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सूरए बक़रह – सत्तरहवाँ रूकू

अब कहेंगे (1) बेवकूफ़ लोग किसने फेर दिया मुसलमानों को, उनके इस क़िबले से, जिसपर थे (2) तुम फ़रमा दो कि पूरब और पश्चिम सब अल्लाह ही का है (3) जिसे चाहे सीधी राह चलाता है (142) और बात यूं ही है कि हमने तुम्हें किया सब उम्मतों से अफ़ज़ल, कि तुम लोगों पर गवाह हो(4) और ये रसूल तुम्हारे निगहबान और गवाह(5) और ऐ मेहबूब तुम पहले जिस क़िबले पर थे हमने वह इसी लिये मुक़र्रर (निश्चित) किया था कि देखें कौन रसूल के पीछे चलता है और कौन उल्टे पांव फिर जाता है dewbondi ulma ne is tarzume me likha he ALLAH Jaan lee kon RasoolAllah k peeche chalta he Jo ALLAH K ilam gaiyab ka inqar he dekhne or Janne me farq hota he (6) और बेशक यह भारी थी मगर उनपर, जिन्हें अल्लाह ने हिदायत की, और अल्लाह की शान नहीं कि तुम्हारा ईमान अकारत करे(7) बेशक अल्लाह आदमियों पर बहुत मेहरबान, मेहर (कृपा) वाला है और (143) हम देख रहे हैं बार बार तुम्हारा आसमान की तरफ़ मुंह करना (8) तो जरूर हम तुम्हें फेर देंगे उस क़िबले की तरफ़ जिसमें तुम्हारी ख़ुशी है अभी अपना मुंह फेर दो मस्जिदे हराम की तरफ़, और ऐ मुसलमानों तुम जहां कहीं हो अपना मुंह उसी की तरफ़ करो(9) और वो जिन्हें किताब मिली है ज़रूर जानते है कि यह उनके रब की तरफ़ से हक़ है (10) और अल्लाह उनके कौतुकों से बेख़बर नहीं (144) और अगर तुम उन किताबियों के पास हर निशानी लेकर आओ वो तुम्हारे क़िबले की पैरवी (अनुकरण) न करेंगे (11) और न तुम उनके क़िबले की पैरवी करो (12) और आपस में एक दूसरे के क़िबले के ताबे(फ़रमाँबरदार) नहीं (13) और ( ऐ सुनने वाले जो कोई भी हो ) अगर तू उनकी ख़्वाहिशों पर चला बाद इसके कि तुझे इल्म मिल चुका तो उस वक़्त तू ज़रूर सितमगार (अन्यायी) होगा (145) जिन्हें हमने किताब अता फ़रमाई (14) वो उस नबी को ऐसा पहचानते हैं जैसे आदमी अपने बेटों को पहचानता है (15) और बेशक उनमें एक गिरोह (समूह) जान बूझकर हक़ (सच्चाई) छुपाते हैं (16)(146) ( ऐ सुनने वाले) ये सच्चाई है तरे रब की तरफ़ से (या सच्चाई वही है जो तेरे रब की तरफ़ से हो) तो ख़बरदार तू शक ना करना (147)
दूसरा पारा : सयक़ूल तफ़सीर :
सूरए बक़रह – सत्तरहवाँ रूकू
(1) यह आयत यहूदियों के बारे में नाज़िल हुई, जब बैतुल मक़दिस की जगह काबे को क़िबला बनाया गया. इस पर उन्होंने ताना किया क्योंकि उन्हें यह नागवार था और वो स्थगन आदेश के क़ायल न थे. एक क़ौल पर, यह आयत मक्के के मुश्रिकों के और एक क़ौल पर, मुनाफ़िक़ों के बारे में उतरी और यह भी हो सकता है कि इससे काफ़िरों के ये सब गिरोह मुराद हों, क्योंकि ताना देने और बुरा भला कहने में सब शरीक थे. और काफ़िरों के ताना देने से पहले क़ुरआने पाक में इसकी ख़बर दे देना ग़ैबी ख़बरों में से है. तअना देने वालों को बेवक़ूफ़ इसलिये कहा गया कि वो निहायत खुली बात पर ऐतिराज करने लगे जबकि पिछले नबीयों ने आपका लक़ब “दो क़िबलों वाला” बताया भी था और क़िबले का बदला जाना ख़बर देते आए. ऐसे रौशन निशान से फ़ायदा न उठाया और ऐतिराज किये जाना परले दर्जे की मुर्खता है.(2) क़िबला उस दिशा को कहते हैं जिसकी तरफ़ आदमी नमाज़ में मुंह करता है. यहाँ क़िबला से बैतुल मक़दिस मुराद है.(3) उसे इख़्तियार है जिसे चाहे क़िबला बनाए. किसी को ऐतिराज का क्या हक़. बन्दे का काम फ़रमाँबरदारी है.(4) दुनिया और आख़िरत में. दुनिया में तो यह कि मुसलमान की गवाही ईमान वाले और काफ़िर सबके हक़ में शरई तौर से भरोसे वाली है और काफ़िर की गवाही मुसलमान पर माने जाने के क़ाबिल नहीं. इससे यह भी मालूम हुआ कि किसी बात पर इस उम्मत की सर्वसहमति अनिवार्य रूप से क़ुबूल किय जाने योग्य है. गुज़रे लोगों के हक़ में भी इस उम्मत की गवाही मानी जाएगी. रहमत और अज़ाब के फ़रिश्ते उसके मुताबिक अमल करते हैं. सही हदीस की किताबों में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सामने एक जनाज़ा गुज़रा. आपके साथियों ने उसकी तारीफ़ की. हुज़ूर ने फ़रमाया “वाजिब हुई”. फिर दूसरा जनाज़ा गुज़रा. सहाबा ने उसकी बुराई की. हुज़ूर ने फ़रमाया “वाजिब हुई”. हज़रत उमर ने पूछा कि हुज़ूर क्या चीज़ वाजिब हुई? फ़रमाया : पहले जनाज़े की तुमने तारीफ़ की, उसके लिये जन्नत वाजिब हुई. दूसरे की तुमने बुराई की, उसके लिये दोज़ख वाजिब हुई. तुम ज़मीन में अल्लाह के गवाह हो. फिर हुज़ूर ने यह आयत तिलावत फ़रमाई. ये तमाम गवाहियाँ उम्मत के नेक और सच्चे लोगों के साथ ख़ास हैं, और उनके विश्वसनीय होने के लिये ज़बान की एहतियात शर्त है. जो लोग ज़बान की एहतियात नहीं करते और शरीअत के ख़िलाफ़ बेजा बातें उनकी ज़बान से निकलती हैं और नाहक़ लानत करते हैं, सही हदीस की किताबों में है कि क़यामत के दिन न वो सिफ़ारिशी होंगे और न गवाह. इस उम्मत की एक गवाही यह भी है कि आख़िरत में जब तमाम अगली पिछली उम्मतें जमा होंगी और काफ़िरों से फ़रमाया जाएगा, क्या तुम्हारे पास मेरी तरफ़ से डराने और निर्देश पहुंचाने वाले नहीं आए, तो वो इन्कार करेंगे और कहेंगे कोई नहीं आया. नबियों से पूछा जाएगा, वो अर्ज़ करेंगे कि ये झूटे हैं, हमने इन्हें तेरे निर्देश बताए. इस पर उनसे दलील तलब की जाएगी. वो अर्ज़ करेंगे कि हमारी गवाह उम्मते मुहम्मदिया है. ये उम्मत पैग़म्बरों की गवाही देगी कि उन हज़रात ने तबलीग़ फ़रमाई. इस पर पिछली उम्मतों के काफ़िर कहेंगे, इन्हें क्या मालूम, ये हमसे बाद हुए थे. पूछा जाएगा तुम कैसे जानते हो. ये अर्ज़ करेंगे, या रब तूने हमारी तरफ़ अपने रसूल मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को भेजा, क़ुरआन पाक उतारा, उनके ज़रिये हम क़तई यक़ीनी तौर पर जानते हैं कि नबियों ने तबलीग़ का फ़र्ज़ भरपूर तौर से अदा किया. फिर नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से आपकी उम्मत के बारे में पूछा जाएगा. हुजू़र उनकी पुष्टि फ़रमाएंगे. इससे मालूम हुआ कि जिन चीज़ों की यक़ीनी जानकारी सुनने से हासिल हो उसपर गवाही दी जा सकती है.(5) उम्मत को तो रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बताए से उम्मतों के हाल और नबियों की तबलीग़ की क़तई यक़ीनी जानकारी है और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अल्लाह के करम से नबुव्वत के नूर के ज़रिये हर आदमी के हाल और उसके ईमान की हक़ीक़त और अच्छे बुरे कर्मों और महब्बत व दुश्मनी की जानकारी रखते हैं. इसीलिये हुज़ूर की गवाही दुनिया में शरीअत के हुक्म से उम्मत के हक़ में मक़बूल है. यही वजह है कि हुज़ूर ने अपने ज़माने के हाज़िरीन के बारे में जो कुछ फ़रमाया, जैसे कि सहाबा और नबी के घर वालों की बुज़ुर्गी और बड़ाई, या बाद वालों के लिये, जैसे हज़रत उवैस और इमाम मेहदी वग़ैरह के बारे में, उस पर अक़ीदा रखना वाजिब है. हर नबी को उसकी उम्मत के कर्मों की जानकारी दी जाती है. ताकि क़यामत के दिन गवाही दे सकें चूंकि हमारे नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की गवाही आम होगी इसलिये हुज़ूर तमाम उम्मतों के हाल की जानकारी रखते हैं. यहाँ शहीद का मतलब जानकार भी हो सकता है, क्योंकि शहादत का शब्द जानकारी और सूचना के लिये भी आया है. अल्लाह तआला ने फ़रमाया “वल्लाहो अला कुल्ले शैइन शहीद” यानी और अल्लाह हर चीज़ की जानकारी रखता है. (सूरए मुजादलह, आयत 6)(6) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पहले काबे की तरफ़ नमाज़ पढ़ते थे. हिजरत के बाद बैतुल मक़दिस की तरफ़ नमाज़ पढ़ने का हुक्म हुआ. सत्तरह महीने के क़रीब उस तरफ़ नमाज़ पढ़ी. फिर काबा शरीफ़ की तरफ़ मुंह करने का हुक्म हुआ. क़िबला बदले जाने की एक वजह यह बताई गई कि इससे ईमान वाले और काफ़िर में फ़र्क़ और पहचान साफ़ हो जाएगी. चुनान्वे ऐसा ही हुआ.
(7) बैतुल मक़दिस की तरफ़ नमाज़ पढ़ने के ज़माने में जिन सहाबा ने वफ़ात पाई उनके रिश्तेदारों ने क़िबला बदले जाने के बाद उनकी नमाज़ो के बारे में पूछा था, उसपर ये आयत उतरी और इत्मीनान दिलाया गया कि उनकी नमाज़ें बेकार नहीं गई, उनपर सबाब मिलेगा. नमाज़ को ईमान बताया गया क्योंकि इसकी अदा और जमाअत से पढ़ना ईमान की दलील है.(8) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को काबे का क़िबला बनाया जाना पसन्द था और हुज़ूर इसी उम्मीद में आसमान की तरफ़ नज़र फ़रमाते थे. इसपर यह आयत उतरी. आप नमाज़ ही में काबे की तरफ़ फिर गए. मुसलमानों ने भी आपके साथ उसी तरफ़ रूख़ किया. इससे मालूम हुआ कि अल्लाह तआला को अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रज़ा और पसन्द मन्ज़ूर है और आपकी ख़ातिर ही काबे को क़िबला बनाया गया.(9) इससे साबित हुआ कि नमाज़ में क़िबले की तरफ़ मुंह होना फ़र्ज़ है.(10) क्योंकि उनकी किताबों में हुज़ूर की तारीफ़ के सिलसिले में यह भी दर्ज था कि आप बैतुल मक़दिस से काबे की तरफ़ फ़िरेंगे और उनके नबियों ने बशारतों के साथ हुज़ूर का यह निशान बताया था कि आप बैतुल मक़दिस और काबा दोनों क़िबलो की तरफ़ नमाज़ पढ़ेंगे.(11) क्योंकि निशानी उसको लाभदायक हो सकती है जो किसी शुबह की वजह से इन्कारी हो. ये तो हसद और दुश्मनी के कारण इन्कार करते हैं, इन्हें इससे क्या नफ़ा होगा.(12) मानी ये हैं कि यह क़िबला स्थगित न होगा. तो अब किताब वालों को यह लालच न रखना चाहिये कि आप उनमें से किसी के क़िबले की तरफ़ रूख़ करेंगे.(13) हर एक का क़िबला अलग है.
यहूदी तो बैतुल मक़दिस के गुम्बद को अपना क़िबला क़रार देते हैं और ईसाई बैतुल मक़दिस के उस पूर्वी मकान को, जहाँ हज़रत मसीह की रूह डाली गई. (फ़त्ह).(14) यानी यहूदियों और ईसाईयों के उलमा.(15) मतलब यह है कि पिछली किताबों में आख़िरी ज़माने के नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के गुण ऐसे साफ़ शब्दों में बयान किये गए हैं जिनसे किताब वालों के उलमा को हुज़ूर के आख़िरी नबी होने में कुछ शक शुबह बाक़ी नहीं रह सकता और वो हुज़ूर के इस उच्चतम पद को पूरे यक़ीन के साथ जानते हैं. यहूदी आलिमों में से अब्दुल्लाह बिन सलाम इस्लाम लाए तो हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने उनसे पूछा कि आयत “यअरिफ़ूनहू” (वो इस नबी को ऐसा पहचानते हैं.) में जो पहचान बयान की गई है उसकी शान क्या है. उन्होंने फ़रमाया, ऐ उमर, मैंने हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को देखा तो बग़ैर किसी शुबह के पहचान लिया और मेरा हुज़ूर को पहचानना अपने बेटों के पहचानने से कहीं ज़्यादा भरपूर और सम्पूर्ण है. हज़रत उमर ने पूछा, वह कैसे ? उन्होंने कहा मैं गवाही देता हूँ कि हुज़ूर अल्लाह की तरफ़ से उसके भेजे हुए रसूल हैं, उनके गुण अल्लाह तआला ने हमारी किताब तौरात में बयान फ़रमाए हैं. बेटे की तरफ़ से ऐसा यक़ीन किस तरह हो. औरतों का हाल ऐसा ठीक ठीक किस तरह मालूम हो सकता है. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने उनका सर चूम लिया. इससे मालूम हुआ कि ऐसी दीनी महब्बत में जिसमें वासना शामिल न हो, माथा चूमना जायज़ है.(16) यानी तौरात और इन्जील में जो हुज़ूर की नअत और गुणगान है, किताब वालों के उलमा का एक गुट उसको हसद, ईर्ष्या और दुश्मनी से जानबूझ कर छुपाता है. सच्चाई का छुपाना गुनाह और बुराई है.

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Shaheel Khan

As-salam-o-alaikum my selfshaheel Khan from india , Kolkatamiss Aafreen invite me to write in islamic blog i am very thankful to her. i am try to my best share with you about islam.
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