor Saba

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