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मां की बद्दुआ

मुस्लिम व बुखारी में ये वाक़िआ हज़रत अबू हुरैरा رضی اللہ تعالیٰ عنہ से मरवी है कि नबी صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने बयान किया कि:
“जरीज एक इबादत गुज़ार आदमी थे- उन्होंने आबादी से बाहर एक इबादतगाह बना ली और उसी में रहा करते थे- एक बार उनकी मां उनके पास आईं इस हाल में कि वो नमाज़ में मशगूल थे-”
मां ने पुकारा:
” ऐ जरीज !”
कहने लगे:
” या रब ! एक तरफ मेरी मां है और दूसरी तरफ मेरी नमाज़ है (किसे इख्तियार करूं?)”
चुनांचा अपनी नमाज़ ही में लगे रहे और मां वापस चली गई-
दूसरा दिन हुआ तो मां फिर आई और उस वक़्त भी जरीज अपनी नमाज़ में मशगूल थे-
मां ने कहा:
” ऐ जरीज!”
उन्होंने कहा:
“या रब! मेरी मां है और मेरी नमाज़ है-”
और फिर अपनी नमाज़ में लगे रहे, मां वापस पलट गई-(तीसरे दिन भी यही वाक़िआ हुआ) मां आई जरीज को पुकारा,जरीज नमाज़ में मशगूल थे, उन्होंने अपनी मां को जवाब देने के मुक़ाबले में नमाज़ में मशगूल रहना इख्तियार किया-

मां वापस हो गई लेकिन जाते जाते ये बद दुआ कर गई कि :
“ऐ अल्लाह ! जरीज को उस वक़्त तक मौत ना देना जब तक ज़ानिया (बदकार औरत) का चेहरा ना देख ले-”
एक दिन की बात है कि बनू इस्राईल आपस में जरीज और उनकी इबादत का ज़िक्र कर रहे थे कि एक बदकार औरत ने जिसके हुस्नो जमाल की मिसाल दी जाती थी कहा कि:
” अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारे लिए जरीज को फित्ने में मुब्तिला कर दूं ?”
चुनांचा उस औरत ने जरीज को अपने जाल में फंसाना और फित्ने का शिकार बनाना चाहा लेकिन जरीज ने उसकी तरफ कोई तवज्जह नहीं दी-
बिल आखिर एक चरवाहे के पास चली गई जो उनकी इबादतगाह के क़रीब पनाह लिया करता था- औरत ने अपने आप को चरवाहे के हवाले कर दिया और चरवाहे से ज़िना के नतीजे में हामिला हो गई- जब बच्चा पैदा हुआ तो उसने कहा कि:
“ये जरीज का बच्चा है-”
लोग जरीज के पास आए और उन्हें अपनी इबादतगाह से नीचे उतरने के लिए कहा और उनकी इबादतगाह ढाने लगे और उन्हें भी मारा- जरीज ने दरियाफ्त किया कि:
” क्या बात है ?”

लोगों ने जवाब दिया कि:
“तुमने इस बदकार के साथ ज़िना किया है, और इसके पेट से तुम्हारा बच्चा पैदा हुआ है-”
जरीज ने पूछा कि:
” वो बच्चा कहां है? लोग उसे लेकर आए-”
जरीज ने कहा:
“मुझे ज़रा नमाज़ पढ़ने दो-”
नमाज़ पढ़कर फारिग होने के बाद जरीज बच्चे के पास आए और उसके पेट में कोंच कर कहा:
“ऐ बच्चे! तेरा बाप कौन है?”
बच्चे ने जवाब दिया:
“फलां चरवाहा-”
ये सुनना था कि लोग जरीज को चूमने लगे और अपने रवय्ये की मुआफी मांगने लगे-
जरीज ने कहा:
” इसमें तुम लोगों का कोई क़ुसूर नहीं है दरअसल ये मेरी मां की बद दुआ का असर है- मेरी मां मुझसे मिलने आई थीं लेकिन मैं नमाज़ में मशगूल था- वो तीन दिन आकर वापस चली गई और मुझसे ना मिल पाईं- तो गुस्से में वो मुझे बद दुआ देकर चली गई थीं कि मैं बदकार औरत का चेहरा देखूं तो ऐ लोगो मेरी मां की बद दुआ की वजह से ये सारा कुछ हुआ-”

लोग कहने लगे:
“हम आपकी इबादतगाह सोने से तामीर कर देते हैं-”
जरीज ने कहा:
“नहीं मेरी इबादतगाह उसी तरह मिट्टी की बना दो जिस तरह से थी-”
चुनांचा लोगों ने ऐसा कर दिया..!!
صحيح البخاري (2/ 63) 1206 , صحيح مسلم (4/ 1976)7 – (2550)

ग़ौर करने का मक़ाम है कि जरीज दुनियांवी काम की वजह से या लापरवाही की वजह से मां की नाफरमानी नहीं कर रहे हैं बल्कि इबादते खुदावंदी में मशगूल होने की वजह से मां से नहीं मिल पाए लेकिन फिर भी अल्लाह तबारक व तआला ने एक मां की ज़बान से निकले हुए अल्फाज़ों को क़ुबूल कर लिया और जरीज को बदकार औरत का चेहरा दिखा दिया अब हम सोचें कि जब इबादते इलाही में मशगूलियत भी मां की तकलीफ़ अल्लाह मुआफ नहीं कर रहा है तो हम जो बिना वजह अपने वालिदैन की नाफरमानी करते हैं उनके हुक्म को नज़रअंदाज़ करते हैं हमारा अंजाम क्या हो सकता है और दूसरी तरफ इसलिए मां बाप को भी कहा गया है कि अपनी औलाद के लिए बगैर सोचे समझे गुस्से में बद दुआएं ना करें क्यूंकि गुस्सा ठंडा हो जाएगा मगर ज़बान से निकले हुए अल्फाज़ आपकी औलाद को अज़ीयत में मुब्तिला कर देंगे…
अल्लाह तबारक व तआला अपने महबूबे पाक ﷺ के तुफैल हमे वालिदैन का फरमां बरदार बनाए…
आमीन

Aafreen Seikh is an Software Engineering graduate from India,Kolkata i am professional blogger loves creating and writing blogs about islam.
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