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Ramzan

रमजान की फजीलत माहे रमजान की बहारें

रोजा एक ऐसी इबादत है जो तकरीबन सभी नबीयों की उम्मतों पर फर्ज था। इसलिए तो अल्लाह पाक ने कुरआन मजीद में फरमाया है कि ईमान वालों जिस तरह उन पर रोजा फर्ज किया गया है उसी तरह तरह तुम पर भी रोजा फर्ज किया गया है,
ताकि इंसान परहेजगार बनकर अल्लाह की इबादत का हक अदा करें और उसके बंदों की खिदमत करें।
रोजा हमारी बीमारियों का इलाज भी है। इसकी बरकत से इंसान के अंदर रुहानी ताकत आती है।
रोजा तो बुराई के मुकाबलों में एक ढाल की हैसियत रखता है। जिस तरह ढाल से आदमी दुश्मन के वार से बच जाता है, अपने आपको बचा लेता है, उसी तरह रोजा रोजेदारों के लिए कयामत के दिन ढाल साबित होगा, उसे जहन्नुम में जाने से बचा लेगा। रोजा रखने की बरकत से रोजेदार के बदन में नूर का बहाव तेज हो जाता है, जिससे जेहन की रफ्तार भी तेज हो जाती है।
अल्लाह के प्यारे रसूल ने सल्ललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने खुशखबरी देते हुए फरमाया है जो आदमी इस महीने में दीनी भाई को सदका करेगा, उसे सारी दुनिया की दौलत सदका करने जितना सवाब मिलेगा..
इसलिए हमें चाहिए की इस माहे मुबारक में गरीब, यतीम व मिस्किन को ज्यादा से ‘ज्यादा जकात, फितरा सदका आदि दें और माहे मुबारक में अपने हिस्से की नेकिया हासिल करें.

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