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तफसीर सूरए माइदा – तीसरा रूकू

(1) कि अल्लाह की इबादत करेंगे, उसके साथ किसी को शरीक न करेंगे. तौरात के आदेशों का पालन करेंगे.

(2) हर गिरोह पर एक सरदार, जो अपनी क़ौम का ज़िम्मेदार हो कि वो एहद पूरा करेंगे और हुक्म पर चलेंगे.

(3) मदद और सहायता से.

(4) यानी उसकी राह में ख़र्च करो.

5) वाक़िआ यह था कि अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से वादा फ़रमाया था कि उन्हें और उनकी क़ौम को पाक सरज़मीन का वारिस बनाएगा जिसमें कनआनी जब्बार यानी अत्याचारी रहते थे. तो फ़िरऔन के हलाक के बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का हुक्म हुआ कि बनी इस्त्राईल को पाक सरज़मीन की तरफ़ ले जाओ, मैं ने उसको तुम्हारे लिये सुकून की जगह बनाया है तो वहाँ जाओ और जो दुश्मन वहाँ हैं उनपर जिहाद करो. मैं तुम्हारी मदद फ़रमाऊंगा और ऐ मूसा, तुम अपनी क़ौम के हर हर गिरोह में से एक एक सरदार बनाओ इस तरह बारह सरदार मुक़र्रर करो. हर एक उनमें से अपनी क़ौम के हुक्म मानने और एहद पूरा करने का ज़िम्मेदार हो. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम सरदार चुनकर बनी इस्त्राईल को लेकर रवाना हुए. जब अरीहा के क़रीब पहुंचे तो जासूसों को हालात का जायज़ा लेने के लिये भेजा. वहाँ उन्होंने देखा कि लोग बहुत लम्बे चौड़े, ताक़तवर, दबदबे और रोब वाले हैं. ये उनसे डर कर वापस आ गए और आकर उन्होंने अपनी क़ौम से सारा हाल कहा. जबकि उनको इससे मना किया गया था. लेकिन सब ने एहद तोड़ा, सिवाय कालिब बिन यूक़न्ना और यूशअ बिन नून के कि ये एहद पर क़ायम रहे.

(6) कि उन्होंने अल्लाह का एहद तोड़ा और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद आने वाले नबियों को झुटलाया और क़त्ल किया, किताब के आदेशों की अवहेलना की.

(7) जिसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ और गुणगान है और जो तौरात में बयान की गई हैं.

(8) तौरात में, कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का अनुकरण करें और उनपर ईमान लाएं.

(9) क्योंकि दग़ा और ख़यानत और एहद तोड़ना और नबियों के साथ बदएहदी उनकी और उनके पूर्वजों की पुरानी आदत है.

(10) जो ईमान लाए.

(11) और जो कुछ उनसे पहले हुआ उसपर पकड़ न करो. कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि यह आयत उस क़ौम के बारे में उतरी जिन्होंने पहले तो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से एहद किया फिर तोड़ा. फिर अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को उसपर सूचित किया और यह आयत उतारी. उस सूरत में मानी ये हैं कि उनके इस एहद तोड़ने से दरग़ुज़र कीजिये जबतक कि वो जंग से रूके रहें और जिज़िया अदा करने से मना न करें.

(12) अल्लाह तआला और उसके रसूलों पर ईमान लाने का.

(13) इन्जील में, और उन्होंने एहद तोड़ा.

(14) क़तादा ने कहा कि जब ईसाईयों ने अल्लाह की किताब (इंजील) पर अमल करना छोड़ दिया, और रसूलों की नाफ़रमानी की, फ़र्ज़ अदा न किये, हुदूद की परवाह न की, तो अल्लाह तआला ने उनके बीच दुश्मनी डाल दी.

(15) यानी क़यामत के दिन वो अपने चरित्र का बदला पाएंगे.

(16) यहूदियों और ईसाईयों.

(17) सैयदे आलम, मुहम्मदे मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम)

(18) जैसे कि आयते रज्म और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के गुण और हुज़ूर का इसको बयान फ़रमाना चमत्कार है.

(19) और उनका ज़िक्र भी नहीं करते, न उनकी पकड़ करते हैं. क्योंकि आप उसी चीज़ का ज़िक्र फ़रमाते हैं जिसमें मसलिहत हो.

(20) *सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नूर फ़रमाया गया क्योंकि आपसे कुफ़्र का अंधेरा दूर हुआ और सच्चाई का रास्ता खुला.*

(21) यानी क़ुरआन शरीफ़.

(22) हज़रत इब्ने अब्बास (रदियल्लाहो अन्हुमा) ने फ़रमाया कि नजरान के ईसाईयों से यह कथन निकला. और ईसाईयों के याक़ूबिया व मल्कानिया (सम्प्रदायों) का यह मज़हब है कि वो हज़रत मसीह को अल्लाह बताते हैं क्योंकि वो हुलूल के क़ायल हैं. और उनका झूठा अक़ीदा यह है कि अल्लाह तआला ने हज़रत ईसा के बदन में प्रवेश किया. अल्लाह तआला ने इस आयत में इस अक़ीदे पर कुफ़्र का हुक्म दिया और उनके मज़हब का ग़लत होना बयान फ़रमाया.

(23) इसका जवाब यही है कि कोई कुछ नहीं कर सकता तो फिर हज़रत मसीह को खुदा बताना कितनी खुली ग़लती है.

(24) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास किताब वाले आए और उन्होंने दीन के मामले में आपसे बात चीत शुरू की. आपने उन्हें इस्लाम की दावत दी और अल्लाह की नाफ़रमानी करने से उसके अज़ाब का डर दिलाया तो वो कहने लगे कि ऐ मुहम्मद ! आप हमें क्या डराते हैं ? हम तो अल्लाह के बेटे और उसके प्यारे हैं. इस पर यह आयत उतरी और उनके इस दावे का ग़लत होना ज़ाहिर फरमाया गया.

(25) यानी इस बात का तुम्हें भी इक़रार है कि गिन्ती के दिन तुम जहन्नम में रहोगे, तो सोचो कोई बाप अपने बेटे की या कोई शख़्स अपने प्यारे को आग में जलाता है ? जब ऐसा नहीं, तो तुम्हारे दावे का ग़लत होना तुम्हारे इक़रार से साबित है.

(26) मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम

(27) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बाद, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने तक 569 बरस की मुद्दत नबी से ख़ाली रही. इसके बाद हुज़ूर के तशरीफ़ लाने की मिन्नत का इज़हार फ़रमाया जाता है कि निहायत ज़रूरत के वक़्त तुम पर अल्लाह तआला की बड़ी नेमत भेजी गई और अब ये कहने का मौक़ा न रहा कि हमारे पास चेतावनी देने वाले तशरीफ़ न लाए.

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Shaheel Khan

As-salam-o-alaikum my selfshaheel Khan from india , Kolkatamiss Aafreen invite me to write in islamic blog i am very thankful to her. i am try to my best share with you about islam.
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