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Buzurgan-e-deen

Ahmed Raza khan Barelvi

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जिस से जिगरे लाला में ठण्डक हो वह शबनम दरियाओं के दिल जिस से दहल जायें वह तूफां इमाम अहमद रज़ा खां बरेलवी कुद्देस सिर्रहू जिस तरह अपने दौर में मर्कजे दायरए उलूम व फुनून थे ।
उसी तरह मस्त जामे बादए उल्फ़त होने में मुन्फरिद और महबूबे परवरदिगार , अहमदे मुख़्तार सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के शैदाइयों में अपनी मिसाल आप थे । आप का इश्के रसूल एक पिघलती हुई शमा होना मशहूरे खलाइक है
जिस का मोतकिदीन व मुखालिफ़ीन सब को एतराफ है । मैदाने अमल में मोहब्बत का इज़हार चार तरह होता है ।
(1) महबूब के फिराक में तड़पना , वेस्ल को मन्ज़िले मकसूद समझना और उसके ज़िक्र व फिक्र में मुस्तग़रक रहना ।
(2) महबूब के यारों और प्यारों का दिली मोहब्बत से अदब व एहतराम करना ।
(3) महबूब के हर कौल व फेअल को महबूब समझ कर अपना दस्तूरूल अमल बनाए रखना ।
(4) महबूब के दुश्मनों से दिली नफ़रत रखना । आला हज़रत कुद्देस सिरहू की सीरत का मरकज़ व महवर , सिर्फ और सिर्फ जज़्बए इश्के रसूल था । अगर मुजद्दिदे हाज़िरा की सीरत कोई चन्द लफ्जों में पूछना चाहे तो फकीर गुलाम मुस्तफा जीलानी (गुलाम जीलानी) बिला खौफे तरदीद , अलल एलान कहता है
कि ” आला हज़रत की सीरत इशके रसूल के तकाज़ों का मजमूआ थी । ” आप की जुमला तसानीफ हमारे इस दावा के रौशन दलाइल हैं
और नातिया दीवान ” हदाइके बख्शिश “ तो वह मुंह बोलता सुबूत है जिस की नज़ीर चश्मे फलक कुहन ने कम ही देखी होगी ।
नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से आप की वालिहाना मोहब्बत के सिलसिले में यहां बहस करना तकरार का मोजिब और बाइसे तवालत होगा जबकि दूसरी किताब के अन्दर आपके नातिया कलाम का नमूना मौजूद है ।

Aala Hazrat Imam Ahmed Raza Khan رضي الله عنه Faazil e Bareilly Sharif ki muqaddas zindagi in Hindi, Life of aalahazrat

नीज़ मन्सबे रिसालत के तहत उस किताब में मुख्तलिफ़ उनवानात पर आप की निगारिशात का खुलासा पेश किया जाएगा इन्शाअल्लाह तआला । अब देखना यह है कि इमाम अहमद रज़ा खां बरेलवी को नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के यारों और प्यारों की किस कदर दिली मोहब्बत थी
और किस दर्जा आप उनका अदब व एहतराम करते थे । इस अम्र का भी एक आलम शाहिद है कि फाजिले बरेलवी जैसा अंबियाए किराम व औलियाए एज़ाम के नंग व नामूस का पासबान और ताज़ीम व तौकीर का अलमबरदार दूसरा देखने में नहीं आया , बल्कि बाज़ हज़रात तो अपनी दूरबीन निगाहों से देख कर यहां तक फ़रमा गए
कि अगर इस दौरे पुर फेतन में इमाम अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी पैदा न होते तो मुकर्रेबीने बारगाहे इलाहिया के अदब व एहतराम को वहाबियत की तुन्द व तेज़ आंधी ख़स व खाशाक की तरह उड़ा कर ले जाती ।
चूंकि इस सिलसिले में कई मसाइल शामिले मजमूआ हैं लिहाज़ा ज़्यादा अर्ज़ करने की यहां हाजत नहीं । हज़रत गौसे आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की अकीदत के बारे में मौलाना बदरूद्दीन अहमद साहब ने एक वाकिआ बयान किया है
जो मौसूफ के अल्फाज़ में यूं है । ” छ बरस की उम्र में आप ने मालूम कर लिया था कि बग़दाद शरीफ किधर है , फिर उस वक्त से आख़िर दम तक बगदाद शरीफ की जानिब पांव नहीं फैलाए । आला हज़रत के नामवर शागिर्द व खलीफा हज़रत मुहद्दिस आजमे हिन्द किछौछवी सैयद अहमद अशरफ जीलानी अलैहिर्रहमा ने इस सिलसिले में एक वाकिआ यूं बयान किया है । ” मैं उस सरकार में किस कदर शोख़ था या शौख बना दिया गया था ,
अपना जवाब आला हज़रत की नशिस्त की चारपाई पर रख कर अर्ज़ करने लगा हुजूर ! क्या इस इल्म का कोई हिस्सा अता न होगा , जिस का उलमाए किराम में निशान भी नहीं मिलता । मुस्कुराकर फ़रमाया कि मेरे पास इल्म कहां , जो किसी को दूं । यह तो आप के जद्दे अमजद सरकारे गौसीयत का फ़ज़ल व करम है और कुछ नहीं ।
यह जवाब मुझ नंगे खान्दान के लिए ताज़ियानए । इबरत भी था कि लूटने वाले लूट कर खज़ाना वाले हो गए और मैं ” पिदरम सुल्तान बूवद ” के नशा में पड़ा रहा और यह जवाब इसका भी निशान देता था कि इल्मे रासिख वाले मकामे तवाज़ो में क्या होकर अपने को क्या कहते हैं ।
यह शोखी मैंने बार बार की और यही जवाब अता होता रहा और हर मर्तबा में ऐसा हो गया कि मेरे वजूद के सारे कुल पुर्जे मुअत्तल हो गए हैं ।
इसी सिलसिले में हज़रत मुहद्दिस आजम किछौछवी एक दूसरा वाकिआ और बयान फ़रमाते हैं , जो मौसूफ के तब्सरे के साथ कारेईने किराम की खिदमत में पेश करने की सआदत हासिल कर रहा हूं ।
” दूसरे दिन कारे इफता पर ( मुहद्दिस आजमे हिन्द साहब को ) लगाने से पहले , खुद गियारह रूपये की शीरीनी मंगाई . अपने पलंग पर मुझको बिठाकर और शेरीनी रख कर , फातिहा गौसिया पढ़कर , दस्ते करम से शीरीनी मुझको भी अता फरमाई और हाज़िरीन में तकसीम का हुक्म दिया कि अचानक आला हज़रत पलंग से उठ पड़े । सब हाज़िरीन के साथ मैं भी खड़ा हो गया कि शायद किसी शदीद हाजत से अन्दर तशरीफ ले जायेंगे ।
लेकिन हैरत बालाए हैरत यह हुई कि आला हज़रत ज़मीन पर उकडूं बैठ गए । समझ में न आया कि यह क्या हो रहा है ?

Aala Hazrat Imam Ahmed Raza Khan رضي الله عنه Faazil e Bareilly Sharif ki muqaddas zindagi in Hindi, Life of aalahazrat
देखा तो यह देखा कि तकसीम करने वाले की गफलत से शीरीनी का एक ज़र्रह ज़मीन पर गिर गया था और आला हज़रत उस ज़रें का नोके ज़बान से उठा रहे हैं और फिर अपनी नशिस्त गाह पर बदस्तूर तशरीफ़ फ़रमा हुए ।
इसको देखकर सारे हाज़िरीन सरकारे गौसीयत की अज़मत व मोहब्बत में डूब गए और फातिहा गौसिया की शीरनी के एक एक ज़र्रे के तबलैक हो जाने में किसी दूसरी दलील की हाजत न रह गई

और अब मैं ने समझा कि बार बार जो मुझसे फ़रमाया गया कि मैं कुछ नहीं , यह आप के जद्दे अमजद का सदका है , वह मुझे ख़ामोश कर देने के लिए ही न था और न सिर्फ मुझको शर्म दिलाना ही थी बल्कि दर हकीकत आला हज़रत , गौसे पाक के हाथ में ” चूं कलम दर दस्ते कातिब ” थे , जिस तरह गौसे पाक , सरवरे दो आलम मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम के हाथ में चूं कलम दर दस्ते कातिब थे और
कौन नहीं जानता कि रसूले पाक अपने रब की बारगाह में ऐसे थे कि कुरआने करीम ने फरमाया
। व मा यनतिकु अनिल हवा इन हुवा इल्ला वहियुन यूहा ।
नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की औलादे अमजाद यानी हज़रात सादाते किराम का इमाम अहमद रजा खां बरेलवी किस दर्जा अदब व एहतराम करते और ताजीम व तौकीर बजा लाते , ऐसे बेशुमार वाकिआत हैं ।
एक वाकिआ मुलाहज़ा हो । 
किसी रोज़ एक सैयद साहब ने ज़नान खाने के दरवाजे पर आकर आवाज़ दी : ” दिलवाओ सैयद को ” आला हज़रत ने अपनी आमदनी से अख़राजाते उमूरे दीनिया के लिए दो सौ रूपया माहवार मुकर्रर फ़रमाए थे । उस माह की रकम उसी रोज़ आप को मिली थी । सैयद साहब की आवाज़ सुनते ही फौरन वह रूपयों वाला आफ़िस बक्स लेकर दौड़े और सैयद साहब के सामने पेश कर के फ़रमायाः हुजूर ! यह नज़राना हाज़िर है ।
सैयद साहब काफी देर तक इस रकम को देखते रहे और फिर एक चवन्नी उठा कर फ़रमायाः बस ले जाइए । आला हज़रत ने ख़ादिम से फरमाया कि जब इन सैयद साहब को देखो तो फौरन एक चवन्नी नज़ कर दिया करना ताकि उन्हें सवाल करने की ज़हमत न उठानी पड़े । ” मैं इक मुहताजे बे वकअत गदा तेरे सगे दर का तेरी सरकार वाला है , तेरा दरबार आली है इसी सिलसिले में एक दूसरा ईमान अफ़रोज़ वाकिआ मुलाहिज़ा फ़रमाईए , जो दर्से अदब का आईना है
एक दफ़ा बाद नमाजे जुमा आला हज़रत फाटक में तशरीफ़ फ़रमा थे कि शैख़ इमाम अली कादरी रज़वी ( मालिक होटल आइस्क्रीम बम्बई ) के छोटे भाई ( मौलवी नूर मुहम्मद साहब जो उन दिनों बरैली शरीफ़ में पढ़ते थे ) के कनाअत अली , कनाअत अली पुकारने की आवाज़ आई । आला हज़रत कुद्देस सिरहू ने उन्हें बुलवाया और फ़रमाया किः अज़ीज़म ! सैयद साहब को इस तरह पुकारते हो ? मौलवी नूर मुहम्मद साहब ने नदामत से नज़रें झुका लीं । आप ने फ़रमायाः सादात की ताजीम का आइन्दा ख्याल
रखिए
और जिस आली घराने के यह अफराद हैं उसकी अज़मत को हमेशा पेशे नज़र रखिए । इसके बाद हाज़िरीन को मुखातिब करके फ़रमाया कि सादात का इस दरजा एहतराम मल्हूज़ रखना चाहिए कि काज़ी अगर किसी सैयद पर हद लगाए . तो यह ख्याल तक न करे कि मैं इसे सज़ा दे रहा हूं बल्कि यूं तसव्वुर करे कि शाहज़ादे के पैरों में कीचड़ भर गई है उसे धो रहा हूं ।

तेरी नस्ले पाक में है बच्चा बच्चा नूर का
तू है ऐने नूर तेरा सब घराना नूर का

Aala Hazrat Imam Ahmed Raza Khan رضي الله عنه Faazil e Bareilly Sharif ki muqaddas zindagi in Hindi, Life of aalahazrat

सादात के एजाज़ व इकराम के मुताल्लिक एक सबक आमोज़ वाकिआ और आला हज़रत का मामूल मुलाहिजा होः
आला हज़रत के हां दस्तूर था कि मीलाद शरीफ के मौका पर सैयद हज़रात को आप के हुक्म से दो गुना हिस्सा मिला करता था । एक दफ़ा सैयद महमूद जान साहब को तकसीम करने वाले की गलती से इकहरा हिस्सा मिला । आला हज़रत को मालूम हुआ तो फौरन तक़सीम करने के वाले को बुलवाया और उस में एक ख्वान शीरीनी को भरवा कर मंगवाया , फिर माज़रत चाहते हुए सैयद साहब मौसूफ की नज्र किया और तक़सीम करने वाले को हिदायत की
कि कोई आइन्दा ऐसी गलती का इआदा न हो
क्योंकि हमारा क्या है ?
सब कुछ इन हज़रात के ही आली घराने की भीक है । इसी लिए तो आला हज़रत कुद्देस सिर्रहू बारगाहे रिसालत में यूं अर्ज परदाज़ हुआ करते थे ।
आसमां ख्वां , ज़मीन ख्वा , ज़माना मेहमां साहबे खाना लकब किस का है ?
तेरा इस दौरे पुर फेतन में जबकि शाने रिसालत में लोग गुस्ताखियां और जरी हो गए . बाज़ तो वहाबियत की नुहूसत के जेरे असर गज़ गज़ भर की जुबान निकाल कर मन्सबे नबुब्बत पर इस अन्दाज़ से गुफ्तगू करते हैं
कि सुनने वाला यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि या इलाही ! क्या यह एक उम्मती कहलाने वाले के अल्फाज़ हैं ?
क्या इसने मुसलमान कहलाने के जुमला हुकूक महफूज़ करवा छोड़े हैं ? यह तौहीद के तो साफ नज़र आएगा कि सुन्नते रसूल के आप हद दर्जा मुत्तबे और महबूब की रज़ा जोई में हर वक्त कोशां रहते थे ।
अरब व अजम के मुम्ताज़ अहले इल्म और बा कमाल हज़रात ने भी तस्लीम किया है कि फ़ाज़िले बरेलवी कुद्देस सिर्रहू जैसा माहीए सुन्नत और कातेए बिदअत उस दौर में कोई देखा नहीं गया ।
इत्तिबाए सुन्नत आप की फ़ितरते सानिया बन गया था । यह हालात की सितम ज़रीफ़ी है कि मुब्तदेईने ज़माना जिन की जमाअतें तक बिदअत और ब्रिटिश गवर्नमेन्ट के अहद की ज़िन्दा यादगार हैं
और जो कुफ़िया बिदआत तक के मुरतकिब व मोतकिद है वह फाज़िले बरैलवी जैसे मुत्तबए सुन्नत और दुशमने बिदअत पर न सिर्फ बिदअती बल्कि सर चश्मए बिदआत होने का इलज़ाम लगा कर हकीकते हाल से बे खबर मुसलमानों को गुमराह करने में मसरूफ रहते है
और इस तरह अपने अकाबिर की बे राह रवी पर पर्दा डालने की ग़र्ज़ से कैसे कैसे बुजुर्गो पर बुहतान बाज़ी और इलज़ाम तराशी का बाज़ार गर्म किए रखते हैं ।
जैल में आला हज़रत के एहतिमामे शरीअत और इत्तिबाए सुन्नत के चन्द वाकिआत और आप के मामूलात पेश किए जाते हैं ।
इकामते सलातः 
इस सिलसिले में सैयद , अय्यूब अली रज़वी का बयान मुलाहज़ा होः ” आला हज़रत तन्दुरूस्त हों या बीमार । पांचों वक्त मस्जिद में बा जमाअत नमाज़ अदा करने के खूगर थे और अपने मुरीदों को भी हमेशा इस अम्र की ख़ास हिदायत फ़रमाया करते थे । जमाअत का मुकर्रर वक्त हो जाने पर किसी का इन्तिज़ार न करते थे । मौसमे गर्मा में नमाज़ ज़रा देर करके पढ़ते लेकिन ऐसा नहीं कि मकरूह वक्त आ जाए । नमाज़ अदा करते वक्त रूकू , सुजूद , कौमा , कादा और जलसा वगैरह की सहीह अदायगी का खास ख्याल रखते थे । आप हुरूफ को उनके मख़ारिज से सिफाते लाज़िमा व मुहस्सिना के साथ अदा करने में बहुत एहतियात फ़माया करते थे ।
तो साफ नज़र आएगा कि सुन्नते रसूल के आप हद दर्जा मुत्तबे और महबूब की रज़ा जोई में हर वक्त कोशां रहते थे । अरब व अजम के मुम्ताज़ अहले इल्म और बा कमाल हज़रात ने भी तस्लीम किया है
कि फ़ाज़िले बरेलवी कुद्देस सिर्रहू जैसा माहीए सुन्नत और कातेए बिदअत उस दौर में कोई देखा नहीं गया ।
इत्तिबाए सुन्नत आप की फ़ितरते सानिया बन गया था । यह हालात की सितम ज़रीफ़ी है कि मुब्तदेईने ज़माना जिन की जमाअतें तक बिदअत और ब्रिटिश गवर्नमेन्ट के अहद की ज़िन्दा यादगार हैं
और जो कुफ़िया बिदआत तक के मुरतकिब व मोतकिद है वह फाज़िले बरैलवी जैसे मुत्तबए सुन्नत और दुशमने बिदअत पर न सिर्फ बिदअती बल्कि सर चश्मए बिदआत होने का इलज़ाम लगा कर हकीकते हाल से बे खबर मुसलमानों को गुमराह करने में मसरूफ रहते है और इस तरह अपने अकाबिर की बे राह रवी पर पर्दा डालने की ग़र्ज़ से कैसे कैसे बुजुर्गो पर बुहतान बाज़ी और इलज़ाम तराशी का बाज़ार गर्म किए रखते हैं ।
जैल में आला हज़रत के एहतिमामे शरीअत और इत्तिबाए सुन्नत के चन्द वाकिआत और आप के मामूलात पेश किए जाते हैं । इकामते सलातः इस सिलसिले में सैयद , अय्यूब अली रज़वी का बयान मुलाहज़ा होः ” आला हज़रत तन्दुरूस्त हों या बीमार । पांचों वक्त मस्जिद में बा जमाअत नमाज़ अदा करने के खूगर थे और अपने मुरीदों को भी हमेशा इस अम्र की ख़ास हिदायत फ़रमाया करते थे । जमाअत का मुकर्रर वक्त हो जाने पर किसी का इन्तिज़ार न करते थे । मौसमे गर्मा में नमाज़ ज़रा देर करके पढ़ते लेकिन ऐसा नहीं कि मकरूह वक्त आ जाए । नमाज़ अदा करते वक्त रूकू , सुजूद , कौमा , कादा और जलसा वगैरह की सहीह अदायगी का खास ख्याल रखते थे । आप हुरूफ को उनके मख़ारिज से सिफाते लाज़िमा व मुहस्सिना के साथ अदा करने में बहुत एहतियात फ़माया करते थे ।
एक दफा कोई साहब जुहर की चार सुन्नतें पढ़कर फ़ारिग हुए तो आप ने उनको अपने पास बुलाया और फ़रमाया कि आप की एक रकआत भी नहीं हुई ।
क्योंकि सज्दा करते वक़्त आप की नाक ज़मीन से अलाहदा रही नीज़ पैरों की उंगलियों में से किसी एक का पेट ज़मीन से नहीं लगा था कि कम अज़ कम फ़र्ज़ तो अदा हो जाता , वाजिबात व सुनन व मुस्तहब्बात तो अलाहदा रहे । आप सुन्नतें फिर पढ़िये और हमेशा इस बात का ख्याल रखिए कि नाक की हड्डी , जिस को बांसा कहते हैं ( अपनी नाक पर उंगली रख कर बताया ) यह और पैरों की कम अज़ कम एक उंगली का पेट ज़मीन से लगा रहना चाहिए
वरना अगर कोई शख़्स नूह अलैहिस्सलाम की बराबर भी उम्र पाए और इसी तरह नमाजें पढ़ता रहेगा , तो याद रखिए कि वह सब अकारत ही जायेंगी ।
मैं ने आला हज़रत को अक्सर औकात सफ़ेद लिबास में ही मलबूस देखा था । पाजामा बड़े पाइंचा का पहनते थे । नमाज़ के वक्त हमेशा पगड़ी सर पर रखते थे और फर्ज तो बगैर पगड़ी के कभी अदा नहीं किया ।

Aala Hazrat Imam Ahmed Raza Khan رضي الله عنه Faazil e Bareilly Sharif ki muqaddas zindagi in Hindi, Life of aalahazrat

एक दफ़ा अशरह मुहर्रमुल हराम के दिनों में एक साहब बादे नमाजे जुमा आला हज़रत के फाटक में तशरीफ़ फ़रमा थे । उनके सर पर स्याह टोपी थी । आला हज़रत ने उन्हें देखा तो अपने दौलत खाना से सफेद टोपी मंगवाकर उनको देते हुए फ़रमाया कि इसे ओढ़ लीजिए और स्याह टोपी उतार दीजिए कि इसमें इज़्ज़दारों से मुशाबिहत का शुबह है । एक वलीए कामिल और मुजद्दिदे वक़्त की टोपी मिलने पर हाज़िरीन को उन साहब के मुकद्दर पर रश्क आ रहा था । एक दफा आला हज़रत सख़्त बीमार थे । नशिस्त व बरखास्त की बिल्कुल ताकत न थी ।
इस के बावजूद फ़र्ज़ नमाज़ मस्जिद में बा जमाअत अदा करते थे इन्तिज़ाम यह था कि कुर्सी बांध कर चार आदमी आप को मस्जिद में ले जाते और बादे नमाज़ दौलत खाना में पहुंचा देते । बारहा मैं ने अपनी आंखों से देखा कि इस नाजुक हालत में भी आप खड़े होकर नमाज़ पढ़ने का इरादा करते , ताक़त न देखते हुए मजबूरन बैठ कर पढ़नी पड़ती , लेकिन ऐसी हालत में भी दोनों पैरों की उंगलियों के पेट ज़मीन पर लगाने की बेहद सई फ़रमाते ।

 Aala Hazrat Imam Ahmed Raza Khan رضي الله عنه Faazil e Bareilly Sharif ki muqaddas zindagi in Hindi, Life of aalahazrat    एहतरामे मसाजिद 

 हर मस्जिद खुदा का घर , इबादत का मकाम और शआएरूल्लाह में शामिल है । शआएरुल्लाह का एहतेराम तकवा की निशानी है । इमाम अहमद रज़ा खां बरेलवी मस्जिद के छोटे छोटे आदाब का भी बड़ा ख्याल रखते थे । सैयद अय्यूब अली रज़वी मरहूम ने बाज़ चश्म दीद हालात यूं बयान किए हैं ।
‘ नमाजे जुमा के लिए आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैहि जिस वक्त तशरीफ लाते तो फर्श मस्जिद पर कदम रखते ही तक़दीमे सलाम फरमाते । इसी तरह मस्जिद के जिस दर्जा में दुरूद होता जाता आप सलाम की तकदीम करते । इस बात की भी आंखें शाहिद हैं कि मस्जिद के हर दर्जा में वस्ती दर से दाखिल हुआ करते ख्वाह आस पास के दरों से दाखिल होने में सुहूलत ही क्यों न हो ।
नीज़ बाज़ औकात औराद व वज़ाइफ मस्जिद में ही बहालते खराम शेमालन जुनूबन पढ़ा करते मगर मुन्तहाए फर्श मस्जिद से वापस हमेशा किब्ला रू हो कर ही होते , किब्ला की तरफ पुश्त करते हुए कभी किसी ने नहीं देखा । मस्जिद के आदाब में दाखिल है कि अन्दर दाखिल होते वक्त दायां कदम रखा जाए और मस्जिद से जाते वक्त पहले बायां क़दम बाहर रखना चाहिए ।
सैयद अय्यूब अली रजवी की ज़बानी इमाम अहले सुन्नत का अमल मुलाहज़ा फरमाइए । ‘ एक दफा फरीज़ए फज्र अदा करने में खिलाफे मामूल किसी कदर देर हो गई । नमाज़ियों की नज़रें बार बार काशानए अकदस की तरफ उठ रही थीं कि इसी अस्ना में आप जल्दी जल्दी तशरीफ लाते हुए दिखाई दिए ।
उस वक्त बिरादरम सैयद कनाअत अली ने अपना यह ख्याल मुझ पर ज़ाहिर किया कि इस तंग वक्त में देखना यह है कि हज़रत दायां कदम मस्जिद में पहले रखते हैं या बायां ? लेकिन कुरबान जायें इस आशिके रसूल और मुत्तबए सुन्नत के . कि दरवाज़ए मस्जिद के जीने पर जिस वक़्त कदमे मुबारक रखा तो दायां , तौसीई फर्श मस्जिद पर कदम पहले रखा तो दायां , कदीमी फर्श मस्जिद पर भी दायां कदम पहले रखा , यूं ही हर सफ पर तकदीम दायें कदम ही से फरमाई . हत्ता कि मेहराब में मुसल्ले पर दायां कदम ही पहले पहुंचा । ”
आदाबे मस्जिद के सिलसिले में सैयद अय्यूब अली रज़वी का एक चश्म दीद वाकिआ और मुलाहज़ा फरमाइए । एक साहब जिन्हें नवाब साहब कहा जाता था , मस्जिद में नमाज पढ़ने आए और खड़े खड़े बे परवाई से अपनी छड़ी मस्जिद के फर्श पर गिरा दी , जिस की आवाज़ हाज़िरीने मस्जिद ने सुनी ।
आला हज़रत ने फरमाया । नवाब साहब मस्जिद में ज़ोर से क़दम रख कर चलना भी मना है , फिर कहां छड़ी को इतने ज़ोर से डालना ? नवाब साहब ने मेरे सामने अहद किया कि इन्शाअल्लाह तआला आइन्दा ऐसा नहीं होगा । शआएरुल्लाह की ताजीम व तौकीर कुरआनी इस्तेलाह में दिली तकवा की निशानी है । आइए देखें तो सही कि मुजद्दिदे हाज़िरा कुद्देस सिरहू मस्जिद का अदब व ऐहतराम कहां तक मलहूज़ रखते थे ।
अल्लामा जफरूद्दीन बिहारी अलैहिर्रहमा रकमतराज़ हैं । ” एक मर्तबा सैयदी इमाम अहमद रज़ा खां मस्जिद में मोतकिफ थे । सर्दी का मौसम था और देर से मुसलसल बारिश हो रही थी । हज़रत को नमाजे इशा के लिए वजू करने की फिक्र हुई । पानी तो मौजूद था लेकिन बारिश से बचाव की कोई जगह ऐसी न थी जहां वुजू कर लिया जाता , क्योंकि मस्जिद में मुस्तामल पानी का एक कतरा तक गिराना भी जाइज़ नहीं है

Aala Hazrat Imam Ahmed Raza Khan رضي الله عنه Faazil e Bareilly Sharif ki muqaddas zindagi in Hindi, Life of aalahazrat

आखिर कार मजबूर होकर मस्जिद के अन्दर ही लेहाफ और गद्दे की चार तह करके उन पर वुजू कर लिया । और एक कतरा तक फर्श मस्जिद पर गिरने नहीं दिया । सर्दियों की रात , जिस में तूफ़ाने बादोबारां के इज़ाफात , मगर खुद इतनी सर्दी में ठिठुरते हुए रात गुज़ारनी मंजूर की लेकिन ऐसी दुशवारी में भी मस्जिद की इतनी सी बे हुर्मती बर्दाशत न की ।
क्या इस दर्जा मस्जिद का एहतेराम मलहूज़ रखने वाला कोई शख्स आप की नज़र से गुज़रा है ? आम तौर पर तो यही देखने में आता है कि दीनी तरबीयत गाहों के तलबा और असातजा तक बाज़ औकात जमाअत में शामिल होने की खातिर , रकअत जाती हुई देख कर भाग दौड़ भी लेते हैं और आज़ाए वजू का पोछे बगैर मस्जिद के फर्श पर चल फिर लेते हैं हालांकि इस तरह मस्जिद की सफें मुस्तामल पानी से गीली होती हैं , वुजू करने के बाद पानी के कतरे तक मस्जिद में टपकते रहते हैं
जबकि यह उमूर एहतेराम मस्जिद के खिलाफ हैं । काश ! इमामे अहले सुन्नत के मामूलात से मुसलमान सबक़ हासिल करें ।
नाबालिग बहिश्ती मुअल्लिमीन हज़रात तवज्जोह नहीं फ़रमाते और नाबालिग शागिर्दो से बगैर उनके वालिदैन की इजाज़त के ख़िदमत लेते रहते हैं । इस सिलसिले में सैयद रज़ा अली साहब का यह बयान मुलाहज़ा फरमाइए ।
आला हज़रत की ज़िन्दगी में अहकर मस्जिद में नमाज़ पढ़ने गया । हज़रत की मस्जिद के कुंए पर एक नाबालिग बहिशती ( सिका ) पानी भर रहा था । मैं ने जब लड़के से वुजू के लिए पानी मांगा तो उसने जवाब दिया । ” मुझे पानी देने में कोई उज़ नहीं है लेकिन बड़े मौलवी साहब ( यानी आला हज़रत ) ने मुझे किसी भी नमाज़ी को पानी देने से मना फरमा दिया है
और बताया है कि जो वुजू के लिए पानी मांगे उससे साफ़ साफ़ कह देना कि मेरे भरे हुए पानी से आप का वुजू नहीं होगा । क्योंकि मैं नाबालिग हूं । मुफ्तिये आगरा मौलाना सैयद दीदार अली शाह रहमतुल्लाह अलैहि बानीए हिज्बुल अहनाफ़ लाहौर के साथ भी ऐसा ही वाकिआ पेश हुवा पहली या दूसरी दफ़ा बरैली शरीफ़ हाज़िर हुए थे । वाकिआ यह है
मौलवी मुहम्मद हुसैन साहब मेरठी मूजिद तिलसमी प्रेस का बयान है कि एक मर्तबा हज़रत मौलाना दीदार अली साहब अलवरी रहमतुल्लाह तआला अलैहि तशरीफ़ लाए , जमाअत का वक़्त था , मस्जिद के कुएं पर एक बहिश्ती का लड़का पानी भर रहा था , जल्दी की वजह से उसी लड़के से पानी तलब फरमाया ।
उसने कहा मौलाना मेरे भरे हुए पानी से आप का वुजू जाइज़ नहीं और नहीं दिया । मौलाना को गुस्सा आया और फरमाया कि हम जब तुझ से ले रहे हैं तो क्यों जाइज़ नहीं ? उसने