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33 सूरए अहज़ाब- पाँचवां रूकू

बेशक मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें (1)(1) अस्मा बिन्ते अमीस जब अपने शौहर जअफ़र बिन अबी तालिब के साथ हबशा से वापिस आई तो नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बीबियों से मिलकर उन्हों ने पूछा कि क्या औरतों के बारे में भी कोई आयत उतरी है. उन्होंने फ़रमाया नहीं, तो अस्मा ने हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया कि हुज़ूर औरतें बड़े टोटे में हैं. फ़रमाया, क्यों, अर्ज़ किया उनका ज़िक्र ख़ैर के साथ होता ही नहीं जैसा कि मर्दों का होता है. इसपर यह आयत उतरी और उनके साथ उनकी तारीफ़ फ़रमाई गई और दर्ज़ों में से पहला दर्ज़ा इस्लाम है जो ख़ुदा और रसूल की फ़रमाँबरदारी है. दूसरा ईमान कि वह सही अक़ीदे और ज़ाहिर बातिन का एक सा सच्चा होना है. तीसरा दर्ज़ा ताअत है. ईमान वाले और ईमान वालियां और फ़रमाँबरदार और फ़रमाँबरदारें और सच्चे और सच्चियां (2)
(2) इसमें चौथे दर्जे का बयान है कि वह नियत की सच्चाई और कहने व करने की सत्यता है. इसके बाद पाँचवें दर्जे सब्र का बयान है कि अल्लाह के आदेशों का पालन करना और जिन बातों से मना किया गया है उनसे दूर रहना, चाहे नफ़्स को कितना ही बुरा लगे. जो काम भी हो अल्लाह की रज़ा के लिये इख़्तियार किया जाए. इसके बाद ख़ुशूअ यानी सच्ची लगन का बयान है जो इबादतों और ताअतों में दिलों और पूरे शरीर के साथ एकाग्रता का नाम है. इसके बाद सातवें दर्जे सदक़े का बयान है जो अल्लाह तआला के अता किये हुए माल में से उसकी राह में फ़र्ज़ या नफ़्ल की सूरत में देना है. फिर आठवें दर्जे रोज़े का बयान है. यह भी फ़र्ज़ और नफ़्ल दोनों को शामिल है. कहा गया है कि जिसने हर हफ़्ते एक दिरहम सदक़ा किया, वह ‘मुसद्दिक़ीन’ (यानी सदक़ा देने वालों) में और जिसने हर माह अय्यामे बैज़ के तीन रोज़े रखे, वह ‘साइमीन’ (यानी रोज़ा रखने वालों) में शुमार किया जाता है. इसके बाद नवें दर्जे इफ़्फ़त यानी पाकीज़गी का बयान है और वह यह है कि अपनी पारसाई को मेहफ़ूज़ रखे और जो हलाल नहीं है, उससे बचे. सब से आख़िर में दसवें दर्जे ज़िक्र की कसरत का बयान है. ज़िक्र में तस्बीह, तहमीद, तहलील, तकबीर, क़ुरआन का पाठ, दीन का इल्म पढ़ना, नमाज़, नसीहत, उपदेश, मीलाद शरीफ़, नअत शरीफ़ पढ़ना, सब दाख़िल हैं. कहा गया है कि बन्दा ज़िक्र करने वालों में तब गिना जाता है जब कि वह खड़े बैठे लेटे हर हाल में अल्लाह का ज़िक्र करे. और सब्र वाले और सब्र वालियाँ और आजिज़ी करने वाले और आजिज़ी करने वालियां और ख़ैरात करने वाले और ख़ैरात करने वालियां और रोज़े वाले और रोज़े वालियां और अपनी पारसाई निगाह रखने वाले और निगाह रखने वालियां और अल्लाह को बहुत याद करने वाले और याद करने वालियां इन सबके लिये अल्लाह ने बख़्शिश और बड़ा सवाब तैयार कर रखा है {35} और न किसी मुसलमान मर्द न मुसलमान औरत को पहुंचता है कि जब अल्लाह व रसूल कुछ हुक्म फ़रमा दें तो उन्हें अपने मामले का कुछ इख़्तियार रहे (3)(3) यह आयत ज़ैनब बिन्ते जहश असदियह और उनके भाई अब्दुल्लाह बिन जहश और उनकी वालिदा उमैमह बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब के हक़ में उतरी. उमैमह हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की फुफी थीं. वाक़िआ यह था कि ज़ैद बिन हारिसा जिनको रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म ने आज़ाद किया था और वह हुज़ूर ही की ख़िदमत में रहते थे, हुज़ूर ने ज़ैनब के लिये उनका पयाम दिया. उसको ज़ैनब और उनके भाई ने मन्ज़ूर नहीं किया. इसपर यह आयत उतरी. और हज़रत ज़ैनब और उनके भाई इस हुक्म को सुनकर राज़ी हो गए और हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म ने हज़रत ज़ैद का निकाह उनके साथ कर दिया और हुज़ूर ने उनका मेहर दस दीनार, साठ दिरहम, एक जोड़ा कपड़ा, पचास मुद (एक नाप है) खाना, तीस साअ खजूरें दीं. इस से मालूम हुआ कि आदमी को रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की फ़रमाँबरदारी हर सूरत में वाजिब है और नबी अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले में कोई अपने नफ़्स का ख़ुद मुख़्तार नहीं. इस आयत से यह भी साबित हुआ कि अम्र वुजूब यानी अनिवार्यता के लिये होता है. कुछ तफ़सीरों में हज़रत ज़ैद को ग़ुलाम कहा गया है मगर यह भूल से ख़ाली नहीं क्योंकि वह आज़ाद थे. और जो हुक्म न माने अल्लाह और उसके रसूल का वह बेशक खुली गुमराही बहका {36} और ऐ मेहबूब याद करो जब तुम फ़रमाते थे उससे जिसे अल्लाह ने नेअमत दी (4)(4) इस्लाम की, जो बड़ी महान नेअमत है. और तुमने उसे नेअमत दी (5)(5) आज़ाद फ़रमा कर. इस से मुराद हज़रत ज़ैद बिन हारिसह हैं कि हुज़ूर ने उन्हें आज़ाद किया और उनका पालन पोषण किया. कि अपनी बीबी अपने पास रहने दे (6)(6) जब हज़रत ज़ैद का निकाह हज़रत ज़ैनब से हो चुका तो हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास अल्लाह तआला की तरफ़ से वही आई की जै़नब आपकी बीबियों में दाख़िल होंगी, अल्लाह तआला को यही मंज़ूर है. इसकी सूरत यह हुई कि हज़रत ज़ैद और ज़ैनब के बीच जमी नहीं और हज़रत ज़ैद ने हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से हज़रत जैनब की तेज़ ज़बानी और कड़वे बोलों और नाफ़रमानी और अपने आपको बड़ा समझने की शिकायत की. ऐसा बार बार इत्तिफ़ाक़ हुआ. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत ज़ैद को समझा देते. इसपर ये आयत उतरी. और अल्लाह से डर (7)
(7) ज़ैनब पर घमण्ड और शौहर को तकलीफ़ पहुंचाने के इल्ज़ाम लगाने में. और तुम अपने दिल में रखते थे वह जिसे अल्लाह को ज़ाहिर करना मंज़ूर था (8)(8) यानी आप यह ज़ाहिर नहीं फ़रमाते थे कि ज़ैनब से तुम्हारा निबाह नहीं हो सकेगा और तलाक़ ज़रूर वाक़े होगा. और अल्लाह तआला उन्हें अज़वाजे मुत्तहिहरात में दाख़िल करेगा और अल्लाह तआला को इसका ज़ाहिर करना मंज़ूर था. और तुम्हें लोगों के तअने का अन्देशा (डर) था (9)(9) यानी जब हज़रत ज़ैद ने ज़ैनब को तलाक़ दे दी तो आप को लोगों के तअनों का अन्देशा हुआ कि अल्लाह तआला का हुक्म तो है हज़रत ज़ैनब के साथ निकाह करने का और ऐसा करने से लोग तअना देंगे कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ऐसी औरत से निकाह कर लिया जो उनके मुंह बोले बेटे के निकाह में रही थी. इससे मालूम हुआ कि नेक काम में बेजा तअना करने वालों का कुछ अन्देशा न करना चाहिये. और अल्लाह ज़्यादा सज़ावार है कि उसका ख़ौफ़ रखो (10)(10) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम सब से ज़्यादा अल्लाह का ख़ौफ़ रखने वाले और सब से ज़्यादा तक़वा वाले हैं, जैसा कि हदीस शरीफ़ में है. फिर जब ज़ैद की ग़रज़ उससे निकल गई (11)(11) और हज़रत ज़ैद ने हज़रत ज़ैनब को तलाक़ दे दी और इद्दत गुज़र गई. तो हमने वह तुम्हारे निकाह में दे दी (12)(12) हज़रत ज़ैनब की इद्दत गुज़रने के बाद उनके पास हज़रत ज़ैद रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का पयाम लेकर गए और उन्हों ने सर झुका कर भरपूर शर्म और अदब से उन्हें पयाम पहुंचाया. उन्हों ने कहा कि इस मामले में मैं अपनी राय को कुछ दख़्ल नहीं देती, जो मेरे रब को मंज़ूर हो, उस पर राज़ी हूँ. यह कहकर वह अल्लाह की बारगाह में मुतवज्जेह हुई और उन्हों ने नमाज़ शुरू कर दी और यह आयत नाज़िल हुई. हज़रत ज़ैनब को इस निकाह से बहुत ख़ुशी और फ़ख्र हुआ. सैयदे आलम ने इस शादी का वलीमा बड़ी शान से किया. कि मुसलमानों पर कुछ हर्ज न रहे उनके लेपालकों की बीबियों में जब उनसे उनका काम ख़त्म हो जाए (13)(13) ताकि यह मालूम हो जाए कि लेपालक की बीबी से निकाह जायज़ है. और अल्लाह का हुक्म होकर रहना {37} नबी पर कोई हर्ज नहीं उस बात में जो अल्लाह ने उसके लिये मुक़र्रर फ़रमाई (14)(14) यानी अल्लाह तआला ने जो उनके लिये जायज़ किया और निकाह के बारे में जो वुसअत उन्हें अता फ़रमाई उसपर इक़दाम करने में कुछ हर्ज नहीं.
अल्लाह का दस्तूर (तरीक़ा) चला आ रहा है उनमें जो पहले गुज़र चुके (15)(15) यानी नबीयों को निकाह के सिलसिले में वुसअतें दी गई कि दूसरों से ज़्यादा औरतें उनके लिये हलाल फ़रमाई गई जैसा कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की सौ बीबियाँ और हज़रत सुलैमान की तीस बीबियाँ थीं. यह उनके ख़ास अहकाम हैं उनके अलावा दूसरे को जायज़ नहीं. न कोई इसपर ऐतिराज़ कर सकता है. अल्लाह तआला अपने बन्दों में जिसके लिये जो हुक्म फ़रमाए उस पर किसी को ऐतिराज़ की क्या मजाल. इसमें यहूदियों का रद है जिन्हों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर चार से ज़्यादा निकाह करने पर तअना दिया था. इसमें उन्हें बताया गया कि यह हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिये ख़ास है जैसा कि पहले नबीयों के लिये कई बीबियाँ रखने के ख़ास आदेश थे. और अल्लाह का काम मुक़र्रर तक़दीर है {38} वो जो अल्लाह के पयाम पहुंचाते और उससे डरते और अल्लाह के सिवा किसी का ख़ौफ़ न करते और अल्लाह बस है हिसाब लेने वाला (16){39}(16) तो उसी से डरना चाहिये. मुहम्मद तुम्हारे मर्दों में किसी के बाप नहीं (17)(17) तो हज़रत ज़ैद के भी आप हक़ीक़त में बाप नहीं कि उनकी मन्कूहा आपके लिये हलाल न हुई. क़ासिम, तैयबो ताहिर और हज़रत इब्राहीम हुज़ूर के बेटे थे, मगर इस उम्र को न पहुंचे कि उन्हें मर्द कहा जाए. उन्होंने बचपन में वफ़ात पाई. हाँ अल्लाह के रसूल हैं (18)(18) और सब रसूल नसीहत करने वाले, शफ़क़त रखने वाले और इज़्ज़त किये जाने के क़ाबिल और उनकी फ़रमाँबरदारी अनिवार्य होने के कारण अपनी उम्मत के बाप कहलाते हैं बल्कि उनके अधिकार सगे बाप के हुक़ूक़ से बहुत ज़्यादा हैं लेकिन इससे उम्मत हक़ीक़ी औलाद नहीं हो जाती और हक़ीक़ी औलाद के तमाम अहकाम विरासत वग़ैरह उसके लिये साबित नहीं होते. और सब नबियों के पिछले (19)(19) यानी आख़िरी नबी कि नबुव्वत आप पर ख़त्म हो गई. आपकी नबुव्वत के बाद किसी को नबुव्वत नहीं मिल सकती यहाँ तक कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम उतरेंगे तो अगरचे पहले नबुव्वत पा चुके हैं मगर उतरने के बाद शरीअतें मुहम्मदिया पर चलेंगे और इसी शरीअत पर हुक्म करेंगे और आप ही के क़िबले यानी काबए मुअज़्ज़मह की तरफ़ नमाज़ पढेंगे. हुज़ूर का आख़िरी नबी होना क़तई है, क़ुरआनी आयतें भी साबित करती हैं और बहुत सी सही हदीसें भी. इन सब से साबित है कि हुज़ूर सब से पिछले नबी हैं, आपके बाद किसी और को नबुव्वत मिलना संभव जाने, वह ख़त्मे नबुव्वत का इन्कार करने वाला काफ़िर और इस्लाम से बाहर है. और अल्लाह सब कुछ जानता है {40}

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Noor Saba

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