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सूरए आले इमरान- ग्यारहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला, ऐ ईमान वालो, अल्लाह से डरो जैसा उससे डरने का हक़ है और कभी न मरना मगर मुसलमान (102) और अल्लाह की रस्सी मज़बूत थाम लो

(1)सब मिलकर और आपस में फट न जाना

(2) और अल्लाह का एहसान अपने ऊपर याद करो जब तुम में बैर था उसने तुम्हारे दिलों में मिलाप कर दिया तो उसके फ़ज़्ल से तुम आपस में भाई हो गए

(3)और तुम एक दोज़ख़ के ग़ार के किनारे पर थे

(4)तो उसने तुम्हें उससे बचा दिया

(5)अल्लाह तुमसे यूं ही अपनी आयतें बयान फ़रमाता है कि कहीं तुम हिदायत पाओ (103) और तुम में एक दल ऐसा होना चाहिये कि भलाई की तरफ़ बुलाएं और अच्छी बात का हुक्म दें और बुराई से मना करें

(6)और यही मुराद को पहुंचे (7) (104)और उन जैसे न होना जो आपस में फट गए और उनमें फुट पड़ गई (8)बाद इसके कि रौशन निशानियां उन्हें आचुकी थीं

(9)और उनके लिये बड़ा अज़ाब है (105) जिस दिन कुछ मुंह उजाले होंगे और कुछ मुंह काले तो वो जिनके मुंह काले हुए

(10)क्या तुम ईमान लाकर काफ़िर हुए (11)तो अब अज़ाब चखो अपने कुफ़्र का बदला (106) और वो जिनके मुंह उजाले हुए

(12)वो अल्लाह की रहमत में हैं वो हमेशा उसमें रहेंगे (107) ये अल्लाह की आयतें हैं कि हम ठीक ठीक तुम पर पढ़ते हैं और अल्लाह संसार वालों पर ज़ुल्म नहीं चाहता

(13)(108) *तफ़सीर : सूरए आले इमरान- ग्यारहवाँ रूकू* (1) “हब्लिल्लाह” यानी अल्लाह की रस्सी की व्याख्या में मुफ़स्सिरों के कुछ क़ौल हैं. कुछ कहते हैं इससे क़ुरआन मुराद है. मुस्लिम की हदीस शरीफ़ में आया कि क़ुरआन पाक अल्लाह की रस्सी है, जिसने इसका अनुकरण किया वह हिदायत पर है, जिसने इसे छोड़ा वह गुमराही पर है.

हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि “हब्लिल्लाह” से जमाअत मुराद है और फ़रमाया कि तुम जमाअत को लाज़िम करो कि वह हब्लिल्लाह है, जिसको मज़बूती से थामने का हुक्म दिया गया है.(2) जैसे कि यहूदी और ईसाई अलग अलग हो गए. इस आयत में उन कामों और हरकतों को मना किया गया है जो मुसलमानों के बीच फूट का कारण बनें. मुसलमानों का तरीक़ा अहले सुन्नत का मज़हब है, इसके सिवा कोई राह इख़्तियार करना दीन में फूट डालना है जिससे मना किया गया है.

(3) और इस्लाम की बदौलत दुश्मनी से दूर होकर आपस में दीनी महब्बत पैदा हुई यहाँ तक कि औस और ख़ज़रज की वह मशहूर लड़ाई जो एक सौ बीस साल से जारी थी और उसके कारण रात दिन क़त्ल का बाज़ार गर्म रहता था, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़रिये अल्लाह तआला ने मिटा दी और जंग की आग ठंडी कर दी गई और युद्ध-ग्रस्त क़बीलो के बीच प्यार, दोस्ती और महब्बत की भावना पैदा कर दी.

(4) यानी कुफ़्र की हालत में, कि अगर उसी हाल में मर जाते तो दोज़ख़ में पहुंचते (5) ईमान की दौलत अता करके.(6) इस आयत से जायज़ काम किये जाने और नाजायज़ कामों से अलग रहने की अनिवार्यता और बहुमत तथा सहमति को मानने की दलील दी गई.(7) हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि नेकियों का हुक्म देना और बुराइयों से रोकना बेहतरीन जिहाद है.

(8) जैसा कि यहूदी और ईसाई आपस में विरोधी हुए और उनमें एक दूसरे के साथ दुश्मनी पक्की हो गई या जैसा कि ख़ुद तुम इस्लाम से पहले जिहालत के दौर से अलग अलग थे. तुम्हारे बीच शत्रुता थी. इस आयत में मुसलमानों को आपस में एक रहने का हुक्म दिया गया और मतभेद और उसके कारण पैदा करने से मना किया गया. हदीसों में भी इसकी बहुत ताकीदें आई हैं.

और मुसलमानों की जमाअत से अलग होने की सख़्ती से मनाही फ़रमाई गई है. जो फ़िर्क़ा पैदा होता है, इस हुक्म का विरोध करके ही पैदा होता है और मुसलमानों की जमाअत में फूट डालने का जुर्म करता है और हदीस के इरशाद के अनुसार वह शैतान का शिकार है. अल्लाह तआला हमें इससे मेहफ़ूज रखे.(9) और सच्चाई सामने आ चुकी.(10) यानी काफ़िर, तो उनसे ज़रूर कहा जाएगा.

(11) इसके मुख़ातब या तो तमाम काफ़िर हैं, उस सूरत में ईमान से मीसाक़ के दिन का ईमान मुराद है. जब अल्लाह तआला ने उनसे फ़रमाया था कि क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ. सबने “बला” यानी “बेशक” कहा था और ईमान लाए थे. अब जो दुनिया में काफ़िर हुए तो उनसे फ़रमाया जाता है कि मीसाक़ के दिन ईमान लाने के बाद तुम काफ़िर हो गए. हसन का क़ौल है कि इससे मुनाफ़िक़ लोग मुराद हैं जिन्हों ने ज़बान से ईमान ज़ाहिर किया था और उनके दिल इन्कारी थे.

इकरमा ने कहा कि वो किताब वाले हैं जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तशरीफ़ लाने से पहले तो हुज़ूर पर ईमान लाए और हुज़ूर के तशरीफ़ लाने के बाद आपका इनकार करके काफ़िर हो गए. एक क़ौल यह है कि इसके मुख़ातब मुर्तद लोग हैं जो इस्लाम लाकर फिर गए और काफ़िर हो गए.(12) यानी ईमान वाले कि उस रोज़ अल्लाह के करम से वो खुश होंगे, उनके चेहरे चमकते दमकते होंगे, दाएं बाएं और सामने नूर होगा.(13) और किसी को बेजुर्म अज़ाब नहीं देता और किसी नेकी का सवाब कम नहीं करता.

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Asalam-o-alaikum , Hi i am noor saba from Jharkhand ranchi i am very passionate about blogging and websites. i loves creating and writing blogs hope you will like my post khuda hafeez Dua me yaad rakhna.