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सूरए बक़रह – सोलहवाँ रूकू

सूरए बक़रह – सोलहवाँ रूकू
और इब्राहीम के दीन से कौन मुंह फेरे (1) सिवा उसके जो दिल का मूर्ख है और बेशक ज़रूर हम ने दुनिया में उसे चुन लिया (2) और बेशक वह आख़िरत में हमारे ख़ास कुर्ब (समीपता) की योग्यता वालों में हैं (3) (130) जबकि उससे उसके रब ने फ़रमाया गर्दन रख, अर्ज़ की मैंने गर्दन रखी जो रब है सारे जहान का (131) अर्ज़ की वसीयत की इब्राहीम ने अपने बेटों को और यअक़ूब ने कि मेरे बेटो बेशक अल्लाह ने यह दीन तुम्हारे लिये चुन लिया तो न मरना मगर मुसलमान (132) बल्कि तुम में के ख़ुद मौजूद थे (4) जब यअक़ूब को मौत आई जबकि उसने अपने बेटों से फ़रमाया मेरे बाद किसकी पूजा करोगे बोले हम पूजेंगे उसे जो ख़ुदा है आपका और आपके आबा (पूर्वज) इब्राहीम और इस्माईल (5) और इस्हाक़ का एक ख़ुदा और हम उसके हुज़ूर गर्दन रखे है (133) यह (6)
एक उम्मत है कि गुजर चुकी (7) उनके लिये जो उन्होंने कमाया और तुम्हारे लिये है जो तुम कमाओ और उनके कामों की तुम से पूछगछ न होगी (134) और किताबी बोले (8)
यहूदी या नसरानी हो जाओ राह पा जाओगे, तुम फ़रमाओ बल्कि हम तो इब्राहीम का दीन लेते हैं जो हर बातिल (असत्य) से अलग थे और मुश्रिकों से न थे (9) (135) यूं कहो कि हम ईमान लाए अल्लाह पर और उसपर जो हमारी तरफ़ उतरा और जो उतारा गया इब्राहीम और इस्माईल व इस्हाक़ व यअक़ूब और उनकी औलाद जो प्रदान किये गए मूसा व ईसा और जो अता किये गए बाक़ि नबी अपने रब के पास से हम उन में किसी पर ईमान में फ़र्क़ नहीं करते और हम अल्लाह के हुज़ूर गर्दन रखे हैं (136) फिर अगर वो भी यूंही ईमान लाए जैसा तुम लाए जब तो वो हिदायत पा गए और अगर मुंह फेरें तो वो निरी ज़िद में हैं (10) तो ऐ मेहबूब शीघ्र ही अल्लाह उनकी तरफ़ से तुम्हें किफ़ायत करेगा (काफ़ी होगा) और वही हे सुनता जानता (11)(137) हमने अल्लाह की रैनी ली (12) और अल्लाह से बेहतर किसकी रैनी, और हम उसी को पूजते हैं (138) तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह के बारे में झगड़ते हो (13)
हालांकि वह हमारा भी मालिक है और तुम्हारा भी (14) और हमारी करनी हमारे साथ और तुम्हारी करनी तुम्हारे साथ और निरे उसी के हैं (15)(139) बल्कि तुम यूं कहते हो कि इब्राहीम व इस्माईल व इस्हाक़ व यअक़ूब और उनके बेटे यहूदी या नसरानी थे तुम फ़रमाओ क्या तुम्हें इल्म ज़्यादा है या अल्लाह को (16) और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जिसके पास अल्लाह की तरफ़ की गवाही हो और वह उसे छुपाए(17) और ख़ुदा तुम्हारे कौतुकों से बेख़बर नहीं (140) वह एक गिराह (समूह) है कि गुज़र गया उनके लिये उनकी कमाई और तुम्हारे लिये तुम्हारी कमाई और उनके कामों की तुमसे पूछगछ न होगी (141)
तफ़सीर : सूरए बक़रह – सोलहवाँ रूकू
(1) यहूदी आलिमों में से हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम ने इस्लाम लाने के बाद अपने दो भतीजों मुहाजिर और सलमह को इस्लाम की तरफ़ बुलाया और उनसे फ़रमाया कि तुमको मालूम है कि अल्लाह तआला ने तौरात में फ़रमाया है कि मैं इस्माईल की औलाद से एक नबी पैदा करूंगा जिनका नाम अहमद होगा. जो उनपर ईमान लाएगा, राह पाएगा और जो उनपर ईमान न लाएगा, उसपर लअनत पड़ेगी. यह सुनकर सलमह ईमान ले आए और मुहाजिर ने इस्लाम से इन्कार कर दिया. इस पर अल्लाह तआला ने यह आयत नाज़िल फ़रमाकर ज़ाहिर कर दिया कि जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ख़ुद इस रसूले मुअज़्ज़म के भेजे जाने की दुआ फ़रमाई, तो जो उनके दीन से फिरे वह हज़रत इब्राहीम के दीन से फिरा. इसमें यहूदियों, ईसाईयों और अरब के मूर्ति पूजकों पर ऐतिराज़ है, जो अपने आपको बड़े गर्व से हज़रत इब्राहीम के साथ जोड़ते थे. जब उनके दीन से फिर गए तो शराफ़त कहाँ रही.(2) रिसालत और क़ु्र्बत के साथ रसूल और ख़लील यानी क़रीबी दोस्त बनाया. (3) जिनके लिये बलन्द दर्जे हैं. तो जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम दीन दुनिया दोनों की करामतों के मालिक हैं, तो उनकी तरीक़त यानी रास्ते से फिरने वाला ज़रूर नादान और मूर्ख है. (4) यह आयत यहूदियों के बारे में नाज़िल हुई. उन्होंने कहा था कि हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम ने अपनी वफ़ात के रोज़ अपनी औलाद को यहूदी रहने की वसिय्यत की थी. अल्लाह तआला ने उनके इस झूठ के रद में यह आयत उतारी (ख़ाज़िन). मतलब यह कि ऐ बनी इस्त्राईल, तुम्हारे लोग हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम के आख़िरी वक़्त उनके पास मौजूद थे, जिस वक़्त उन्होंने अपने बेटों को बुलाकर उनसे इस्लाम और तौहीद यानी अल्लाह के एक होने का इक़रार लिया था और यह इक़रार लिया था जो इस आयत में बताया गया है. (5) हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को हज़रत यअक़ूब के पूर्वजों में दाख़िल करना तो इसलिये है कि आप उनके चचा हैं और चचा बाप बराबर होता है. जैसा कि हदीस शरीफ़ में है. और आपका नाम हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम से पहले ज़िक्र फ़रमाना दो वजह से है, एक तो यह कि आप हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम से चौदह साल बड़े हैं, दूसरे इसलिये कि आप सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पूर्वज हैं. (6) यानी हज़रत इब्राहीम और यअक़ूब अलैहिस्सलाम और उनकी मुसलमान औलाद. (7) ऐ यहूदियों, तुम उनपर लांछन मत लगाओ. (8) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि यह आयत यहूदियों के रईसों और नजरान के ईसाइयो के जवाब में उतरी. यहूदियों ने तो मुसलमानों से यह कहा था कि हज़रत मूसा सारे नबियों में सबसे अफ़जल यानी बुज़ुर्गी वाले है. और यहूदी मज़हब सारे मज़हबों से ऊंचा है. इसके साथ उन्होंने हज़रत सैयदे कायनात मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और इन्जील शरीफ़ और क़ुरआन शरीफ़ के साथ कुफ़्र करके मुसलमानों से कहा था कि यहूदी बन जाओ. इसी तरह ईसाइयों ने भी अपने ही दीन को सच्चा बताकर मुसलमानों से ईसाई होने को कहा था. इस पर यह आयत उतरी.(9) इसमें यहूदियों और ईसाइयो वग़ैरह पर एतिराज है कि तुम मुश्रिक हो, इसलिये इब्राहीम की मिल्लत पर होने का दावा जो तुम करते हो वह झूटा है. इसके बाद मुसलमानों को ख़िताब किया जाता है कि वो उन यहूदियों और ईसाइयों से यह कहदें “यूँ कहो कि हम ईमान लाए, अल्लाह पर और उस पर जो हमारी तरफ़ उतरा और जो उतारा गया इब्राहीम व इस्माईल व इस्हाक़ व यअक़ूब और उनकी औलाद पर (आयत के अन्त तक).(10) और उनमें सच्चाई तलाश करने की भावना नहीं.(11) यह अल्लाह की तरफ़ से ज़िम्मा है कि वह अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को ग़लबा अता फ़रमाएगा, और इस में ग़ैब की ख़बर है कि आयन्दा हासिल होने वाली विजय और कामयाबी को पहले से ज़ाहिर कर दिया. इसमेंनबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का चमत्कार है कि अल्लाह तआला का यह ज़िम्मा पूरा हुआ और यह ग़ैबी ख़बर सच हो कर रही. काफ़िरों के हसद, दुश्मनी और उनकी शरारतों से हुज़ूर को नुक़सान न पहुंचा. हुज़ुर की फ़तह हुई. बनी क़ुरैज़ा क़त्ल हुए. बनी नुज़ैर वतन से निकाले गए. यहूदियों और ईसाइयों पर जिज़िया मुक़र्रर हुआ.(12) यानी जिस तरह रंग कपड़े के ज़ाहिर और बातिन पर असर करता है, उसी तरह अल्लाह के दीन के सच्चे एतिक़ाद हमारी रग रग में समा गए. हमारा ज़ाहिर और बातिन, तन और मन उसके रंग मे रंग गया. हमारा रंग दिखावे का नहीं, जो कुछ फ़ायदा न दे, बल्कि यह आत्मा को पाक करता है. ज़ाहिर में इसका असर कर्मों से प्रकट होता है. ईसाई जब अपने दीन में किसी को दाख़िल करते या उनके यहाँ कोई बच्चा पैदा होता तो पानी में ज़र्दरंग डालकर उस व्यक्ति या बच्चे को ग़ौता देते और कहते कि अब यह सच्चा हुआ. इस आयत में इसका रद फ़रमाया कि यह ज़ाहिरी रंग किसी काम का नहीं.(13) यहूदियों ने मुसलमानों से कहा हम पहली किताब वाले हैं, हमारा क़िबला पुराना है, हमारा दीन क़दीम और प्राचीन है. हम में से नबी हुए हैं. अगर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम नबी होते तो हम में से ही होते. इस पर यह मुबारक आयत उतरी.(14) उसे इख़्तियार है कि अपने बन्दों में से जिसे चाहे नबी बनाए, अरब में से हो या दूसरों में से.(15) किसी दूसरे को अल्लाह के साथ शरीक नहीं करते और इबादत और फ़रमाँबरदारी ख़ालिस उसी के लिये करते हैं. तो हम महरबानियों और इज्ज़त के मुस्तहिक़ हैं.(16) इसका भरपूर जवाब यह है कि अल्लाह ही सबसे ज़्यादा जानता है. तो जब उसने फ़रमाया “मा काना इब्राहीमो यहूदिय्यन व ला नसरानिय्यन” (इब्राहीम न यहूदी थे, न ईसाई) तो तुम्हारा यह कहना झूटा हुआ.(17) यह यहूदियों का हाल है जिन्हों ने अल्लाह तआला की गवाहियाँ छुपाईं जो तौरात शरीफ़ में दर्ज थीं कि मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उसके नबी हैं और उनकी यह तारीफ़ और गुण हैं और हज़रत इब्राहीम मुसलमान हैं और सच्चा दीन इस्लाम है, न यहूदियत न ईसाइयत.
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Noor Saba

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