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सूरए बक़रह _ चौदहवाँ रूकू

सूरए बक़रह _ चौदहवाँ रूकू
और यहूदी बोले नसरानी (ईसाई) कुछ नहीं और नसरानी बोले यहूदी कुछ नहीं (1)हालांकि वो किताब पढ़ते हैं (2)इसी तरह जाहिलों ने उनकी सी बात कही (3)तो अल्लाह क़यामत के दिन उनमें फ़ैसला कर देगा जिस बात में झगड़ रहे हैं और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन (4) जो अल्लाह की मस्जिदों को रोके उनमें खुदा का नाम लिये जाने से (5)और उनकी वीरानी मे कोशिश करे (6)उनको न पहुंचता था कि मस्जिदों में जाएं मगर डरते हुए उनके लिये दुनिया में रूस्वाई है (7)और उनके लिये आख़िरत में बड़ा अज़ाब (8)और पूरब पश्चिम सब अल्लाह ही का है तो तुम जिधर मुंह करो उधर वज्हुल्लाह (ख़ुदा की रहमत तुम्हारी तरफ़ मुतवज्जेह) है बेशक अल्लाह वुसअत (विस्तार) वाला इल्म वाला है और बोले ख़ुदा ने अपने लिये औलाद रखी, पाकी है उसे (9)बल्कि उसीकी मिल्क (संपत्ति) है जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है (10)सब उसके हुज़ूर (प्रत्यक्ष) गर्दन डाले है नया पैदा करने वाला आसमानों और ज़मीन का (11)और जब किसी बात का हुक्म फ़रमाए तो उससे यही फ़रमाता है कि हो जा और वह फ़ौरन हो जाती है (12)और जाहिल बोले (13) अल्लाह हम से क्यों नहीं कलाम करता (14)या हमें कोई निशानी मिले (15) उनसे अगलों ने भी एेसी ही कही उनकी सी बात. उनके दिल एक से है (16)बेशक हमने निशानियाँ खोल दीं यक़ीन वालों के लिये (17)बेशक हमने तुम्हें हक़ के साथ भेजा ख़ुशख़बरी देता और डर सुनाता और तुमसे दोज़ख़ वालों का सवाल न होगा (18)
और कभी तुमसे यहूदी और नसारा (ईसाई) राज़ी न होंगे जब तक तुम उनके दीन का अनुकरण न करो (19)तुम फ़रमाओ अल्लाह ही की हिदायत हिदायत है (20)और (ऐ सुनने वाले, कोई भी हो) अगर तू उनकी ख्वाहिशों पर चलने वाला हुआ बाद इसके कि तुझे इल्म आचुका तो अल्लाह से तेरा कोई बचाने वाला न होगा और न मददगार (21)जिन्हें हमने किताब दी है वो जैसी चाहिये उसकी तिलावत (पाठ) करते है वही उस पर ईमान रखते है और जो उसके इन्कारी हों तो वही घाटे वाले हैं (22)
तफ़सीर : सूरए बक़रह – चौदहवाँ रूकू
(1) नजरात के ईसाइसों का एक दल सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में आया तो यहूदी उलमा भी आए और दोनों में मुनाज़िरा यानी वार्तालाप शुरू हो गया. आवाज़ें बलन्द हुई, शोर मचा. यहूदियों ने कहा कि ईसाइयों का दीन कुछ नहीं और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और इन्जील शरीफ़ का इन्कार किया. इसी तरह ईसाईयों ने यहूदियों से कहा कि तुम्हारा दीन कुछ नहीं और तौरात शरीफ़ और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का इन्कार किया. इस बाब में यह आयत उतरी.
(2) यानी जानकारी के बावजूद उन्होंने ऐसी जिहालत की बात की. हालांकि इन्जील शरीफ़ जिसको ईसाई मानते हैं, उसमें तौरात शरीफ़ और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के नबी होने की पुष्टि है. इसी तरह तौरात जिसे यहूदी मानते हैं, उसमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के नबी होने और उन सारे आदेशों की पुष्टि है जो आपको अल्लाह तआला की तरफ़ से अता हुए.(3) किताब वालों के उलमा की तरह उन जाहिलों ने जो इल्म रखते थे न किताब, जैसे कि मुर्तिपूजक, आग के पुजारी, वग़ैरह, उन्होंने हर एक दीन वाले को झुटलाना शुरू किया, और कहा कि वह कुछ नहीं. इन्हीं जाहिलों में से अरब के मूर्तिपूजक मुश्रिकीन भी हैं, जिन्होंने नबीये करीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके दीन की शान में ऐसी ही बातें कहीं.(4) यह आयत बैतुल मक़दिस की बेहुरमती या निरादर के बारे में उतरी. जिसका मुख़्तसर वाक़िआ यह है कि रोम के ईसाईयो ने बनी इस्त्राईल पर चढ़ाई की. उनके सूरमाओं को क़त्ल किया, औरतों बच्चों को क़ैद किया, तौरात शरीफ़ को जलाया, बैतुल मक़दिस को वीरान किया, उसमें गन्दगी डाली, सुवर ज़िबह किये (मआज़ल्लाह). बैतुल मक़दिस हज़रत उमरे फ़ारूक की ख़िलाफ़त तक इसी वीरानी में पड़ा रहा. आपके एहदे मुबारक (समयकाल) में मुसलमानों ने इसको नए सिरे से बनाया. एक क़ौल यह भी है कि यह आयत मक्का के मुश्रिकों के बारे में उतरी, जिन्हों ने इस्लाम की शुरूआत में हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके साथियों को काबे में नमाज़ पढ़ने से रोका था, और हुदैबिया की जंग के वक़्त उसमें नमाज़ और हज़ से मना किया था.(5) ज़िक्र नमाज़, ख़ुत्बा, तस्बीह, वअज़, नअत शरीफ़, सबको शामिल है. और अल्लाह के ज़िक्र को मना करना हर जगह बुरा है, ख़ासकर मस्जिदों में, जो इसी काम के लिये बनाई जाती हैं. जो शख़्स मस्जिद को ज़िक्र और नमाज़ से महरूम करदे, वह मस्जिद का वीरान करने वाला और बहुत बड़ा ज़ालिम है.(6) मस्जिद की वीरानी जैसे ज़िक्र और नमाज़ के रोकने से होती है, ऐसी ही उसकी इमारत को नुक़सान पहुंचाने और निरादर करने से भी.(7) दुनिया में उन्हें यह रूस्वाई पहुंची कि क़त्ल किये गए, गिरफ़्तार हुए, वतन से निकाले गए, ख़िलाफ़ते फ़ारूक़ी और उस्मानी में मुल्के शाम उनके क़ब्ज़े से निकल गया, बैतुल मक़दिस से ज़िल्लत के साथ निकाले गए.(8) सहाबए किराम रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ एक अंधेरी रात सफ़र में थे. क़िबले की दिशा मालूम न हो सकी. हर एक शख़्स ने जिस तरफ़ उस का दिल जमा, नमाज़ पढ़ी. सुबह को सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाल अर्ज़ किया तो यह आयत उतरी. इससे मालूम हुआ कि क़िबले की दिशा मालूम न हो सके तो जिस तरफ़ दिल जमा कि यह क़िबला है, उसी तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़े. इस आयत के उतरने के कारण के बारे में दूसरा क़ौल यह है कि यह उस मुसाफ़िर के हक़ में उतरी, जो सवारी पर नफ़्ल अदा करे, उसकी सवारी जिस तरफ़ मुंह फेर ले, उस तरफ़ उसकी नमाज़ दुरूस्त है. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीसों में यह साबित है. एक क़ौल यह है कि जब क़िबला बदलने का हुक्म दिया गया तो यहूदियों ने मुसलमानों पर ताना किया. उनके रद में यह आयत उतरी. बताया गया कि पूर्व पश्चिम सब अल्लाह का है, जिस तरफ़ चाहे क़िबला निश्चित करे. किसी को ऐतिराज़ का क्या हक़ ? (ख़ाज़िन). एक क़ौल यह है कि यह आयत दुआ के बारे में उतरी है. हुज़ूर से पूछा गया कि किस तरफ़ मुंह करके दुआ की जाए. इसके जवाब में यह आयत उतरी. एक क़ौल यह है कि यह आयत हक़ से गुरेज व फ़रार में है. और ” ऐनमा तुवल्लु” (तुम जिधर मुंह करो) का ख़िताब उन लोगों को है जो अल्लाह के ज़िक्र से रोकते और मस्जिदों की वीरानी की कोशिश करते हैं. वो दुनिया की रूसवाई और आख़िरत के अज़ाब से कहीं भाग नहीं सकते, क्योंकि पूरब पश्चिम सब अल्लाह का है, जहाँ भागेंगे, वह गिरफ़्तार फ़रमाएगा. इस संदर्भ में “वज्हुल्लाह” का मतलब ख़ुदा का क़ुर्ब और हुज़ूर है. (फ़त्ह). एक क़ौल यह भी है कि मानी यह हैं कि अगर काफ़िर ख़ानए काबा में नमाज़ से मना करें तो तुम्हारे लिये सारी ज़मीन मस्जिद बना दी गई है, जहाँ से चाहे क़िबले की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ो.(9) यहूदियों ने हज़रत उज़ैर को और ईसाईयों ने हज़रत मसीह को ख़ुदा का बेटा कहा. अरब के मुश्रिकीन ने फ़रिश्तों को ख़ुदा की बेटियाँ बताया. उनके रद में यह आयत उतरी. फ़रमाया “सुब्हानहू” वह पाक है इससे कि उसके औलाद हो. उसकी तरफ़ औलाद की निस्बत करना उसको ऐब लगाना और बेअदबी है. हदीस में है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है इब्ने आदम ने मुझे गाली दी, मेरे लिये औलाद बताई. मैं औलाद और बीवी से पाक हूँ.(10) और ममलूक होना औलाद होने के मनाफ़ी है. जब तमाम जगत उसका ममलूक है, तो कोई औलाद कैसे हो सकता है अगर कोई अपनी औलाद का मालिक हो जाए, वह उसी वक़्त आज़ाद हो जाएगी.(11) जिसने बग़ैर किसी पिछली मिसाल के चीज़ों को शून्य से अस्तित्व प्रदान किया.(12) यानी कायनात या सृष्टि उसके इरादा फ़रमाते ही अस्तित्व में आ जाती है.(13) यानी एहले किताब या मूर्तिपूजक मुश्रिकीन.(14) यानी वास्ते या माध्यम के बिना ख़ुद क्यों नही फ़रमाता जैसा कि फ़रिश्तों और नबियों से कलाम फ़रमाता है. यह उनके घमण्ड की सर्वोच्च सीमा और भारी सरकशी थी, उन्होंने अपने आप को फ़रिश्तों और नबियों के बराबर समझा. राफ़ेअ बिन ख़ुजैमा ने हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा, अगर आप अल्लाह के रसूल हैं तो अल्लाह से फ़रमाइये वह हमसे कलाम करे, हम ख़ुद सुनें, इस पर यह आयत उतरी.(15) यह उन आयतों का दुश्मनी से इन्कार है जो अल्लाह तआला ने अता फ़रमाई.(16) नासमझी, नाबीनाई, कुफ़्र और दुश्मनी में. इसमें नबीये करीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को तसल्ली दी गई है कि आप उनकी सरकशी और ज़िद और इन्कार से दुखी न हों. पिछले काफ़िर भी नबियों के साथ ऐसा ही करते थे.(17) यानी क़ुरआनी आयतें और खुले चमत्कार इन्साफ़ वाले को सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के नबी होने का यक़ीन दिलाने के लिये काफ़ी हैं, मगर जो यक़ीन करने का इच्छुक न हो वह दलीलों या प्रमाणों से फ़ायदा नहीं उठा सकता.(18) कि वो क्यों ईमान न लाए, इसलिये कि आपने अपना तबलीग़ का फ़र्ज़ पूरे तौर पर अदा फ़रमा दिया.(19) और यह असम्भव है, क्योंकि वो झूठे और बातिल है.(20) वही अनुकरण के क़ाबिल है और उसके सिवा हर एक राह झूठी और गुमराही वाली.(21) यह सम्बोधन उम्मते मुहम्मदिया यानी मुसलमानों के लिये है कि जब तुमने जान लिया कि नबीयों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तुम्हारे पास सत्य और हिदायत लेकर आए, तो तुम हरग़िज़ काफ़िरों की ख़्वाहिशों की पैरवी न करना. अगर ऐसा किया तो तुम्हें कोई अल्लाह के अज़ाब से बचाने वाला नहीं है.(ख़ाज़िन)(22) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़माया यह आयत एहले सफ़ीना के बारे में उतरी जो जअफ़र बिन अबी तालिब के साथ रसूले पाक के दरबार में हाज़िर हुए थे. उनकी तादाद चालीस थी. बत्तीस हबशा वाले और आठ शाम वाले पादरी. उनमें बुहैपा राहिब (पादरी) भी थे. मतलब यह है कि वास्तव में तौरात शरीफ़ पर ईमान लाने वाले वही हैं जो इसके पढ़ने का हक़ अदा करते हैं और उसके मानी समझते और मानते हैं और उसमें हुज़ूर सैयदे कायनात मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ और गुण देखकर हुज़ूर पर ईमान लाते हैं और जो हुज़ूर के इन्कारी होते हैं वो तौरात शरीफ़ पर ईमान नहीं रखते.

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Noor Saba

Asalam-o-alaikum , Hi i am noor saba from Jharkhand ranchi i am very passionate about blogging and websites. i loves creating and writing blogs hope you will like my post khuda hafeez Dua me yaad rakhna.
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