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Ramzan

मदीने में रमज़ान

आज भी मदीने के शहरी किसी अजनबी को देखते हैं तो उसे मुहम्मद कह कर पुकारते हैं और साथी को या सिद्दीक़…लिहाज़ा यह दुनिया का वाहिद शहर है जिसमें हर मेहमान हर अजनबी का नाम मोहम्मद और हर साथी सिद्दीक़ है…। अंसार ने हुजूरﷺ की तवाज़ो की और उनकी नस्लें हुजूरﷺ के मेहमानों की खिदमत कर रहे हैं। रमज़ान में सारे मदीने वाले लोग इफ्तारी का साजो सामान लेकर मस्जिद नबवीﷺ में आ जाते हैं ‘दस्तरख्वान बिछा दिए जाते हैं, मेजबान बच्चे मस्जिद नबवी के दालानों, सुतूनों और दरवाजों में खड़े हो जाते जो भी मेहमान नजर आता है…..

वह उसके पैरों से लिपट कर इफ्तार की दावत देते हैं- मेहमान अगर दावत क़ुबूल कर ले तो मेजबान के चेहरे पर रौशनी फैल जाती है, अगर इंकार कर दे तो मेजबान की पलकें गीली हो जाती हैं, मस्जिद नबवीﷺ में दाखिल हुआ तो एक सात आठ साल का बच्चा मेरे पैर से लिपट गया और बड़े प्यार से कहने लगा:
” चाचा, चाचा आप मेरे साथ बैठेंगे-”
मेरे साकित वजूद में एक अजीब सा भूचाल उठा, मैंने झुक कर उसके माथे पर बोसा दिया और सोचा:
” ये लोग वाकई हकदार थे कि रसूलुल्लाह ﷺ अपने अल्लाह के घर से उठकर उनके घर आ ठहरे और फिर वापस नहीं गये- ”

वहाँ रौज़ा ए अतहर के पास एक दरवाजा है………
बाब जिब्रील, आप (صلی الله علیه وسلم) उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीकाرضی اللّٰہ عنہا के हुजरे मुबारक में मौजूद होते थे कहते हैं इफ्तार का वक़्त होता, दस्तरख्वान बिछता, घर में मौजूद कुछ खजूरें और दूध का एक आध प्याला इस दस्तरख्वान पर चुन दिया जाता हज़रत बिलाल अज़ान के लिए खड़े होते तो कहते:
” आयशा बाहर देखो बाब जिब्रील के पास कोई मुसाफ़िर तो नहीं- ”
आप उठकर देखतीं, वापस आ कर अर्ज करतीं:
” या रसूलुल्लाह ﷺ वहाँ एक मुसाफ़िर बैठा है-” ”आप (صلی الله علیه وسلم) खजूरें और दूध का वह प्याला बाहर भिजवा देते-
मैं जैसे ही बाब जिब्रील के पास पहुंचा, मेरे पैरों के नाखूनों से जांघों की हड्डियों तक सब कुछ पत्थर हो गई, वही बैठ गया, बाब जिब्रील के अंदर थोड़ी सी हटकर हज़रत आयशा के हुजरे में मेरे हुजूरﷺ आराम फरमा रहे हैं- मैंने दिल पर हाथ रखकर सोचा:
“आज भी रमज़ान है-अब कुछ ही सेकंड बाद अज़ान होगी-”
हो सकता है आज भी मेरे हुजूर ﷺ हज़रत आयशा से पूछेँ:
“ज़रा देखिए बाहर कोई मुसाफ़िर तो नहीं- ”
और उम्मुल मोमिनीन अर्ज करेंगी:
” या रसूलुल्लाह ﷺ बाहर एक मुसाफ़िर बैठा है, शक्ल से मिस्कीन नज़र आता है, अफसोस है, शर्मसार है, थका हारा है, सवाल करने की हिम्मत नहीं, भिखारी है लेकिन मांगने की हिम्मत नहीं, लोग यहाँ कशकोल लेकर आते हैं ‘यह खुद कशकोल बनकर आ गया, उस पर रहम कीजिए या रसूलुल्लाह ﷺ बेचारा सवाली है, बेचारा भिखारी है-”
और फिर मेरा पूरा वजूद आँखें बन गया और सारे आज़ा आंसू बन गए…!!

Source : Facebook Page

Aafreen Seikh is an Software Engineering graduate from India,Kolkata i am professional blogger loves creating and writing blogs about islam.
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