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सूरः अन-निसा – Surah An Nisa Hindi

अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है।

(1) ऐ लोगो, अपने पालनहार से डरो जिसने तुमको एक जान से पैदा किया, और उसी से उसका जोड़ा पैदा किया और उन दोनों से बहुत से मर्द और औरतें फैला दीं। और अल्लाह से डरो जिसका वास्ता देकर तुम एक दूसरे से सहायता माँगते हो और सचेत रहो सगे-संबन्धियों के विष्य में। निस्सन्देह, अल्लाह तुम्हारा निरीक्षण कर रहा है। (2) और यतीमों की पूँजी उनको सौंप दो। और बुरी सम्पत्ति को अच्छी सम्पत्ति से न बदलो और उनकी पूँजी अपनी पूँजी के साथ मिलाकर न खाओ। यह बहुत बड़ा पाप है। (3) और यदि तुमको भय हो कि तुम यतीमों के सम्बन्ध में न्याय न कर सकोगे तो औरतों में से जो तुमको पसन्द हों उनसे दो-दो, तीन-तीन, चार-चार तक निकाह (विवाह) कर लो। और यदि तुमको डर हो कि तुम न्याय न कर सकोगे तो एक ही निकाह करो या जो दासी तुम्हारे स्वामित्व में हो। इसमें आशा है कि तुम न्याय से विचलित न होगे। (4) और औरतों को उनके मेहर प्रसन्नतापूर्वक अदा करो। फिर यदि वह उसमें से कुछ तुम्हारे लिए छोड़ दें अपनी खुशी से तो तुम उसको हँसी-खुशी से खाओ।

(5) और नासमझों को अपनी वह पूँजी न दो जिसको अल्लाह ने तुम्हारे लिए आत्मनिर्भरता का माध्यम बनाया है, और उस पूँजी में से उनको खिलाओ और पहनाओ और उनसे भलाई की बात कहो। (6) और अनाथों को जाँचते रहो, यहाँ तक कि जब वह निकाह की आयु को पहुँच जायें तो यदि उनमें परिपक्वता देखो तो उनकी पूँजी उनको सौंप दो। और उनकी पूँजी अपव्यय के साथ और इस विचार से कि वह बड़े हो जायेंगे न खा जाओ। और जिसको आवश्यकता न हो, वह अनाथ कि पूँजी से बचे और जो व्यक्ति निर्धन हो वह सामान्य रीति के अनुसार खाये। फिर जब तुम उनकी पूँजी उनको सौंपो तो उन पर गवाह बना लो, और अल्लाह हिसाब लेने के लिए पर्याप्त है। (7) माँ-बाप और सम्बन्धियों की विरासत में से मर्दों का भी हिस्सा है और माँ-बाप और सम्बन्धियों की विरासत में से औरतों का भी हिस्सा है, चाहे थोड़ा हो या अधिक हो, एक निर्धारित किया हुआ हिस्सा। (8) और यदि बँटवारे के समय सम्बन्धी और अनाथ और

निर्धन मौजूद हों तो उसमें से उनको भी कुछ दो और उनसे सहानुभूतिपूर्ण बात कहो। (9) और ऐसे लोगों को ड़रना चाहिए कि यदि वह अपने पीछे कमज़ोर बच्चे छोड़ जाते तो उन्हें उनकी बहुत चिन्ता रहती। अतः उनको चाहिए कि अल्लाह से डरें और बात पक्की कहें। (10) जो लोग अनाथों की पूँजी अनधिकृत रूप से खाते हैं वह लोग अपने पेटों में आग भर रहे हैं और वह शीघ्र भड़कती हुई आग में ड़ाले जायेंगे।

(11) अल्लाह तुमको तुम्हारी सन्तान के सम्बन्ध में आदेश देता है कि मर्द का हिस्सा दो औरतों के बराबर है। यदि औरतें दो से अधिक हैं तो उनके लिए दो-तिहाई है उस सम्पत्ति से, जो (मृतक) छोड़ गया है और यदि वह अकेली है तो उसके लिए आधा है। और मृतक के माता-पिता को दोनो में से प्रत्येक के लिए छठवाँ हिस्सा है उस सम्पत्ति का, जो वह छोड़ गया है शर्त यह है कि मृतक की सन्तान हो। और यदि मृतक के सन्तान न हो और उसके माता-पिता उसके वारिस हां तो उसकी माँ का तिहाई हिस्सा है और यदि उसके भाई-बहन हों तो उसकी माँ के लिए छठवाँ हिस्सा है। ये हिस्से वसीयत निकालने के पश्चात या ऋण अदा करने के पश्चात हैं जो वह कर जाता है। तुम्हारे बाप हों या तुम्हारे बेटे हों, तुम नहीं जानते कि उनमें तुम्हारे लिए सबसे अधिक लाभप्रद कौन है। यह अल्लाह का निर्धारित किया हुआ हिस्सा है। निस्सन्देह अल्लाह ज्ञानवाला, विवेकवाला है। (12) और तुम्हारे लिए उस पूँजी का आधा हिस्सा है जो तुम्हारी पत्नियाँ छोड़ें, शर्त यह है कि उनकी सन्तान न हो। और यदि उनके सन्तान हो तो तुम्हारे लिए पत्नियों की विरासत का चैथाई हिस्सा है, वसीयत निकालने के पश्चात जिसकी वह वसीयत कर जाये या ऋण अदा करने के पश्चात। और उन पत्नियों के लिए चैथाई हिस्सा है तुम्हारी विरासत का यदि तुम्हारे सन्तान नहीं है, और यदि तुम्हारे सन्तान है तो उनके लिए आठवाँ हिस्सा है तुम्हारी विरासत का, वसीयत निकालने के बाद जिसकी तुम वसीयत कर जाओ या ऋण अदा करने के पश्चात। और यदि कोई मृतक मर्द हो या औरत ऐसा हो जिसके न माँ-बाप (उसूल) हों न सन्तान (फुरु), और उसके एक भाई या एक बहन हो तो दोनां में से प्रत्येक के लिए छठा हिस्सा है। और यदि वह इससे अधिक हों तो वह एक तिहाई में साझीदार होंगे। वसीयत निकालने के पश्चात जिसकी वसीयत की गई हो या ऋण अदा करने के पश्चात, बिना किसी को हानि पहुँचाये। यह आदेश अल्लाह की ओर से है और अल्लाह ज्ञान रखने वाला, सहनशील है। (13) यह अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ हैं। और जो व्यक्ति अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करेगा, अल्लाह उसको ऐसे बाग़ों में प्रवेश कराएगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, उनमें वह सदैव रहेंगे और यही बड़ी सफलता है। (14) और जो व्यक्ति अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा और उसके निर्धारित किये हुए नियमों से बाहर निकल जायेगा उसको वह आग में डालेगा। जिसमें वह सदैव रहेगा और उसके लिए अपमानजनक यातना है।

(15) और तुम्हारी औरतों में से जो कोई व्यभिचार करे तो उन पर अपनो में से चार मर्द गवाह बनाओ। फिर यदि वह गवाही दे दें तो उन औरतों को घरों के अन्दर बन्द रखो, यहाँ तक कि उनको मौत उठा ले या अल्लाह उनके लिए कोई रास्ता निकाल दे। (16) और तुममें से जो मर्द व्यभिचार करें तो उनको यातना पहुँचाओ। फिर यदि वह दोनों तौबा करें और अपना सुधार कर लें तो उनका विचार छोड़ दो। निस्सन्देह अल्लाह तौबा स्वीकार करने वाला दयावान है। (17) तौबा, जिसका स्वीकार करना अल्लाह के जिम्मे है, वह उन लोगों की है जो बुरा कृत्य नासमझी से कर बैठते हैं फिर शीघ्र ही तौबा कर लेते हैं। वही हैं जिनकी तौबा अल्लाह स्वीकार करता है और अल्लाह जानने वाला, विवेक वाला है।

(18) और ऐसे लोगों की तौबा नहीं है जो निरन्तर बुरे कर्म करते रहें, यहाँ तक कि जब मृत्यु उनमें से किसी के समक्ष आ जाये तब वह कहें कि अब मैं तौबा करता हूँ, और न उन लोगों की तौबा है जो इस स्थिति में मरते हैं कि वह अवज्ञाकारी हैं, उनके लिए तो हमने कष्टप्रद यातना तैयार कर रखी है।

(19) ऐ ईमान वालो, तुम्हारे लिए वैध नहीं कि तुम औरतों को बलपूर्वक अपनी विरासत में ले लो और न उनको इस उद्देश्य से रोके रखो कि तुमने जो कुछ उनको दिया है उसका कुछ हिस्सा उनसे ले लो, परन्तु उस स्थिति में कि वह स्पष्ट रुप से अशलील कर्म करें। और उनके साथ भली-भाँति जीवन व्यतीत करो। यदि वह तुमको नापसंद हां तो हो सकता है कि एक चीज़ उनकी तुमको पसन्द न हो परन्तु अल्लाह ने उसमें तुम्हारे लिए बहुत बड़ी भलाई रख दी हो। (20) और यदि तुम एक पत्नी के स्थान पर दूसरी पत्नी बदलना चाहो और तुम उसको बहुत अधिक सम्पत्ति दे चुके हो तो तुम उसमें से कुछ वापस न लो। क्या तुम आरोप लगाकर और स्पष्ट अत्याचार करके वापस लोगे। (21) और तुम किस तरह उसको लोगे जबकि एक-दूसरे से घनिष्ठ संबंध बना चुके हो और वह तुमसे पक्का प्रण ले चुकी हैं। (22) और उन औरतों से निकाह न करो जिनसें तुम्हारे पिता निकाह कर चुके हैं, परन्तु जो पहले हो चुका। निस्सन्देह यह निर्लज्जता है और घृणा की बात है और बहुत बुरा चलन है।

(23) तुम्हारे ऊपर अवैध की गईं तुम्हारी माएँ, तुम्हारी बेटियाँ, तुम्हारी बहनें, तुम्हारी फूफियाँ, तुम्हारी ख़ालायें (मौसियाँ), तुम्हारी भतीजियाँ और भान्जियाँ, और तुम्हारी वह माएँ जिन्होंने तुमको दूध पिलाया, तुम्हारी दूध में साझीदार बहनें, तुम्हारी पत्नियों की माएँ और उनकी बेटियाँ जो तुम्हारे पालन-पोषण में हैं जो तुम्हारी उन पत्नियों में से हों जिनसे तुम संभोग कर चुके हो, परन्तु यदि अभी तुमने उनसे संभोग न किया हो तो तुम पर कोई पाप नहीं। और तुम्हारे सगे बेटों की पत्नियाँ और यह कि तुम एकत्र करो दो बहनों को परन्तु जो पहले हो चुका हो। निस्सन्देह अल्लाह क्षमा करने वाला, दयावान है। (24) और वह महिलाएँ भी अवैध हैं जो किसी दूसरे के निकाह में हों परन्तु यह कि वह युद्ध में तुम्हारे हाथ आयें। यह अल्लाह का आदेश है तुम्हारे ऊपर। इनके अतिरिक्त जो औरतें हैं वह सब तुम्हारे लिए वैध हैं शर्त यह है कि तुम अपनी दौलत के माध्यम से उनके इच्छुक बनो, उनको निकाह के बन्धन में लेकर न कि व्यभिचार करने लगो। फिर उन औरतों में से जिनसे तुमने दामपत्य जीवन का जो लाभ उठाया है उसके बदले उनको उनका निर्धारत मह्र दे दो और महर के निर्धारण के बाद जो तुमने आपस की सहमति से कोई समझौता किया हो तो उसमें कोई पाप नहीं। निस्सन्देह अल्लाह जानने वाला, विवेकशील है। (25) और तुममे से जो व्यक्ति क्षमता न रखता हो कि कुलीन ईमान वाले औरतों से निकाह कर सके तो उसको चाहिए कि वह तुम्हारी उन दासियों में से किसी के साथ निकाह कर ले जो तुम्हारे अधिकार में हों और ईमान वाली हों। अल्लाह तुम्हारे ईमान को भली-भाँति जानता है, तुम परस्पर एक हो। अतः उनके स्वामियों की अनुमति से उनसे निकाह कर लो और सामान्य नियम के अनुसार उनके महर अदा कर दो, इस तरह कि वह निकाह बन्धन में लायी जायें, न कि व्यभिचार करने वाली हों, और चोरी-छुपे आशनाईयाँ करें। फिर जब वह निकाह के बन्धन में आ जायें और उसके बाद वह व्यभिचार में लिप्त हों तो स्वतन्त्र महिलाओं के लिए जो दण्ड है उसका आधा दण्ड उनपर हैं। यह तुम में से उसके लिए है जिसको बुरे कर्म में पड़ने का भय हो। और यदि तुम धैर्य से काम लो तो यह तुम्हारे लिए अधिक बेहतर है, और अल्लाह क्षमा करने वाला, अतः दयावान है।

(26) अल्लाह चाहता है कि वह तुम्हारे लिए बयान करे और तुम्हे उन लोगों के आदर्शों का मार्गदर्शन करे जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं और तुम पर ध्यान दे, अल्लाह जानने वाला, विवेकवाला है। (27) और अल्लाह चाहता है कि वह तुम्हारे ऊपर ध्यान दे और जो लोग अपनी इच्छाओं का अनुसरण कर रहे हैं वह चाहते हैं कि तुम सन्मार्ग से बहुत दूर निकल जाओ। (28) अल्लाह चाहता है कि तुमसे बोझ को हल्का करे और मनुष्य कमज़ोर (दुर्बल) पैदा किया गया है।

(29) ऐ ईमान वालो, आपस में एक-दूसरे का धन अनधिकृत रूप से न खाओ परन्तु यह कि व्यापार हो आपस में सहमति से। और हत्या न करो आपस में। निस्सन्देह अल्लाह तुम्हारे ऊपर बहुत दया करने वाला है। (30) और जो व्यक्ति विद्रोह और अत्याचार से ऐसा करेगा, उसको हम अवश्य आग में डालेंगे। और यह अल्लाह के लिए आसान है। (31) यदि तुम इन बड़े पापों से बचते रहे जिनसे तुम्हे रोका गया है तो हम तुम्हारी छोटी बुराईयों को क्षमा कर देंगे और तुमको सम्मान के स्थान में प्रवेश देंगे। (32) और तुम ऐसी चीज़ की अभिलाषा न करो जिसमें अल्लाह ने तुममे से एक को दूसरे पर बड़ाई दी है। मर्दों के लिए हिस्सा है अपनी कमाई का और औरतों के लिए हिस्सा है अपनी कमाई का। और अल्लाह से उसकी कृपा माँगो। निस्सन्देह अल्लाह हर चीज़ का ज्ञान रखता है। (33) और हमने माता-पिता और सम्बन्धियों के छोड़े हुए धन में से प्रत्येक के लिए वारिस निर्धारित किये हैं और जिनसे तुमने कोई प्रण कर रखा हो तो उनको उनका हिस्सा दे दो निस्सन्देह अल्लाह के सामने है हर चीज़।

(34) मर्द, औरतों के ऊपर क़व्वाम (संरक्षक) हैं इस आधार पर कि अल्लाह ने एक को दूसरे पर बड़ाई दी है और इस आधार पर कि मर्द ने अपना धन खर्च किया। अतः जो भली औरतें हैं वह आज्ञाकरिणी हैं, पीठ पीछे संरक्षण करती हैं उसकी जिसकी सुरक्षा का अल्लाह ने आदेश दिया है। और जिन औरतों से तुमको अनिष्ठा का डर हो उनको समझाओ और उनको उनके सोने के स्थान पर अकेला छोड़ दो और उनको दण्ड दो। अतः यदि वह तुम्हारा आज्ञापालन करें तो उनके विरुद्ध आरोप का रास्ता न तलाश करो। निस्सन्देह अल्लाह सबसे ऊपर है, बहुत बड़ा है।

(35) और यदि तुम्हें पति-पत्नी के मध्य सम्बन्धों के बिगड़ने का डर हो तो एक न्यायप्रिय, मर्द के सम्बन्धियों में से खड़ा करो और एक न्यायप्रिय औरत के सम्बन्धियों में से खड़ा करो। यदि दोनो सुधार चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सहमति बना देगा। निस्सन्देह अल्लाह सब कुछ जानने वाला खबरदार है।

(36) और अल्लाह की इबादत करो और किसी चीज़ को उसका साझीदार न बनाओ। और अच्छा व्यवहार करो माता-पिता के साथ और सम्बन्धियों के साथ और अनाथों और निर्धनों और सम्बन्धी पड़ोसी और वह पड़ोसी जो संबंधी नहीं हैं और पास बैठने वाले और यात्री के साथ और दासों के साथ। निस्सन्देह, अल्लाह पसन्द नहीं करता डींगें मारने वाले को और घमंड करने वाले को (37) जो कि कृपणता (कंजूसी) करते हैं और दूसरों को भी कृपणता सिखाते हैं और जो कुछ उन्हें अल्लाह ने अपनी कृपा से दे रखा है उसको छिपाते हैं। और हमने अवज्ञाकारियों के लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है। (38) और जो लोग अपना धन लोगों को दिखाने के लिए खर्च करते हैं और अल्लाह पर और परलोक के दिन पर ईमान नहीं रखते, और जिसका साथी शैतान बन जाये तो वह बहुत बुरा साथी है। (39) उनकी क्या हानि थी यदि वह अल्लाह पर और परलोक के दिन पर विश्वास करते और अल्लाह ने जो कुछ उन्हें दे रखा है उसमें से खर्च करते। और अल्लाह उनसे अच्छी तरह भिज्ञ है।

(40) निस्सन्देह अल्लाह तनिक भी किसी पर अन्याय नहीं करेगा। यदि नेकी हो तो वह उसको दोगुना बढ़ा देता है और अपने पास से बहुत बड़ा पुण्य देता है।

(41) फिर उस समय क्या हाल होगा जब हम प्रत्येक उम्मत में से एक गवाह लायंगे और तुमको उन लोगों के ऊपर गवाह बनाकर खड़ा करेंगे। (42) वह लोग जिन्होंने अवज्ञा की और पैग़म्बर का अविशवास किया उस दिन अभिलाषा करेंगे कि काश (ऐसा संभव होता कि) धरती फट जाए और उन पर बराबर कर दी जाये और वह अल्लाह से कोई बात न छिपा सकेंगे। (43) ऐ ईमान वालो, नमाज़ के निकट न जाओ जिस समय कि तुम नशे में हो यहाँ तक कि समझने लगो जो तुम कहते हो, और न उस समय जब स्नान की आवश्यकता हो परन्तु रास्ता चलते हुए, यहाँ तक कि स्नान कर लो। और यदि तुमको बीमारी हो या यात्रा में हो या तुममे से कोई शौच के स्थान से आये या तुम औरतों के पास गये हो फिर तुमको पानी न मिले तो तुम पवित्र मिट्टी से तयम्मुम (पवित्र मिट्टी से चेहरे और हाथ मलना) कर लो और अपने चेहरे और हाथों का मसह कर लो, निस्सन्देह अल्लाह दया करने वाला क्षमा करने वाला है।

(44) क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिनको किताब से हिस्सा मिला था। वह पथभ्रष्टता को खरीद रहे हैं और चाहते हैं कि तुम भी मार्ग से भटक जाओ। (45) अल्लाह तुम्हारे शत्रुओं को भली-भाँति जानता है। और अल्लाह पर्याप्त है समर्थन के लिए और अल्लाह पर्याप्त है सहायता के लिए। (46) यहूदियों में से एक दल शब्द को उसके स्थान से हटा देता है और कहता है कि हमने सुना और न माना। और कहते हैं कि सुनो और तुम्हें सुनवाया न जाये (अग्रचे कि तुम सुनाने योगय नहीं हो)। वह अपनी जीभ को मोड़ कर कहते हैं राईना (हमारा चरवाह), दीन (धर्म) में दोष लगाने के लिए है। और यदि वह कहते कि हमने सुना और माना, और सुनो और हम पर ध्यान दो तो यह उनके लिए अधिक बेहतर और उपयुक्त होता, परन्तु अल्लाह ने उनकी अवज्ञा के कारण उन पर फटकार कर दी है। अतः वह ईमान न लायेंगे परन्तु बहुत कम।

(47) ऐ वह लोगो! जिनको किताब दी गई इस पर ईमान लाओ जो हमने उतारा है, पुष्टि करने वाली उस किताब की जो तुम्हारे पास है, इससे पहले कि हम चेहरों को मिटा दें फिर उनको उलट दें पीठ की ओर या उन पर फटकार करें जैसे हमने फटकार की सब्त (शनिचर) वालों पर। और अल्लाह का आदेश पूरा होकर रहता है। (48) निस्सन्देह अल्लाह इसको क्षमा नहीं करेगा कि उसके साथ साझेदार किये जाएं। लेकिन इसके अतिरिक्त जो कुछ है उसको जिसके लिए चाहेगा क्षमा कर देगा। और जिसने अल्लाह का साझीदार ठहराया उसने बड़ा तूफान बाँधा।

(49) क्या तुमने देखा उनको जो अपने आप को पवित्र कहते हैं। बल्कि अल्लाह ही पवित्र करता है जिसको चाहता है, और उनपर तनिक भी अत्याचार न होगा। (50) देखो, यह अल्लाह पर कैसा झूठ बाँध रहे हैं और स्पष्ट पाप होने के लिए यही पर्याप्त है।

(51) क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्हें किताब से हिस्सा मिला था, वह जिब्त (जादू/काल्पनिक चीज़ें) और ताग्त (शैतान और गंदी आत्माएं) को मानते हैं और अवज्ञाकारियों के सम्बन्ध में कहते हैं कि वह ईमान वालों से अधिक सही रास्ते पर हैं। (52) यही लोग हैं जिन पर अल्लाह ने फटकार की है और जिस पर अल्लाह फटकार करे, तुम उसका कोई सहायक न पाओगे। (53) क्या अल्लाह की सत्ता में कुछ इनका भी हस्तक्षेप है। फिर तो ये लोगों को एक तिल बराबर कुछ भी कुछ न दे। (54) क्या ये लोगों पर ईष्र्या कर रहे हैं इस आधार पर, जो अल्लाह ने उनको अपनी कृपा से दिया है। अतः हमने इब्राहीम के अनुयायियों को किताब और हिक्मत (विवेक) दी है और हमने उनको बड़ा साम्राज्य भी दे दिया है।

(55) उनमें से किसी ने इसको माना और कोई उससे रूका रहा और ऐसों के लिए नरक की भड़कती हुई आग काफ़ी है। (56) निस्सन्देह जिन लोगों ने हमारी निशानियों को झुठलाया उनको हम तीव्र आग में डालेंगे। जब उनके शरीर की त्वचा जल जायेगी तो हम उनकी त्वचा को बदलकर दूसरी कर देंगे ताकि वह यातना भोगते रहें। निस्सन्देह अल्लाह शक्तिशाली है, तत्वदर्शी है। (57) और जो लोग ईमान लाये और भले कर्म किए उनको हम बाग़ों में प्रवेश देंगे जिसके नीचे नहरें बहती होंगी, उसमें वह सदैव रहेंगे, वहाँ उनके लिए सुथरी पत्नियाँ होंगी और उनको हम घनी छाया में रखेंगे।

(58) अल्लाह तुमको आदेश देता है कि अमानतें उनके हक़दार्रो को पहुँचा दो। और जब लोगों के बीच फैसला करो तो न्याय के साथ फैसला करो। अल्लाह अच्छी नसीहत करता है तुमको, निस्सन्देह अल्लाह सुनने वाला, देखने वाला है। (59) ऐ ईमान वालो, अल्लाह का आज्ञापालन करो और रसूल (सन्देष्टा) का आज्ञापालन करो और अपने में अधिकार प्राप्त व्यक्ति का आज्ञापालन करो। फिर यदि तुम्हारे बीच किसी चीज़ में मतभेद हो जाये तो उसको अल्लाह और रसूल की ओर लौटाओ, यदि तुम अल्लाह पर और परलोक के दिन पर विश्वास रखते हो। यह बात अच्छी है और इसका परिणाम बेहतर है। (60) क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो दावा करते हैं कि वह ईमान लाये हैं उस पर जो उतारा गया है तुम्हारी ओर, और जो उतारा गया है तुमसे पहले, वह चाहते हैं कि मामला (वाद) ले जायें शैतान की ओर, हालाँकि उनको आदेश हो चुका है कि वह उसको न मानें, और शैतान चाहता है कि उनको बहकाकर बहुत दूर डाल दे।

(61) और जब उनसे कहा जाता है कि आओ अल्लाह की उतारी हुई किताब की ओर और रसूल की ओर तो तुम देखोगे कि कपटाचारी तुमसे कतरा जाते हैं। (62) फिर उस समय क्या होगा जब उनके अपने हाथों कि लाई हुई मुसीबत उन पर पहुँचेगी, उस समय ये तुम्हारे पास कसमें (सौगंध) खाते हुए आयेंगे कि अल्लाह कि क़सम, हम तो मात्र भलाई और मिलाप के इच्छुक थे। (63) उनके दिलों में जो कुछ है अल्लाह उससे भली-भाँति परिचित है। अतः तुम उनसे बचो और उनको नसीहत करो और उनसे ऐसी बात कहो जो उनके दिलों में उतर जाये।

(64) और हमने जो रसूल (सन्देष्टा) भेजा, इसीलिए भेजा कि अल्लाह के आदेश अनुसार उसका आज्ञापालन किया जाये। और यदि वह, जबकि उन्होंने अपना बुरा किया था, तुम्हारे पास आते और अल्लाह से क्षमा चाहते और रसूल भी उनके लिए क्षमा चाहता तो अवश्य वह अल्लाह को क्षमा करने वाला दया करने वाला पाते। (65) अतः तेरे पालनहार की सौगन्ध, वह कभी ईमान वाले नहीं हो सकते जब तक वह अपने आपसी झगड़े में तुमको अपना निर्णायक पंच न मान लें। फिर जो फैसला तुम करो उस पर अपने दिलों में कोई तंगी (संकुचित) न पायें और उसको प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लें। (66) और यदि हम उनको आदेश देते कि अपने आप की हत्या करो या अपने घरों से निकलो तो उनमें से थोडे ही उस पर अमल करते। और यदि यह लोग वह करते जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है तो उनके लिए यह बात बेहतर और ईमान पर अटल रखने वाली होती।

(67) और उस समय हम उनको अपने पास से बड़ा बदला देते,

(68) और उनको सीधा रास्ता दिखाते। (69) और जो अल्लाह और रसूल का आज्ञापालन करेगा, वह उन लोगों के साथ होगा जिनको अल्लाह ने पुरस्कृत किया, अर्थात पैग़म्बर और सिद्दीक़ (सच्चे) और शहीद और सदाचारी। कैसा अच्छा है उनका साथ। (70) यह कृपा है अल्लाह की ओर से और अल्लाह का ज्ञान पर्याप्त है।

(71) ऐ ईमान वालो, अपनी सावधानी कर लो फिर निकलो अलग-अलग या एकत्र होकर। (72) और तुममें कोई ऐसा भी है जो देर लगा देता है। फिर यदि तुमको कोई मुसीबत पहुँचे तो वह कहता है कि अल्लाह ने मुझ पर कृपा की कि मैं उनके साथ न था। (73) और यदि तुमको अल्लाह की कोई कृपा प्राप्त हो तो कहता है। मानो तुम्हारे और उसके बीच प्रेम का सम्बन्ध ही नहीं-कि काश मैं भी उनके साथ होता तो बड़ी सफलता प्राप्त करता। (74) अतः चाहिए कि अल्लाह के मार्ग में युद्ध करें वह लोग, जो परलोक के बदले सांसारिक जीवन को बेच देते हैं। और जो व्यक्ति अल्लाह के मार्ग में लड़े, फिर मारा जाये या विजय प्राप्त करे तो हम उसको बड़ा बदला देंगे। (75) और तुमको क्या हुआ कि तुम युद्ध नहीं करते अल्लाह के मार्ग में और उन निर्बल मर्दों और औरतों और बच्चों के लिए जो कहते हैं कि ऐ हमारे पालनहार, हमको इस बस्ती से निकाल जिसके वासी अत्याचारी हैं और हमारे लिए अपने पास से कोई समर्थक पैदा कर दे और हमारे लिए अपने पास से कोई सहायक खड़ा कर दे। (76) जो लोग ईमान वाले हैं वह अल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं। और जो अवज्ञाकारी हैं वह शैतान के मार्ग में लड़ते हैं। अतः तुम शैतान के साथियों से लड़ो। निस्सन्देह शैतान की चाल बहुत कमज़ोर है।

(77) क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिनसे कहा गया था कि अपने हाथ रोके रखो और नमाज़ स्थापित करो और ज़कात (निर्धारित दान) दो। फिर जब उनको युद्ध का आदेश दिया गया तो उनमें से एक समूह मनुष्यों से ऐसा डरने लगा जैसे अल्लाह से डरना चाहिए या उससे भी अधिक, वह कहते हैं ऐ हमारे पालनहार, तूने हमपर युद्ध क्यों अनिवार्य कर दिया। क्यों न छोड़े रखा हमको थोड़े और समय तक। कह दो कि सांसारिक लाभ थोड़ा है और परलोक बेहतर है उसके लिए जो परहेज़गारी करे, और तुम्हारे साथ तनिक भी अत्याचार न होगा। (78) और तुम जहाँ भी होगे मौत तुमको पा लेगी यद्यपि सशक्त दुर्ग (कि़ला) में हो, यदि उनको कोई भलाई पहुँचती है तो कहते हैं कि यह अल्लाह की ओर से है यदि उनको कोई बुराई पहुँचती है तो कहते हैं कि यह तुम्हारे कारण से है। कह दो कि सब कुछ अल्लाह की ओर से है। उन लोगांे को क्या हुआ है कि लगता है कि कोई बात ही नहीं समझते। (79) तुमको जो भलाई भी पहुँचती है, अल्लाह की ओर से पहुँचती है और तुमको जो बुराई पहुँचती है वह तुम्हारे अपने ही कारण से हैं। और हमने तुमको मनुष्यों की ओर पैग़म्बर बना कर भेजा है और अल्लाह की गवाही पर्याप्त है।

(80) जिसने रसूल (सन्देष्टा) का आज्ञापालन किया, उसने अल्लाह का आज्ञापालन किया और जो उल्टा फिरा तो हमने उनपर तुमको संरक्षक बनाकर नहीं भेजा है (81) और यह लोग कहते हैं कि हमको स्वीकार है। फिर जब तुम्हारे पास से निकलते हैं तो उनमें से एक समूह उसके विरुद्ध परामर्श करता है जो वह कह चुका था। और अल्लाह उनकी कानाफूसियों को लिख रहा है। अतः तुम उनसे बचो और अल्लाह पर भरोसा रखो, और अल्लाह भरोसे के लिए पर्याप्त है। (82) क्या यह लोग क़ुरआन पर विचार नहीं करते, यदि यह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की ओर से होता तो वह इसके अन्दर बहुत विराधाभास पाते। (83) और जब उनको कोई बात शान्ति या भय की पहुँचती है तो वह उसको फैला देते हैं। और यदि वह उसको रसूल (सन्देष्टा) तक या अपने उत्तरदायी साथियों तक पहुँचाते तो उनमें से जो लोग जाँच करने वाले हैं वह उसकी वास्तविकता जान लेते। और यदि तुम पर अल्लाह की कृपा और उसकी दया न होती तो कुछ लोगों के अतिरिक्त तुम सब शैतान के पीछे लग जाते।

(84) अतः लड़ो अल्लाह के मार्ग में। तुमपर अपने आपके अतिरिक्त किसी का दायित्व नहीं और ईमान वालों को उभारो। आशा है कि अल्लाह अवज्ञाकारियों का बल तोड़ दे और अल्लाह बड़ा शक्तिशाली और बहुत कठोर दण्ड देने वाला है। (85) जो व्यक्ति किसी अच्छी बात के पक्ष में कहेगा उसके लिए उसमें से हिस्सा है और जो उसके विरोध में कहेगा उसके लिए उसमें से हिस्सा है और अल्लाह हर चीज़ की क्षमता रखने वाला है। (86) और जब कोई तुमको दुआ दे (अभिवादन करे) तो तुम भी दुआ दो उससे अच्छी या उलट कर वही कह दो, निस्सन्देह अल्लाह हर चीज़ का हिसाब लेने वाला है। (87) अल्लाह ही उपास्य है, उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं। वह तुम सबको कि़यामत के दिन एकत्र करेगा जिसके आने में कोई सन्देह नहीं। और अल्लाह की बात से बढ़कर सच्ची बात और किसकी हो सकती है।

(88) फिर तुमको क्या हुआ है कि तुम कपटाचारियों के मामले में दो पक्ष हो रहे हो। हालाँकि अल्लाह ने उनके कृत्यों के कारण उनको उल्टा फेर दिया है। क्या तुम चाहते हो कि उनको मार्ग पर लाओ जिनको अल्लाह ने भटका दिया है। और जिसको अल्लाह भटका दे, तुम कदापि उसके लिए कोई मार्ग नहीं पा सकते। (89) वह चाहते हैं कि जिस तरह उन्होंने अवज्ञा की है तुम भी अवज्ञा करो, ताकि तुम सब समान हो जाओ। अतः तुम उनमें से किसी को मित्र न बनाओ जब तक वह अल्लाह के मार्ग में हिज़रत (प्रवास) न करें। फिर यदि वह इसको स्वीकार न करें तो उनको पकड़ो और जहाँ कहीं उनको पाओ उनकी हत्या करो और उनमें से किसी को मित्र और सहायक न बनाओ। (90) परन्तु वह लोग जिनका सम्बन्ध किसी ऐसी क़ौम (समूह) से हो जिनके साथ तुम्हारी सन्धि है या वह लोग जो तुम्हारे पास इस स्थिति में आयें कि उनके सीने तंग हो रहे हैं तुम्हारे युद्ध से और अपनी क़ौम के युद्ध से। और यदि अल्लाह चाहता तो उनको तुम पर वर्चस्व दे देता तो वह अवश्य तुमसे लड़ते। अतः यदि वह तुमको छोड़े रहें और तुमसे युद्ध न करें और तुम्हारे साथ समझौते का मामला करें तो अल्लाह तुमको भी उनके विरुद्ध किसी आक्रमण की अनुमति नहीं देता। (91) दूसरे कुछ ऐसे लोगों को भी तुम पाओगे जो यह चाहते हैं कि वह तुमसे भी शान्तिपूर्वक रहे और अपनी क़ौम से भी शान्तिपूर्वक रहें। जब कभी वह उपद्रव का अवसर पायें वह उसमें कूद पड़ते हैं। ऐसे लोग यदि तुमसे एकाग्र न रहें और तुम्हारे साथ सुलह का व्यवहार न रखं और अपने हाथ न रोकें तो तुम उनको पकड़ो और उनको मारो जहाँ कहीं पाओ। यह लोग हैं जिनके विरुद्ध हमने तुमको स्पष्ट तर्क दिया है।

(92) और ईमान वाले का काम नहीं कि वह ईमान वाले की हत्या करे परन्तु यह कि भूलवश ऐसा हो जाये। और जो व्यक्ति किसी ईमान वाले की भूल से हत्या कर दे तो वह एक ईमान वाले दास को स्वतन्त्र करे और मृतक के उत्तराधिकारियों को खून बहा (हत्या का अर्थदण्ड) दे सिवाय यह कि वह क्षमा कर दें। फिर मृतक यदि ऐसी क़ौम में से था जो तुम्हारी दुश्मन है और वह स्वयं ईमान वाले था तो वह एक ईमान वाले दास को स्वतन्त्र करे। और यदि वह ऐसी क़ौम से था कि तुम्हारे और उसके बीच सन्धि है तो वह उसके उत्तराधिकारियों को खून बहा (हत्या का अर्थदण्ड) दे और एक ईमान वाले को स्वतन्त्र करे। फिर जिसको (दास स्वतन्त्र करने की क्षमता) प्राप्त न हो तो वह निरन्तर दो महीने के रोज़े रखे। यह तौबा है अल्लाह की ओर से। और अल्लाह जानने वाला विवेकशील है।

(93) और जो व्यक्ति किसी ईमान वाले की जानबूझ कर हत्या करे तो उसका दण्ड नरक है जिसमें वह सदैव रहेगा और उस पर अल्लाह का क्रोध और उसकी फटकार है और अल्लाह ने उसके लिए बड़ी यातना तैयार कर रखा है।

(94) ऐ ईमान वालो जब तुम अल्लाह के मार्ग में यात्रा करो तो अच्छी तरह जाँच लिया करो और जो व्यक्ति तुमको सलाम (शान्ति की कामना) करे, उसको यह न कहो कि तू ईमान वाले नहीं। तुम सांसारिक जीवन का सामान चाहते हो तो अल्लाह के पास बहुत अधिक उत्तम वस्तुएं हैं। तुम भी पहले ऐसे ही थे। फिर अल्लाह ने तुमपर कृपा की, तो जाँच कर लिया करो। जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे भिज्ञ है। (95) समान नहीं हो सकते अकारण बैठे रह जाने वाले ईमान वाले और वह ईमान वाले जो अल्लाह के मार्ग में लड़ने वाले हैं अपने माल और जान से। माल और जान से युद्ध करने वालों का दर्जा (स्तर) अल्लाह ने बैठे रहने वालों की तुलना में ऊँचा कर रखा है और प्रत्येक से अल्लाह ने भलाई का वादा किया है। और अल्लाह ने जेहाद (धर्म युद्ध) करने वालो को बैठे रहने वालो पर बदले में बड़ी बड़ाई दी है। (96) उनके लिए अल्लाह की ओर से बड़े दर्जे (पद) हैं और माफ़ी और दया है। और अल्लाह माफ़ी प्रदान करने वाला दया करने वाला है।

(97) जो लोग अपना बुरा कर रहे हैं, जब उनके प्राण फ़रिश्ते निकालेंगे तो वह उनसे पूछेंगे कि तुम किस हालत में थे। वह कहेंगे कि हम पृथ्वी में शक्तिहीन थे। फ़रिश्ते कहेंगे क्या अल्लाह की ज़मीन विस्तृत नहीं थी कि तुम प्रवास कर कहीं चले जाते। यह वे लोग हैं जिनका ठिकाना नरक है और वह बहुत बुरा ठिकाना है। (98) परन्तु वह विवश मर्द और औरतें और बच्चे जो कोई उपाय नहीं कर सकते और न कोई मार्ग पा रहे हैं, (99) यह लोग आशा है कि अल्लाह इन्हें क्षमा कर देगा और अल्लाह क्षमा करने वाला, दया करने वाला है। (100) और जो कोई अल्लाह के रास्ते में देश छोड़ेगा वह धरती में बहुत ठिकाने और बड़ी व्यापकता पायेगा और जो व्यक्ति अपने घर से अल्लाह और उसके रसूल की ओर हिजरत करके निकले, फिर उसको मृत्यु आ जाये तो उसका बदला अल्लाह के यहाँ

निर्धारित हो चुका और अल्लाह क्षमा करने वाला और दयावान है।

(101) और जब तुम धरती पर यात्रा करो तो तुम पर कोई पाप नहीं कि तुम नमाज़ में कमी करो, यदि तुमको भय हो कि अवज्ञाकारी तुमको सताएँगे। निस्सन्देह अवज्ञाकारी लोग तुम्हारे खुले हुए शत्रु हैं (102) और जब तुम ईमान वालों के बीच हो (युद्ध की स्थिति में) और उनके लिए नमाज़ पढ़ाने खड़े हो, तो चाहिए कि उनका एक समूह तुम्हारे साथ खड़ा हो और वह अपने हथियार लिए हुए हो। अतः जब वह सजदा कर चुके तो वह तुम्हारे पास से हट जाये और दूसरा समूह आये जिसने अभी नमाज़ नहीं पढ़ी है और वह तुम्हारे साथ नमाज़ पढ़े। और वह भी अपने बचाव का सामान और अपने हथियार लिए रहे। अवज्ञाकारी लोग चाहते हैं कि तुम अपने हथियारों और सामान से किसी तरह असावधान हो जाओ तो वह तुम पर अचानक टूट पड़ें। और तुम्हारे ऊपर कोई गुनाह नहीं यदि तुमको वर्षा के कारण कष्ट हो या तुम बीमार हो तो अपने हथियार उतार दो और अपने बचाव का सामान लिए रहो। निस्सन्देह अल्लाह ने अवज्ञाकारियों के लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है। (103) अतः जब तुम नमाज़ पढ़ लो तो अल्लाह को याद करो खड़े और बैठे और लेटे। फिर जब निश्चितता की स्थिति आ जाये तो नमाज़ नियम अनुसार पढ़ो, निस्सन्देह नमाज़ ईमान वालों पर नियत समय के साथ फ़र्ज (अनिवार्य) है।

(104) और क़ौम का पीछा करने से हिम्मत न हारो। यदि तुम दुख उठाते हो तो वह भी तुम्हारी तरह दुख उठाते हैं और तुम अल्लाह से वह आशा रखते हो जो आशा वह नहीं रखते। और अल्लाह जानने वाला, विवेकवाला है।

(105) निस्सन्देह हमने यह किताब तुम्हारी ओर तथ्यों के साथ उतारी है ताकि तुम लोगों के बीच उसके अनुसार फैसला करो जो अल्लाह ने तुमको दिखाया है। और विश्वासघात करने वाले लोगों की ओर से झगड़ने वाले न बनो। (106) और अल्लाह से क्षमा माँगो। निस्सन्देह अल्लाह क्षमा करने वाला दया करने वाला है। (107) और तुम उन लोगों की ओर से न झगड़ो जो अपने आप से विश्वासघात कर रहे हैं। अल्लाह ऐसे व्यक्ति को पसन्द नहीं करता जो विश्वासघात करने वाला और पापी हो। (108) वह मनुष्यों से लज्जित होते हैं और अल्लाह से लज्जित नहीं होते, हालाँकि वह उनके साथ होता है जबकि वह कानाफूसी करते हैं उस बात की जिससे अल्लाह प्रसन्न नहीं। और जो कुछ वह करते हैं अल्लाह उसको अपनी परिधि में लिये हुए है।

(109) तुम लोगो ने सांसारिक जीवन में तो उनकी ओर से झगड़ा कर लिया। परन्तु कि़यामत (परलोक) के दिन कौन उनके बदले अल्लाह से झगड़ा करेगा या कौन होगा उनका काम बनाने वाला। (110) और जो व्यक्ति बुराई करे अथवा अपने आप पर अत्याचार करे फिर अल्लाह से क्षमा माँगे तो वह अल्लाह को क्षमा करने वाला, दया करने वाला पायेगा। (111) और जो व्यक्ति कोई गुनाह करता है तो वह अपने ही लिए करता है और अल्लाह जानने वाला, विवेकशील है। (112) और जो व्यक्ति कोई भूल या गुनाह करे और फिर उसका आरोप किसी निर्दोष पर लगा दे तो उसने एक बड़ा लाँछन और खुला हुआ गुनाह अपने सिर ले लिया।

(113) और यदि तुमपर अल्लाह की कृपा और उसकी दया न होती तो उनमें से एक समूह ने तो निश्चय ही कर लिया था कि तुमको भटका कर रहेगा। हालाँकि वह अपने आप को भटका रहे हैं। वह तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकते। और अल्लाह ने तुमपर किताब और हिक्मत (सुन्नत/आदर्श) उतारी है और तुमको वह चीज़ सिखाई है जिसको तुम नहीं जानते थे और अल्लाह की कृपा है तुमपर बहुत बड़ी।

(114) इनकी अधिकतर कानाफूसियों में कोई भलाई नहीं। भलाई वाली कानाफूसी मात्र उसकी है जो दान करने को कहे या किसी भले काम के लिए कहे अथवा लोगों में संधि कराने के लिए कहे। जो व्यक्ति अल्लाह की प्रसन्नता के लिए ऐसा करे तो हम उसको बड़ा बदला देंगे। (115) परन्तु जो व्यक्ति रसूल (सन्देष्टा) का विरोध करेगा और ईमान वालों के मार्ग के अतिरिक्त किसी और मार्ग पर चलेगा, हालाँकि उसपर सन्मार्ग स्पष्ट हो चुका, तो उसको हम उसी ओर चलायेंगे जिधर वह स्वयं फिर गया और उसको नरक में प्रवेश करेंगे और वह बुरा ठिकाना है।

(116) निस्सन्देह अल्लाह इसको क्षमा नहीं करेगा कि उसका साझीदार ठहराया जाये और इसके अतिरिक्त वह दूसरे गुनाहों को क्षमा कर देगा जिसके लिए चाहेगा। और जिसने अल्लाह का साझीदार ठहराया वह भटककर बहुत दूर जा पड़ा। (117) वह अल्लाह को छोड़कर पुकारते हैं देवियों को और वह पुकारते हैं विद्रोही शैतान को। (118) उस पर अल्लाह ने फटकार की है। और शैतान ने कहा था कि मैं तेरे बन्दो से एक निश्चित हिस्सा लेकर रहूँगा। (119) मैं उनको बहकाऊँगा और उनको आशाएँ दिलाऊँगा और उनको सुझाऊँगा तो वह पशुओं के कान काटेंगे और उनको सुझाऊँगा तो वह अल्लाह की बनावट को बदलेंगे और जो व्यक्ति अल्लाह के अतिरिक्त शैतान को अपना मित्र एवं पथदर्शक बनाए तो वह ख़ुले हुए घाटे में पड़ गया। (120) वह उनसे वादे करता है और उनको आशाएँ दिलाता है, और शैतान के सभी वादे धोखे के अतिरिक्त और कुछ नहीं। (121) ऐसे लोगों का ठिकाना नरक है और वह उससे बचने का कोई मार्ग न पायेंगे।

(122) और जो लोग ईमान लाये और उन्होंने भले कर्म किए उनको हम ऐसे बाग़ों में प्रवेश करेंगे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, जिनमें वह सदैव रहेंगे। यह अल्लाह का सच्चा वादा है और अल्लाह से बढ़कर कौन अपनी बात में सच्चा होगा।

(123) न तुम्हारी अभिलाषाओं पर है और न किताब वालो की अभिलाषाओं पर। जो कोई भी बुरा करेगा उसका बदला पायेगा। और वह न पायेगा अल्लाह के अतिरिक्त अपना कोई समर्थक और न सहायक। (124) और जो व्यक्ति कोई भला कर्म करेगा, चाहे वह मर्द हो या औरत शर्त यह है कि वह मोमिन हो, तो ऐसे लोग जन्नत में प्रवेश करेंगे। और उन पर तनिक भी अत्याचार न होगा

(125) और उससे बेहतर किसका दीन (धर्म) है जो अपना चेहरा अल्लाह की ओर झुका दे और वह नेकी करने वाला हो। और वह चले इब्राहीम के दीन (धर्म) पर जो एकाग्रचित था। और अल्लाह ने इब्राहीम को अपना मित्र बना लिया था। (126) और अल्लाह का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती पर है और अल्लाह हर चीज़ को घेरे में लिये हुए है।

(127) और लोग तुमसे स्त्रियों के विषय में आदेश पूछते हैं। कह दो अल्लाह तुम्हे उनके सम्बन्ध में निर्देश देता है और (याद दिलाता है) वह आयतें भी जो तुम्हं किताब में उन अनाथ औरतों के बारे में पढ़कर सुनाई जाती हैं जिनको तुम वह नहीं देते जो उनके लिए लिखा गया है और चाहते हो कि उनको निक़ाह में ले आओ। और जो आदेश कमज़ोर बच्चों के सम्बन्ध में हैं यह कि अनाथों के साथ न्याय करो और जो भलाई तुम करोगे, वह अल्लाह को भली-भाँति ज्ञात है। (128) और यदि किसी औरत को अपने पति की ओर से दुव्र्यवहार या विमुखता का डर हो तो इसमें कोई हानि नहीं कि दोनांपरस्पर कोई समझौता कर लें और समझौता बेहतर है, और लालच मनुष्य के स्वभाव में बसा हुआ है। और यदि तुम अच्छा व्यवहार करो और धर्मपरयणता से काम लो तो जो कुछ तुम करोगे अल्लाह उससे भिज्ञ है। (129) और तुम कदापि औरतों को समान नहीं रख सकते यद्यपि तुम ऐसा करना चाहो। अतः पूर्णतः एक की ओर न झुक पड़ो कि दूसरी को लटकी हुई की तरह छोड़ दो। और यदि तुम सुधार कर लो और डरो तो अल्लाह क्षमा करने वाला, दयावान है। (130) और यदि दोनों अलग हो जायें तो अल्लाह प्रत्येक को अपनी व्यापकता से निश्चिंत कर देगा। और अल्लाह बड़ी व्यापकता वाला, विवेकवाला है।

(131) और अल्लाह का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती पर है। और हमने आदेश दिया है उन लोगो को जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गई और तुमको भी कि अल्लाह से डरो और यदि तुमने न माना तो अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है और अल्लाह बेनियाज़ (निस्पृह) है सभी सद्गुणों वाला है। (132) और अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती पर है और भरोसे के लिए अल्लाह काफ़ी है। (133) यदि वह चाहे तो तुम सबको ले जाये। ऐ लोगो, और दूसरो को ले आये। और अल्लाह इसकी क्षमता रखता है। (134) जो व्यक्ति सांसारिक पुण्य चाहता हो तो अल्लाह के पास सांसारिक पुण्य भी है और परलोक का पुण्य भी और अल्लाह सुनने वाला, देखने वाला है।

(135) ऐ ईमान वालो, न्याय पर भली-भाँति अडिग रहने वाले और अल्लाह के लिए गवाही देने वाले बनो, चाहे वह तुम्हारे या तुम्हारे माता-पिता या रिश्तेदारों के विरुद्ध हो। यदि कोई धनवान है या निर्धन तो अल्लाह तुमसे अधिक दोनो का हीतैषी है। अतः तुम इच्छाओं का अनुसरण न करो कि न्याय से हट जाओ। और यदि तुम हेर-फेर करोगे या अपना पहलू बचाओगे तो जो कुछ तुम कर रहे हो अल्लाह उससे भिज्ञ है।

(136) ऐ ईमान वालो, ईमान लाओ अल्लाह पर और उसके रसूल (सन्देष्टा) पर और उस किताब पर जो उसने अपने रसूल (सन्देष्टा) पर उतारी और उस किताब पर जो उसने पहले उतारी है। और जो व्यक्ति इन्कार करे अल्लाह का और उसके फ़रिश्तों का और उसकी किताबों का और उसके रसूलों का और परलोक के दिन का तो वह भटककर दूर जा पड़ा। (137) निस्सन्देह जो लोग ईमान लाये फिर इन्कार किया, फिर ईमान लाये फिर इन्कार किया, फिर इन्कार में बढ़ते गये तो अल्लाह उनको कदापि क्षमा न करेगा और न उनका मार्गदर्शन करेगा। (138) कपटाचारियों को शुभ-सूचना दे दो कि उनके लिए एक कष्टप्रद यातना है। (139) वह लोग जो ईमान वालों को छोड़कर अवज्ञा करने वालों को मित्र बनाते हैं, क्या वह उनके पास सम्मान ढूँढ रहे हैं, तो सम्मान सारा अल्लाह के लिए है।

(140) और अल्लाह अपनी किताब में तुम पर यह आदेश उतार चुका है कि जब तुम सुनो कि अल्लाह की निशानियों को झुठलाया जा रहा है और उनका उपहास किया जा रहा है तो तुम उनके साथ न बैठो यहाँ तक कि वह दूसरी बात में व्यस्त हो जायें। अन्यथा तुम भी उन्ही जैसे होगे। अल्लाह कपटाचारियों को और अवज्ञाकारियां को नरक में एक स्थान पर एकत्र करने वाला है। (141) वह कपटाचारी तुम्हारे लिए प्रतीक्षा में रहते हैं। यदि तुमको अल्लाह की ओर से कोई विजय प्राप्त होती है तो वह कहते हैं कि क्या हम तुम्हारे साथ न थे। और यदि अवज्ञाकारियों को कोई हिस्सा मिल जाये तो उनसे कहेंगे कि क्या हम तुम्हारे विरुद्ध लड़ने की क्षमता न रखते थे और फिर भी हमने तुमको ईमान वालों से बचाया। तो अल्लाह ही तुम लोगों के बीच परलोक के दिन फैसला करेगा और अल्लाह कदापि अवज्ञाकारियों को ईमान वालो पर कोई रास्ता नहीं देगा।

(142) कपटाचारी अल्लाह के साथ धोखेबाजी कर रहे हैं, हालाँकि अल्लाह ही ने उनको धोखे में डाल रखा है। और जब वह नमाज़ के लिए खड़े होते हैं तो आलस्य के साथ खड़े होते हैं मात्र लोगो को दिखाने के लिए। और वह अल्लाह को कम ही याद करते हैं। (143) वह दोनों (विश्वास और अविश्वास) के बीच लटक रहे हैं, न इधर हैं और न उधर। और जिसको अल्लाह भटका दे, तुम उसके लिए कोई मार्ग नहीं पा सकते। (144) ऐ ईमान वालो मोमिनों को छोड़कर सत्य का इनकार करने वालों को अपना मित्र न बनाओ। क्या तुम चाहते हो कि अपने ऊपर अल्लाह की खुली हुज्जत (स्पष्टतर्क) कायम कर लो। (145) निस्सन्देह कपटाचारी नरक के सबसे नीचे के वर्ग में होंगे और तुम उनका कोई सहायक न पाओगे। (146) हाँ, जो लोग तौबा करें और अपना सुधार कर लें और अल्लाह को दृढ़तापूर्वक पकड़ ले और अपने दीन (धर्म) को अल्लाह के लिए विशेष कर लें तो यह लोग ईमान वालों के साथ होंगे और अल्लाह ईमान वालो को बड़ा पुण्य देगा। (147) अल्लाह तुमको यातना देकर क्या करेगा, यदि तुम आभारी बनो और ईमान लाओ। अल्लाह बड़ा गुणग्राही (सम्मान करने वाला) हैं सब कुछ जानने वाला है।

(148) अल्लाह अपशब्द कहने को पसन्द नहीं करता अतिरिक्त इसके कि जिस पर अत्याचार हुआ हो और अल्लाह सुनने वाला, जानने वाला है। (149) यदि तुम भलाई को प्रकट करो या उसको छिपाओ या किसी बुराई को क्षमा करो तो अल्लाह क्षमा करने वाला, क्षमता रखने वाला है। (150) जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों (सन्देष्टाओं) को झुठला रहे हैं और चाहते हैं कि अल्लाह और उसके रसूलों (सन्देष्टाओं) के बीच अंतर करें और कहते हैं कि हम किसी को मानेंगे और किसी को न मानेंगे। और वह चाहते हैं कि उसके बीच में एक रास्ता निकालें। (151) ऐसे लोग पक्के अवज्ञाकारी हैं और हमने अवज्ञाकारियों के लिए अपमान जनक यातना तैयार कर रखी है। (152) और जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों (सन्देष्टाओं) पर ईमान लायें और उनमें से किसी में अन्तर न करें, उनको अल्लाह अवश्य उनका बदला उनको देगा और अल्लाह क्षमा करने वाला और दयावान है।

(153) किताब वाले (यहूदी एवं ईसाई) तुमसे यह माँग करते हैं कि तुम उनपर आसमान से एक किताब उतार लाओ। तो मूसा से वह इससे बड़ी अपराधजनक माँग कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि हमें अल्लाह का प्रत्यक्ष दर्शन करा दो। अतः उनके इस अत्याचार के कारण उनपर बिजली टूट पड़ी थी। फिर खुली निशानी आ चुकने के पश्चात उन्होंने बछड़े को उपास्य बना लिया। फिर हमने उससे क्षमा कर दिया। और मूसा को हमने खुली हुज्जत (स्पष्ट तर्क) दे दिया। (154) और हमने उनके ऊपर तूर पहाड़ को उठाया उनसे वचन लेने के लिए। और हमने उनसे कहा कि दरवाज़े में प्रवेश करो सिर झुकाये हुए और उनसे कहा कि सब्त (शनिवार) के मामले में अन्याय न करना। और हमने उनसे दृढ़ वचन लिया।

(155) उनको जो दण्ड मिला वह इस पर कि उन्होंने अपने वचन को तोड़ा और इस पर कि उन्होंने अल्लाह की निशानियों को झुठलाया और इस पर कि उन्होंने पैग़म्बरों की अनधिकृत रूप हत्या की और इस बाते के कहने पर कि हमारे दिल तो बन्द हैं—बल्कि अल्लाह ने उनकी अवज्ञा के कारण उनके दिलों पर मुहर लगा दी है तो वह कम ही ईमान लाते हैं (156) और उनकी अवज्ञा पर और मरियम पर बड़ा तूफान बाँधने (आरोप लगाना) पर (157) और उनके इस कहने पर कि हमने मरियम के बेटे मसीह, अल्लाह के रसूल (सन्देष्टा) की हत्या कर दी—हालाँकि उन्होंने न उनकी हत्या की और न सूली पर चढ़ाया बल्कि मामला उनके लिए संदिग्ध कर दिया गया। और जो लोग इसमें मतभेद कर रहे हैं वह इसके सम्बन्ध में सन्देह में पड़े हुए हैं। उनको इसका कोई ज्ञान नहीं, वह मात्र अटकल (अनुमान) पर चल रहे हैं। और निस्सन्देह उन्होंने उसकी हत्या नहीं की। (158) बल्कि अल्लाह ने उसको अपनी ओर उठा लिया और अल्लाह प्रभत्वशाली और तत्वदर्शी है।

(159) और किताब वालो (यहूदी व ईसाई) में से कोई ऐसा नहीं जो उसकी मृत्यु से पहले उस पर ईमान न ले आये और कि़यामत (परलोक) के दिन वह उन पर गवाह होगा। (160) अतः यहूदियों के अत्याचार के कारण हमने वह पवित्र चीज़ें उन पर अवैध कर दीं जो उनके लिए वैध थीं। और इस कारण से कि वह अल्लाह के मार्ग से बहुत रोकते थे।

(161) और इस कारण कि वह ब्याज लेते थे हालाँकि इससे उन्हें मना किया गया था और इस कारण से कि वह लोगों का माल अनधिकृत रूप से खाते थे और हमने उनमें से अवज्ञाकारियों के लिए कष्टप्रद यातना तैयार कर रखी है। (162) परन्तु उनमें जो लोग ज्ञान में परिपक्व और सत्यपरायण हैं वह ईमान लाये हैं उस पर जो तुम्हारे ऊपर उतारा गया है, और जो तुमसे पहले उतारा गया और वह नमाज़ पढ़ने वाले हैं और ज़कात देने वाले हैं और अल्लाह पर और कि़यामत के दिन पर ईमान रखने वाले हैं। ऐसे लोगों को हम अवश्य बड़ा बदला देंगे।

(163) हमने तुम्हारी ओर वह्य (श्रुति) भेजी है जिस तरह हमने नूह और उसके बाद के पैग़म्बरों की ओर वह्य भेजी थी। और हमने इब्राहीम और इस्माईल और इस्हाक और याकूब और याकूब की सन्तान और ईसा और अय्यूब और यूनुस और हारून और सुलेमान की ओर वह्य भेजी थी। और हमने दाऊद को ज़बूर दी। (164) और हमने ऐसे रसूल (सन्देष्टा) भेजे जिनके विवरण हम तुमको पहले सुना चुके हैं और ऐसे रसूल भी जिनके विवरण हमने तुमको नहीं सुनाये। और मूसा से अल्लाह ने बात की।

(165) अल्लाह ने रसूलों (सन्देष्टाओं) को शुभ सूचना देने वाले और डराने वाला बनाकर भेजा ताकि रसूलों (सन्देष्टाओं) के बाद लोगों के पास अल्लाह की तुलना में कोई तर्क शेष न रहे। और अल्लाह प्रभावशाली और तत्वदर्शी है।

(166) परन्तु अल्लाह गवाह है उस पर जो उसने तुम्हारे ऊपर उतारा है कि उसने इसको अपने ज्ञान के साथ उतारा है, और फ़रिश्ते भी गवाही देते हैं यद्यपि अल्लाह गवाही के लिए पर्याप्त है। (167) जिन लोगों ने झुठलाया और अल्लाह के रास्ते से रोका, वह भटक कर बहुत दूर निकल गये। (168) जिन लोगों ने झुठलाया और अत्याचार किया उनको अल्लाह कदापि क्षमा न करेगा और न ही उनको कोई रास्ता दिखायेगा

(169) नरक के अतिरिक्त, जिसमें वह सदैव रहेंगे। और अल्लाह के लिए यह आसान है। (170) ऐ लोगो, तुम्हारे पास रसूल (सन्देष्टा) आ चुका तुम्हारे पालनहार की स्पष्ट वाणी लेकर। अतः मान लो ताकि तुम्हारा भला हो। और यदि न मानोगे तो अल्लाह का है जो कुछ आकाशों में और पृथ्वी पर है और अल्लाह जानने वाला, विवेकशील है।

(171) ऐ किताब वालो (यहूदी व ईसाई) अपने दीन (धर्म) में अतिशयोक्ति न करो और अल्लाह के सम्बन्ध में कोई बात सत्य के अतिरिक्त न कहो। मरियम के बेटे ईसा तो मात्र अल्लाह के एक रसूल (सन्देष्टा) और उसका एक कलिमा (वाक्य) हैं जिसको उसने मरियम की ओर भेजा और उसकी ओर से एक आत्मा हैं। अतः अल्लाह और उसके रसूलों (सन्देष्टाओं) पर ईमान लाओ और यह न कहो कि अल्लाह तीन हैं। बाज़ आ जाओ, यही तुम्हारे लिए बेहतर है। उपास्य तो मात्र एक अल्लाह ही है। वह पवित्र है कि उसके सन्तान हो। उसी का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती पर है और अल्लाह ही काम बनाने के लिए पर्याप्त है। (172) मसीह को कदापि अल्लाह का बन्दा बनने में अपमान न होगा और न निकट रहने वाले फ़रिश्तों को अपमान होगा और जो अल्लाह की बन्दगी से लज्जा करेगा और घमण्ड करेगा तो अल्लाह अवश्य सबको अपने पास एकत्र करेगा। (173) फिर जो लोग ईमान लाये और जिन्होंने भले कर्म किये तो उनको वह पूरा-पूरा बदला देगा और अपनी कृपा से उनको अतिरिक्त भी देगा। और जिन लोगों ने तिरस्कार और घमण्ड किया होगा उनको कष्टप्रद यातना देगा। (174) और वह अल्लाह की तुलना में न किसी को अपना मित्र पायेंगे और न सहायक।

(175) ऐ लोगो, तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से एक तर्क आ चुका है और हमने तुम्हारे ऊपर एक स्पष्ट प्रकाश उतार दिया।

(176) अतः जो लोग अल्लाह पर ईमान लाये और उसको दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया उनको अवश्य अल्लाह अपनी दया और कृपा में प्रवेश देगा और उनको अपनी ओर सीधा रास्ता दिखायेगा। (177) लोग तुमसे आदेश पूछते हैं। कह दो अल्लाह तुमको कलालः (वह मृतक जिसके न माँ-बाप जीवित हां और न सन्तान) के सम्बन्ध में आदेश बताता है। यदि कोई व्यक्ति मर जाये और उसकी कोई सन्तान न हो और उसके एक बहन हो तो उसके लिए उसके छोड़े माल का आधा है। और वह मर्द उस बहन का वारिस होगा यदि उस बहन के कोई सन्तान न हो। और यदि दो बहने हों तो उनके लिए उसके छोड़े हुए माल का दो तिहाई होगा। और यदि अनेक भाई-बहिन, मर्द-औरतं हों तो एक मर्द के लिए दो औरतों के बराबर हिस्सा है। अल्लाह तुम्हारे लिए बयान करता है, ताकि तुम न भटको और अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है।

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