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NIKAAH KE EHKAAM

तो जानते हैं लेकिन निकाह के हुकुक से नावाकिफ़ हैं| इसके साथ ही निकाह करने वाले ईमान की पाकिज़गी का भी अहसास होता हैं जिससे उसकी आंख, कान, हाथ ज़िना जैसे गुनाह से बचती हैं| अल्लाह के रसूल सल्लललाहो अलेहे वसल्लम का इरशाद हैं-
हज़रत अनस बिन मालिक से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – जब एक शख्स निकाह करत तो उसए आधा ईमान मिल जाता हैं तो उसे चाहिए के आधे के लिये अल्लाह से डरता रहें| (सिलसिलातुल अहदीस असहीह)
लिहाज़ा निकाह करना ईमान मे भी शामिल हैं|
हज़रत अनस बिन मालिक से रिवायत हैं के तीन हज़रात(अली बिन तालिब, अबदुल्लाह बिन उमरो औरउस्मान बिन मज़ऊन रज़ि0) नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की अज़वाज मुताहरात के घरो की तरफ़ आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की इबादत के मुताल्लिक पूछने गये| जब इनको आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के अमल के बारे मे बताया गया तो जिसे इन्होने कम समझा और कहा के हमारा नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम से क्या मुकाबला आप के तो तमाम अगली पिछली लगज़िशे माफ़ कर दी गयी हैं| इनमे से एक ने कहा के आज से मैं हमेशा रात मे नमाज़ पढा करुंगा| दूसरे ने कहा के मैं हमेशा रोज़े रखा करुंगा और कभी नागा नही करुंगा| तीसरे ने कहा के मैं औरतो से जुदाई इख्तयार कर लूगा और कभी निकाह नही करुंगा| फ़िर आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम तशरीफ़ लाये और इनसे पूछा – क्या तुमने ही ये बाते कही थी| सुन लो अल्लाह की कसम अल्लाह रब्बुल आलामीन से मैं तुम सब से ज़्यादा डरने वाला हूं| मैं तुम सबसे ज़्यादा परहेज़गार हूं लेकिन मैं अगर रोज़े रखता हूं तो इफ़तार भी करता हूं, नमाज़ भी पढता हूं और सोता भी हूं, और औरतो से निकाह भी करता हूं| मेरे तरिके से जिसने बेरगबती करी वो मुझ से नही हैं| (सहीह बुखारी)
हदीस नबवी से साबित हैं के निकाह करना रसूल का तरीका और इन्सान की फ़ितरत हैं जिसको न करना रसूल से अलग होना हैं| जैसा के दिगर कौमो मे लोग रहबानियत या सन्यास वगैराह ले लेते हैं और दुनिया से कट जाते हैं ताकि ऊपरवाले से मिल जाये| जबकि शरियते इस्लाम मे रहबानियत या सन्यास गुनाह हैं बल्कि हर इन्सान जो निकाह की ताकत रकता हैं उस पर लाज़िमी हैं के वो निकाह भी करे और इसके साथ-साथ इस्लाम के दूसरे अरकान को अदा करे जैसा के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने किया और निकाह न करने वाला नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की सुन्नत का मुखालिफ़िन हैं| जबकि अल्लाह से डर कर निकाह न करना कही से भी साबित नही बल्कि खुद अल्लाह ने कुरान मे हुक्म दिया-
ऐ ईमानवालो अल्लाह से डरो जैसा के उससे डरने का हक हैं और इस्लाम के सिवा किसी और दीन पर तुम्हे मौत न आये| (सूरह अल इमरान सूरह नं 2 आयत नं 102)
लिहाज़ा हर इन्सान को इस्लाम की हद के अन्दर रहते हुये अल्लाह से डर रखना चाहिये|
निकाह मे होने वाली ज़ात बिरादरी की बन्दिश:
अकसर लोग निकाह के लिये अपने ही बिरदरी मे लड़का या लड़की को पसन्द करते हैं और जब तक अपनी बिरादरी मे कोई नही मिलता निकाह नही करते| जिसके सबब अकसर अकसर दूसरे बिरादरी के लड़के और लड़किया बेनिकाह काफ़ी उम्र तक बैठे रहते हैं और कई तो ताज़िन्दगी बे निकाह रह जाते हैं और इसकी ज़िन्दा मिसाल हमारे मआशरे मे मौजूद हैं| अल्लाह कुरान मे फ़रमाता हैं-
और उसने दो ज़ात बनाई एक मर्द और एक औरत| (सूरह कियामह सूरह नं 75 आयत नं 39)
इस्लाम की ये खूबी हैं के इस्लाम मे इन्सान कि फ़ितरत के सबब हर मसले का हल रखा और किसी मसले के हल के लिये बस इन्सान को अल्लाह और उसके रसूल के बताये एहकाम पर अमल करना हैं| बावजूद इसके लोग इस्लाम के बताये तरिको से फ़ायदा नही उठाते और नुकसान मे रहते हैं| अल्लाह ने इन्सान की तख्लीक के लिये सिर्फ़ एक जोड़ा आदम अलै0 और हव्वा अलै0 को बनाया और इनसे तमाम नस्ल इन्सानी की तख्लीक की अगर अल्लाह ने ज़ात बिरादरी की बन्दीश को भी इन्सान के निकाह के शर्त के तौर पर लगाया होता तो आदम अलै0 और हव्वा अलै0 के बाद दुनिया मे कोई इन्सान नही होता या अल्लाह कई आदम अलै0 और हव्वा अलै0 की तरह कई और जोड़े पैदा कर दुनिया मे एक सिस्टम बना देता के हर इन्सान अपनी ही पुरखो की नस्ल मे निकाह करे और कई और जोड़े आदम अलै0 और हव्वा अलै0 की तरह पैदा करना अल्लाह के लिये कोई मुश्किल काम नही| बावजूद इसके इन्सान इन तमाम बातो पर गौर फ़िक्र किये बिना ही इस अहम सुन्नत को अदा करने मे ताखिर करता हैं|
अल्लाह ने कुरान मे एक जगह और फ़रमाया-
ऐ लोगो अल्लाह से डरो जिसने तुम्हे एक जान से पैदा किया और उसी मे से उसके लिये जोड़ा पैदा किया और उन दोनो से बहुत से मर्द और औरत फ़ैला दिये| ( सूरह निसा सूरह नं 4 आयत नं 1)
कुरान की इस आयत से साबित हैं के अल्लाह ने हर मर्द और औरत का जोड़ा बनी आदम की औलादो मे से ही रखा हैं लिहाज़ा हर इन्सान को जो ईमानवाला मर्द या औरत मिले उसे बिना ताखिर के निकाह कर ले| क्योकि किसी इन्सान को खुद से ये हासिल नही के ज़ात बिरादरी मे बट जाये बल्कि ज़ात बिरादरी मे बाटना भी अल्लाह ही का काम हैं जैसा के कुरान से साबित हैं-
अल्लाह वही हैं जिसने इन्सान को पानी से पैदा किया| फ़िर उसे नस्ली और खान्दानी रिश्तो मे बाट दिया| (सूरह फ़ुरकान सूरह नं 25 आयत नं 54)
लिहाज़ा जात बिरादरी की बन्दीश को निकाह जैसे नेक काम से जोड़ना सरासर गलत हैं क्योकि अल्लाह ने नस्ल और खानदान सिर्फ़ इन्सान की पहचान बाकि रखने के लियेए किया न के निकाह के मौके पर अपने से दूसरे को नीचा या बड़ा खानदान तसव्वुर करना सरासर गलत हैं| बिरादरी का तसव्वुर सिर्फ़ इन्सान को बड़ा या छोटा साबित करता हैं जबकि ये अल्लाह ही बेहतर जानता हैं कि उसके नज़दीक कौन बड़ा या छोटा हैं|
बिरादरी से बाहर निकाह करने की सबसे बड़ी हुज्जत हज़रत अबदुर्ररहमान बिन औफ़ का निकाह हैं जो कुरैश खानदान से थे और उन्होने अंसार की लड़की से निकाह किया था और खुद अल्लाह के रसूल सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने हज़रत सफ़िया से निकाह किया था जो कुरैश खानदान से न थी|
निकाह कौन करे:
निकाह के तल्लुक से अकसर ये देखा जाता हैं और लोगो मे भी ये आम बात हैं के जब तक कोई बेहतर कमाऊ लड़का न मिल जाये लड़की का निकाह नही किया जाता और उसे बैठाले रखा जाता हैं, अगर किसी लड़के या लड़की की बड़े भाई या बड़ी बहन या छोटे भाई या छोटी बहन की शादी ना हुई हो तो दूसरे भाई बहन के आने वाले रिश्तो को भी मना कर दिया जाता हैं या मामला एक मुद्दत तक के लिये तय कर रोक दिया जाता हैं के जब दूसरे की होगी तभी साथ मे निकाह किया जायेगा| दूसरे हमारे मुल्क के कानून के तहत लड़के की शादी 21 साल से पहले और लड़की की शादी 18 साल से पहले करना कानूनन जुर्म समझा जाता हैं| जबकि शरियत इस्लामिया इसके बारे मे क्या कहती हैं आईये ज़रा गौर करे-
हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसूद रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – ऐ नौजवानो की जमात तुम मे से जो शख्स निकाह की ताकत रखता हैं इसे चाहिए के निकाह कर ले| इसकी वजह से निगाह नीची रहती हैं और जिस्म बदकारी से महफ़ूज़ रहता हैं और जिसे निकाह की ताकत न हो उसे चाहिए के रोज़े रखा करे क्योकि रोज़ा ख्वाहिशो को कुचल देता हैं| (बुखारी, मुस्लिम, अबू दाऊद, निसाई, तिर्मिज़ी)
हदीस नबवी से पता चलता हैं के निकाह खालिस जिस्म को बदकारी से बचाने और नफ़्स की ज़रुरियात को जायज़ तरिके से पूरा करने का नाम हैं जिसके सबब इन्सान गुनाह से तो बचता ही हैं और नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की इस अहम सुन्नत को अदा कर नेकी का भी हकदार बनता हैं यही वजह के के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने नौजवानो को निकाह की तरगीब दिलाई| दूसरी सूरत मे निकाह की ताकत(यानि कूवते मर्द न होने या कमज़ोर होने की सूरत मे या बीवी के जायज़ अखराजात पूरा ना कर पाने) न रख पाने वाले शख्स को रोज़े की तरगीब दिलाई ताकी इन्सान गुनाह से बच सके क्योकि रोज़ा इन्सान के शहवत के असर को कुचल देता हैं|
इसी तरह से बुखारी की एक दूसरी हदीस से साबित हैं-
हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसूद रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – हम नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के ज़माने मे नौजवान थे| हमे कोई चीज़ मयस्सर न थी| आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – नौजवानो की जमात तुम मे से जिसे भी निकाह करने की माली ताकत हो इसे निकाह कर लेना चाहिए क्योकि ये नज़रो को नीची रखने वाला और शर्मगाह की हिफ़ाज़त करने वाला अमल हैं और जो कोई निकाह करने की ताकत न रकह्ता हो इसे चाहिये के रोज़े रखे क्योकि रोज़ा इसकी ख्वाहिशात नफ़सानी को तोड़ देगा| (बुखारी)
इस हदीस मे सिर्फ़ इतना ज़्यादा हैं की हमे कोई चीज़ मयस्सर न थी जिससे मुराद जो कम से कम दो लोगो के लिये काफ़ी हो जैसे क्घर, कपड़े, बर्तन वगैराह| यहा ये बात गौर करने वाली हैं के इस्लाम का इब्तेदाई दौर बहुत ही गुरबत भरा दे जिसके सबब अकसर सहाबा कई-कई फ़ांका करते थे न के आजकल की तरह के हर चीज़ मयस्सर होने के बावजूद निकाह मे ताखिर् की जाती हैं जिसके भयानक नतायज आज देखने को मिलते हैं के कमसिनी की ही उम्र मे लड़का-लड़की का इश्क करना या घर से भाग जाना वगैराह|
हज़रत सहल बिन साद रज़ि0 से रिवायत हैं के एक औरत नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के पास आई और अर्ज़ किया के मैं इसलिये हाज़िर हूं के अपनी ज़ात आपको हिबा कर दूं| फ़िर नज़र की नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने इसकी तरफ़ और खूब नीचे से ऊपर तक निगाह की इसकी तरफ़ और फ़िर अपना सर मुबारक झुका लिया और जब औरत ने देखा के आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने इसे कोई हुक्म नही दिया तो बैठ गयी और एक सहाबी रज़ि0 उठे और अर्ज़ किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लललाहो अलेहे वसल्लम अगर आप को इसकी हाजत नही तो मुझसे इसका अकद कर दीजिये| आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया तेरे पास कुछ हैं| इसने अर्ज़ किया कुछ नही अल्लाह की कसम ऐ अल्लाह के रसूल सल्लललाहो अलेहे वसल्लम| आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया तो अपने घरवालो के पास जा और देख शायद कुछ पाये| फ़िर वो गये और लौट आये और अर्ज़ किया के अल्लाह की कसम मैने कुछ नही पाया
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