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सूरए बक़रह _ बारहवाँ रूकू

तुम फ़रमाओ जो कोई जिब्रील का दुश्मन हो (1)तो उस (जिब्रील) ने तो तुम्हारे दिल पर अल्लाह के हुक्म से यह कुरआन उतारा अगली किताबों की तस्दीक़ फ़रमाता और हिदायत और बशारत (ख़ुशख़बरी) मुसलमानों को(2)जो कोई दुश्मन हो अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों आैर जिब्रील और मीकाईल का तो अल्लाह दुश्मन है काफ़िरों का (3)और बेशक हमने तुम्हारी तरफ़ रौशन आयतें उतारी(4)
और उनके इन्कारी न होंगे मगर फ़ासिक़ (कुकर्मी) लोग और क्या जब कभी कोई एहद करते हैं उनमें का एक फ़रीक़ (पक्ष) उसे फेंक देता है बल्कि उन में बहुतेरों को ईमान नहीं (5)और जब उनके पास तशरीफ़ लाया अल्लाह के यहां से एक रसूल (6) उनकी किताबों की तस्दीक़ फ़रमाता (7)तो किताब वालों से एक गिरोह (दल) ने अल्लाह की किताब अपने पीठ पीछे फेंक दी (8)जैसे कि वो कुछ इल्म ही नहीं रखते (कुछ जानते ही नहीं) (9)और उसके मानने वाले हुए जो शैतान पढ़ा करते थे सुलैमान की सल्तनत के ज़माने में (10)और सुलैमान ने क़ुफ़्र न किया (11)हाँ शैतान काफ़िर हुए (12)लोगों को जादू सिखाते हैं और वह (जादू) जो बाबुल में दो फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर उतरा और वो दोनों किसी को कुछ न सिखाते जब तक यह न कह लेते कि हम तो निरी आज़मायश हैं तू अपना ईमान न खो (13)तो उनसे सीखते वह जिससे जुदाई डालें मर्द और उसकी औरत में और उससे ज़रर (हानि) नहीं पहुंचा सकते किसी को मगर ख़ुदा के हुक्म से (14)और वो सीखते हैं जो उन्हें नुक़सान देगा नफ़ा न देगा और बेशक ज़रूर उन्हें मालूम है कि जिसने यह सौदा लिया आख़िरत में उसका कुछ हिस्सा नहीं और बेशक क्या बुरी चीज़ है वह जिसके बदले उन्होंने अपनी जानें बेचीं किसी तरह उन्हें इल्म होता (15)और अगर वो ईमान लाते (16)और परहेज़गारी करते तो अल्लाह के यहां का सवाब बहुत अच्छा है किसी तरह उन्हें ईल्म होता (103)
तफ़सीर : सूरए बक़रह – बारहवाँ रूकू
(1) यहूदियों के आलिम अब्दुल्लाह बिन सूरिया ने हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा, आपके पास आसमान से कौन फ़रिश्ता आता है. फ़रमाया, जिब्रील. इब्ने सूरिया ने कहा वह हमारा दुश्मन है कि हमपर कड़ा अज़ाब उतारता है. कई बार हमसे दुश्मनी कर चुका है. अगर आपके पास मीकाईल आते तो हम आप पर ईमान ले आते.(2) तो यहूदियों की दुश्मनी जिब्रील के साथ बेमानी यानी बेकार है. बल्कि अगर उन्हें इन्साफ़ होता तो वो जिब्रीले अमीन से महब्बत करते और उनके शुक्रगुज़ार होते कि वो ऐसी किताब लाए जिससे उनकी किताबों की पुष्टि होती है. और “बुशरा लिल मूमिनीन” (और हिदायत व बशारत मुसलमानों को) फ़रमाने में यहूदियों का रद है कि अब तो जिब्रील हिदायत और ख़ुशख़बरी ला रहे हैं फिर भी तुम दुश्मनी से बाज़ नही आते.
(3) इससे मालूम हुआ कि नबियों और फ़रिश्तों की दुश्मनी कुफ़्र और अल्लाह के ग़ज़ब का कारण है. और अल्लाह के प्यारों से दुश्मनी अल्लाह से दुश्मनी करना है.(4) यह आयत इब्ने सूरिया सहूदी के जवाब में उतरी, जिसने हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि ऐ मुहम्मद, आप हमारे पास कोई ऐसी चीज़ न लाए जिसे हम पहचानते और न आप पर कोई खुली (स्पष्ट) आयत उतरी जिसका हम पालन करते.(5) यह आयत मालिक बिन सैफ़ यहूदी के जवाब में उतरी जब हुजू़र सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने यहूदियों को अल्लाह तआला के वो एहद याद दिलाए जो हुज़ूर पर ईमान लाने के बारे में किये थे तो इब्ने सैफ़ ने एहद ही का इन्कार कर दिया.(6) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.(7) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तौरात और ज़ुबूर वग़ैरह की पुष्टि फ़रमाते थे और ख़ुद इन किताबों में भी हुज़ूर के तशरीफ़ लाने की ख़ुशख़बरी और आपके गुणों का बयान था. इसलिये हुज़ूर का तशरीफ़ लाना और आपका मुबारक अस्तित्व ही इन किताबों की पुष्टि है. तो होना यह चाहिये था कि हुज़ूर के आगमन पर एहले किताब का ईमान अपनी किताबों के साथ और ज़्यादा पक्का होता, मगर इसके विपरीत उन्होंने अपनी किताबों के साथ भी कुफ़्र किया. सदी का कथन है कि जब हुज़ूर तशरीफ़ लाए तो यहूदियों ने तौरात से मुक़ाबला करके तौरात और क़ुरआन को एकसा पाया तो तौरात को भी छोड़ दिया.(8) यानी उस किताब की तरफ़ ध्यान नहीं दिया. सुफ़ियान बिन ऐनिया का कहना है कि यहूदियों ने तौरात को क़ीमती रेशमी कपड़ों में सोने चांदी से मढ़कर रख लिया और उसके आदेशों को न माना.(9) इन आयतों से मालूम होता है कि यहूदियों के चार सम्प्रदाय थे. एक तौरात पर ईमान लाया और उसने उसके अहकाम भी अदा किये. ये मूमिनीने एहले किताब हैं. इनकी तादाद थोड़ी है. और “अक्सरोहुम”
(उनमें बहुतेरों को) से उस दूसरे समुदाय का पता चलता है जिसने खुल्लम खुल्ला तौरात के एहद तोड़े, उसकी सीमाओं का उल्लंघन किया, सरकशी का रास्ता अपनाया, “नबज़हू फ़रीक़ुम मिन्हुम” (उनमें एक पक्ष उसे फेंक देता है) में उनका ज़िक़्र है. तीसरा सम्प्रदाय वह जिसने एहद तोड़ने का एलान तो न किया लेकिन अपनी जिहालत से एहद तोड़ते रहे. उनका बयान “बल अकसरोहुम ला यूमिनून” (बल्कि उनमें बहुतेरों को ईमान नहीं) में है. चौथे सम्प्रदाय ने ज़ाहिर में तो एहद माने और छुपवाँ विद्रोह और दुश्मनी से विरोध करते रहे. यह बनावटी तौर से जाहिल बनते थे. “कअन्नहुम ला यअलमून” (मानो वो कुछ इल्म ही नहीं रखते) में उनका चर्चा है.(10) हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के ज़माने में बनी इस्त्राईल जादू सीखने में मशग़ूल हुए तो आपने उनको इससे रोका और उनकी किताबें लेकर अपनी कुर्सी के नीचे दफ़्न कर दीं. हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की वफ़ात के बाद शैतानों ने वो किताबें निकाल कर लोगों से कहा कि सुलैमान इसी के ज़ोर से सल्तनत करते थे. बनी इस्त्राईल के आलिमों और नेक लोगों ने तो इसका इन्कार किया मगर जाहिल लोग जादू को हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम का इल्म बताकर उसके सीखने पर टूट पडे. नबियों की किताबें छोड़ दीं और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम पर लांछन शुरू की. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने तक इसी हाल पर रहे. अल्लाह तआला ने हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की सफ़ाई के लिये हुज़ूर पर यह आयत उतारी.(11) क्योंकि वो नबी हैं और नबी कुफ़्र से बिल्कुल मासूम होते हैं, उनकी तरफ़ जादू की निस्बत करना बातिल और ग़लत है, क्योंकि जादू का कुफ़्रियात से ख़ाली होना लगभग असम्भव है.(12) जिन्होंने हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम पर जादूगरी का झूटा इल्ज़ाम लगाया.(13) यानी जादू सीख कर और उस पर अमल और विश्वास करके और उसको दुरूस्त जान कर काफ़िर न बन. यह जादू फ़रमांबरदार और नाफ़रमान के बीच अन्तर जानने और परखने के लिये उतरा. जो इसको सीखकर इस पर अमल करे, काफ़िर हो जाएगा. शर्त यह है कि जादू में ईमान के विरूद्ध जो बातें और काम हों और जो उससे बचे, न सीखे या सीखे और उसपर अमल न करे और उसके कुफ़्रियात पर विश्वास न रखे वह मूमिन रहेगा, यही इमाम अबू मन्सूर मातुरीदी का कहना है. जो जादू कुफ़्र है उसपर अमल करने वाला अगर मर्द है, क़त्ल कर दिया जाएगा. जो जादू कुफ़्र नहीं, मगर उससे जानें हलाक की जाती हैं, उसपर अमल करने वाला तरीक़े को काटने वालों के हुक्म में है, मर्द हो या औरत. जादूगर की तौबह क़ुबूल है.( मदारिक)(14) इससे मालूम हुआ कि असली असर रखने वाला अल्लाह तआला है. चीज़ों की तासीर उसी की मर्ज़ी पर है.(15) अपने अंजामेकार और अज़ाब के कड़ेपन का.(16) हज़रत सैयदे कायनात सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और क़ुरआने पाक पर.

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Noor Saba

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