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सूरः हूद – Surah Hud

अल्लाह के नाम से जो बहुत कृपाशील, अत्यन्त दयावान है।

(1) अलिफ0 लाम0 रा0 यह किताब है जिसकी आयतें पहले दृढ़ की र्गइं फिर एक सर्वव्यापीए सर्वज्ञ हस्ती की ओर से उनकी व्याख्या की गई। (2) कि तुम अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की उपासना न करो। मैं तुमको उसकी ओर से डरानेवाला और शुभ सूचना देने वाला हूँ। (3) और यह कि तुम अपने पालनहार से क्षमा चाहो और उसकी ओर पलट आओ, वह तुमको एक अवधि तक अच्छा जीवन व्यतीत कराएगा और प्रत्येक

अधिक हकदार को अपनी ओर से अधिक प्रदान करेगा। और यदि तुम फिर जाओ तो मैं तुम्हारे पक्ष में एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ। (4) तुम सबको अल्लाह की ओर पलटना है और उसको हर चीज़ की सामथ्र्य प्राप्त है।

(5) देखो, यह लोग अपने सीनों को लपेटते हैं ताकि उससे छिप जायें। सचेत रहो, जब वह कपड़ों से अपने आप को ढ़ाँकते हैं, अल्लाह जानता है जो कुछ वह छिपाते हैं और जो वह प्रकट करते हैं। वह दिलां तक की बात का जानने वाला है।

(6) और धरती पर कोई चलने वाला ऐसा नहीं जिसकी जीविका अल्लाह के जिम्मे न हो। और वह जानता है जहाँ कोई ठहरता है और जहाँ वह सौंपा जाता है। सब कुछ एक स्पष्ट किताब में दर्ज है।

(7) और वही है जिसने आकाशों और धरती की छः दिनों में रचना की। और उसका सिंहासन पानी पर था, ताकि तुम्हारी परीक्षा ले कि कौन तुममे अच्छा काम करता है। और यदि तुम कहो कि मरने के बाद तुम लोग उठाये जाओगे तो झुठलाने वाले कहते हैं यह तो खुला हुआ जादू है। (8) और यदि हम कुछ समय तक उनके दण्ड को रोक दंे तो कहते हैं कि क्या चीज़ उसको रोके हुए है। सचेत रहो, जिस दिन वह उन पर आ पड़ेगा तो वह उनसे वापस न किया जा सकेगा और उनको घेरेगी वह चीज़ जिसका वह उपहास कर रहे थे।

(9) और यदि हम मनुष्य को अपनी कोई कृपा प्रदान करते है फिर उससे उसको वंचित कर देते हैं तो वह निराश और कृतघ्न हो जाता है। (10) और यदि किसी दुख के बाद जो उसको पहुँचा था, उसको हम उपकृत करते हैं तो वह कहता है कि समस्त विपत्तियाँ मुझसे दूर हो गयीं, वह इतराने वाला और अकड़ने वाला बन जाता है। (11) परन्तु जो लोग

धैर्य रखने वाले और भले कर्म करने वाले हैं, उनके लिए माफ़ी है और बड़ा प्रतिदान है।

(12) कहीं ऐसा न हो कि तुम उस चीज़ का कुछ भाग छोड़ दो जो तुम्हारी ओर वह्य की गई है। और तुम इस बात पर संकुचित हृदय हो कि वह कहते हैं कि इसपर कोई ख़जाना (कोष) क्यो नहीं उतारा गया या इसके साथ कोई फ़रिश्ता (देवदूत) क्यो नहीं आया। तुम तो मात्र डराने वाले हो और अल्लाह हर चीज़ का जि़म्मेदार है। (13) क्या वह कहते हैं कि सन्देष्टा ने इस किताब को गढ़ लिया है। कहो, तुम भी ऐसी ही दस सूरः बना कर ले आओ और अल्लाह के अतिरिक्त जिसको बुला सको बुला लो, यदि तुम सच्चे हो। (14) अतः यदि वह तुम्हारा कहा पूरा न कर सकें तो समझ लो कि ये अल्लाह के ज्ञान से उतारा गया है और यह कि उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं, फिर क्या तुम आदेश मानते हो।

(15) जो लोग सांसारिक जीवन और उसका सौन्दर्य चाहते हैं, हम उनके कर्मों का बदला संसार ही में दे देते हैं। और उसमें उनके साथ कोई कमी नहीं की जाती। (16) यही लोग हैं जिनके लिए परलोक में आग के अतिरिक्त कुछ नहीं है। उन्होंने संसार में जो कुछ बनाया था वह नष्ट हुआ और व्यर्थ गया जो उन्होंने कमाया।

(17) तो एक व्यक्ति जो अपने पालनहार की ओर से एक प्रमाण पर है, उसके बाद अल्लाह की ओर से उसके लिए एक गवाह भी आ गया, और उससे पूर्व मूसा की किताब मार्गदर्शक और कृपा के रूप में मौजूद थी, ऐसे ही लोग इसपर ईमान लाते हैं और समूहों में से जो कोई इसको झुठलाये तो उसके वादे की जगह आग है। तो तुम इसके सम्बन्ध में किसी सन्देह में न पड़ो। यह सत्य है तुम्हारे पालनहार की ओर से परन्तु

अधिकतर लोग नहीं मानते।

(18) और उससे बढ़कर अत्याचारी कौन है जो अल्लाह पर झूठ गढ़े। ऐसे लोग अपने पालनहार के समक्ष प्रस्तुत होंगे और गवाही देने वाले कहेंगे कि यह वह लोग हैं जिन्होंने अपने पालनहार पर झूठ गढ़ा था। सुनो, अल्लाह की फ़टकार है अत्याचारियों के ऊपर। (19) उन लोगों के ऊपर जो अल्लाह के मार्ग से लोगों को रोकते हैं और उसमें टेढ़ ढूँढते हैं। यही लोग परलोक को झुठलाने वाले हैं। (20) वह लोग पृथ्वी पर अल्लाह को विवश करने वाले नहीं और न अल्लाह के अतिरिक्त उनका कोई सहायक है, उनपर दुगनी यातना होगी। वह न सुन सकते थे और न देखते थे। (21) यह वह लोग हैं जिन्होंने अपने आप को घाटे में डाला। और वह सब कुछ उनसे खो गया। जो उन्होंने गढ़ रखा था। (22) इसमें सन्देह नहीं कि यही लोग परलोक में सबसे अधिक घाटे में रहेंगे।

(23) जो लोग ईमान (आस्था) लाये और जिन्होंने भले कर्म किये और अपने पालनहार के समक्ष नम्रता प्रकट की, वही लोग स्वर्ग वाले हैं। वह उसमें सदैव रहेंगे। (24) उन दोनांे पक्षों का उदाहरण ऐसा है जैसे एक

अन्धा और बहरा हो और दूसरा देखने और सुनने वाला। क्या ये दोनां समान हो जायेंगे। क्या तुम विचार नहीं करते।

(25) और हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा कि मैं तुमको स्पष्ट डराने वाला हूँ। (26) यह कि तुम अल्लाह के अतिरिक्त किसी की उपासना न करो। मुझे तम्हारे विषय में एक कष्टप्रद यातना के दिन का भय है। (27) उसकी क़ौम के सरदारो ने कहा, जिन्होंने झुठलाया था कि हम तो तुमको मात्र अपने जैसा एक मनुष्य देखते हैं। और हम नहीं देखते कि कोई तुम्हारा आज्ञाकारी हुआ हो सिवाय उनके जो हममे निमिन स्तरीय है, नासमझ बुद्धिहीन। और हम नहीं देखते कि तुमको हमारे ऊपर कोई श्रेष्ठता प्राप्त हो, बल्कि हम तो तुमको झूठा समझते है।

(28) नूह ने कहा ऐ मेरी क़ौम, बताओ यदि मैं अपने पालनहार की ओर से एक खुले प्रमाण पर हूँ और उसने मुझपर अपने पास से दयालुता भेजी है, परन्तु वह तुमको दिखाई नहीं दी तो क्या हम इसको तुमपर चिपका सकते हैं जबकि तुम इससे विमुख हो। (29) और ऐ मेरी क़ौम, मैं इसपर तुमसे कुछ सम्पत्ति नहीं माँगता। मेरा बदला तो मात्र अल्लाह के पास है और मैं कदापि उनको अपने से दूर करने वाला नहीं जो ईमान (आस्था) लाये हैं। इन लोगों को अपने पालनहार से मिलना है। परन्तु मैं देखता हूँ तुम लोग अज्ञानता में ग्रस्त हो। (30) और ऐ मेरी क़ौम, यदि मैं उन लोगों को अपने से दूर कर दूँ तो अल्लाह के अतिरिक्त कौन मेरी सहायता करेगा। क्या तुम चिन्तन नहीं करते। (31) और मैं तुमसे नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़जाने (कोष) हैं। और न मैं परोक्ष की सूचना रखता हूँ। और न यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ। और मैं यह भी नहीं कह सकता कि जो लोग तुम्हारी दृष्टि में नीच हैं, उनको अल्लाह कोई भलाई नहीं देगा। अल्लाह भली प्रकार जानता है जो कुछ उनके दिलों में है। यदि मैं ऐसा कहूँ तो मैं ही अत्याचारी हूँगा।

(32) उन्होंने कहा कि ऐ नूह, तुमने हमसे झगड़ा किया और बहुत झगड़ा कर लिया। अब वह चीज़ ले आओ जिसका तुम हमसे वादा करते रहे हो, यदि तुम सच्चे हो। (33) नूह ने कहा उसको तो तुम्हारे ऊपर अल्लाह ही लायेगा यदि वह चाहेगा और तुम उसके नियन्त्रण से बाहर न जा सकोगे। (34) और मेरा उपदेश तुमको लाभ नहीं देगा यदि मैं

तुमको उपदेश करना चाहूँ जबकि अल्लाह यह चाहता हो कि वह

तुमको भटका दे। वही तुम्हारा पालनहार है और उसी की ओर तुमको लौट कर जाना है।

(35) क्या वह कहते हैं कि सन्देष्टा ने इसको गढ़ लिया है। कहो कि यदि मैंने इसको गढ़ा है तो मेरा अपराध मेरे ऊपर है और जो अपराध तुम कर रहे हो, उससे मैं मुक्त हूँ।

(36) और नूह की ओर वह्य की गयी कि अब तुम्हारी क़ौम में से कोई ईमान नहीं लायेगा, सिवाय इसके जो ईमान ला चुका है। अतः तुम उन कर्मों पर दुखी न हो जो वह कर रहे हैं। (37) और हमारे समक्ष और हमारे आदेश से तुम नाव बनाओ और अत्याचारियों के पक्ष में मुझसे बात न करो, निस्सन्देह यह लोग डूबेंगे। (38) और नूह नाव बनाने लगा। और जब उसकी क़ौम का कोई सरदार उसपर गुज़रता तो वह उसका उपहास करता, उसने कहा यदि तुम हमपर हँसते हो तो हम भी तुमपर हँसेंगे। (39) तुम शीघ्र जान लोगे कि वह कौन हैं जिनपर वह प्रकोप आता है जो उसको अपमानित कर दे और जिसपर वह प्रकोप उतरता है वह टाला नहीं जा सकता।

(40) यहाँ तक कि जब हमारा आदेश आ पहुँचा और तूफान उबल पड़ा तो हमने नूह से कहा कि हर प्रकार के जानवरों का एक-एक जोड़ा नाव में रख लो और अपने घर वालों को भी, सिवाय उन लोगों के जिनके सम्बन्ध में पहले कहा जा चुका है और सभी ईमानवालों (आस्थावानों) को भी। और थोड़े ही लोग थे जो नूह के साथ ईमान लाये थे। (41) और नूह ने कहा कि नाव में सवार हो जाओ, अल्लाह के नाम से इसका चलना है और इसका ठहरना भी। निस्सन्देह मेरा पालनहार क्षमाशील, दयावान है। (42) और नाव पहाड़ जैसी लहरों के बीच उनको लेकर चलने लगी। और नूह ने अपने बेटे को पुकारा जो उससे अलग था। ऐ मेरे बेटे, हमारे साथ सवार हो जा और अवज्ञाकारियों के साथ मत रह। (43) उसने कहा कि मैं किसी पहाड़ की शरण ले लूँगा जो मुझको पानी से बचा लेगा। नूह ने कहा कि आज कोई अल्लाह के आदेश से बचाने वाला नहीं, परन्तु वह जिसपर अल्लाह दया करे। और दोनो के बीच लहर बाधक हो गयी और वह डूबने वालों में सम्मिलित हो गया। (44) और कहा गया कि ऐ धरती, अपना पानी निगल ले और ऐ आसमान थम जा। और पानी सुखा दिया गया। और मामले का निर्णय हो गया और नाव जूदी पहाड़ पर ठहर गयी और कह दिया गया दूर हो अत्याचारियों की क़ौम।

(45) और नूह ने अपने पालनहार को पुकारा और कहा कि ऐ मेरे पालनहार, मेरा बेटा मेरे घरवालों में से है, और निस्सन्देह तेरा वादा सच्चा है। और तू सबसे बड़ा शासक है। (46) अल्लाह ने कहा ऐ नूह, वह तेरे घरवालों में नहीं। उसके कर्म बुरे हैं। अतः मुझसे उस चीज़ के लिए प्रार्थना न करो जिसका तुम्हे ज्ञान नहीं। मैं तुमको उपदेश करता हूँ कि तुम अज्ञानियों में से न बनो। (47) नूह ने कहा कि ऐ मेरे पालनहार, मैं तेरा शरण चाहता हूँ कि तुझसे वह चीज़ माँगू जिसका मुझे ज्ञान नहीं। और यदि तू मुझे क्षमा न करे और मुझपर दया न करे तो मैं नष्ट हो जाऊँगा।

(48) कहा गया कि ऐ नूह, उतरो, हमारी ओर से सुरक्षित, और सलामती (कृपा) के साथ, तुमपर और उन समूहों पर जो तुम्हारे साथ हैं। और (उनसे उत्पन्न होने वाले) समूह कि हम उनको लाभ देंगे, फिर उनको हमारी ओर से एक कष्टप्रद यातना पकड़ लेगी। (49) यह परोक्ष की सूचनाएँ हैं जिनको हम तुम्हारी ओर भेज रहे हैं। इससे पहले न तुम इनको जानते थे और न तुम्हारी क़ौम। अतः धैर्य रखो निस्सन्देह अन्तिम परिणाम डरने वालों के लिए है।

(50) और आद की ओर हमने उनके भाई हूद को भेजा। उसने कहा कि ऐ मेरी क़ौम, अल्लाह की उपासना करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई उपास्य नहीं। तुमने मात्र झूठ गढ़ रखे हैं। (51) ऐ मेरी क़ौम, मैं इसपर तुमसे कोई बदला नहीं माँगता। मेरा बदला तो उसपर है जिसने मुझे पैदा किया है। क्या तुम नहीं समझते। (52) और ऐ मेरी क़ौम, अपने पालनहार से क्षमा चाहो, फिर उसकी ओर पलटो। वह तुम्हारे ऊपर प्रचुर वर्षा करेगा। वह तुम्हारी शक्ति पर शक्ति की अभिविद्धि करेगा। और तुम अपराधी होकर विमुखता न करो।

(53) उन्होंने कहा कि ऐ हूद, तुम हमारे पास कोई स्पष्ट निशानी लेकर नहीं आये हो, और हम तुम्हारे कहने से अपने उपास्यों को छोड़ने वाले नहीं हैं। और हम कदापि तुम लोगों को मानने वाले नहीं हैं। (54) हम तो मात्र यही कहेंगे कि तुम्हारे ऊपर हमारे उपास्यों में से किसी की मार पड़ गयी है। हूद ने कहा, मैं अल्लाह को गवाह ठहराता हूँ और तुम भी गवाह रहो कि मैं बरी हूँ उनसे जिनको तुम साझी करते हो। (55) उसके अतिरिक्त। अतः तुम सब मिलकर मेरे विरुद्ध षडयन्त्र करो, फिर मुझको अवसर न दो। (56) मैंने अल्लाह पर भरोसा किया जो मेरा पालनहार है और तुम्हारा पालनहार भी। कोई जीवधारी ऐसा नहीं जिसकी चोटी उसके हाथ में न हो। निस्सन्देह, मेरा पालनहार सीधे मार्ग पर है।

(57) यदि तुम विमुखता करते हो तो मैंने तुमको वह सन्देश पहुँचा दिया जिसको देकर मुझे तुम्हारी ओर भेजा गया था। और मेरा पालनहार तुम्हारे स्थान पर तुम्हारे अतिरिक्त किसी और समूह को उत्तराधिकारी (ख़लीफा) बनायेगा। तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे। निस्सन्देह मेरा पालनहार हर चीज़ पर संरक्षक है। (58) और जब हमारा आदेश आ पहुँचा, हमने अपनी दया से बचा लिया हूद को और उन लोगों को जो उसके साथ ईमान लाये थे। और हमने उनको एक कठोर यातना से बचा लिया। (59) और यह आद थे कि उन्होंने अपने पालनहार की निशानियों को झुठलाया। और उसके सन्देष्टाओं को न माना और प्रत्येक विद्रोही और विरोधी की बात का अनुसरण किया। (60) और उनके पीछे लानत (धिक्कार) लगा दी गई इस संसार में और परलोक के दिन। सुन लो, आद ने अपने पालनहार को झुठलाया। सुन लो, दूरी है आद के लिए जो हूद की क़ौम थी।

(61) और समूद की ओर हमने उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, ऐ मेरी क़ौम, अल्लाह की उपासना करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई उपास्य नहीं। उसी ने तुमको धर्ती से बनाया, और उसमें तुमको बसाया। अतः क्षमा चाहो, फिर उसकी ओर पलटो। निस्सन्देह मेरा पालनहार निकट है, स्वीकार करने वाला है। (62) उन्होंने कहा कि ऐ सालेह, इससे पहले हमको तुमसे आशा थी। क्या तुम हमको उनकी उपासना से रोकते हो जिनकी उपासना हमारे पूर्वज करते थे। और जिस चीज़ की ओर तुम हमको बुलाते हो, उसके सम्बन्ध में हमको बहुत सन्देह है और हम बड़ी दुविधा में हैं। (63) उसने कहा ऐ मेरी क़ौम, बताओ यदि मैं अपने पालनहार की ओर से, एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझको अपने पास से दयालुता दी है तो मुझको अल्लाह से कौन बचायेगा यदि मैं उसकी अवज्ञा करुँ। अतः तुम कुछ नहीं बढ़ाओगे सिवाय घाटे के।

(64) और ऐ मेरी क़ौम, यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है। अतः इसको छोड़ दो कि वह अल्लाह की भूमि में खाये। और इसको कोई कष्ट न पहुँचाओ, अन्यथा अतिशीघ्र तुमको यातना पकड़ लेगी।

(65) फिर उन्होंने उसके पाँव काट डाले। तब सालेह ने कहा कि तीन दिन और अपने घरों में लाभ उठा लो। यह एक वादा है जो झूठा न होगा। (66) फिर जब हमारा आदेश आ गया तो हमने अपनी दया से सालेह को और उन लोगों को जो उसके साथ ईमान लाये थे बचा लिया और उस दिन के अपमान से (सुरक्षित रखा)। निस्सन्देह तेरा पालनहार ही सर्वश्रेष्ठ और बड़ा शक्तिशाली है। (67) और जिन लोगो ने अत्याचार किया था, उनको एक भयानक आवाज ने पकड़ लिया। फिर सुबह को वह अपने घरों में औंधे पड़े रह गये। (68) जैसे कि वह कभी उनमें बसे ही नहीं। सुनो, समूद ने अपने पालनहार से अवज्ञा की। सुनो, फटकार है समूद के लिए।

(69) और इब्राहीम के पास हमारे फ़रिश्ते शुभ सूचना लेकर आये। कहा तुमपर सलामती हो। इब्राहीम ने कहा तुमपर भी सलामती हो। फिर अधिक समय न व्यतीत हुआ कि इब्राहीम एक भुना हुआ बछड़ा ले आया। (70) फिर जब देखा कि उनके हाथ खाने की ओर नहीं बढ़ रहे हैं तो वह खटक गया और दिल में उनसे डरा। उन्होंने कहा कि डरो नहीं, हम लूत की क़ौम की ओर भेजे गये हैं। (71) और इब्राहीम की पत्नी खड़ी थी, वह हँस पड़ी। अतः हमने उसको इस्हाक की शुभ सूचना दी और इस्हाक के आगे याकूब की। (72) उसने कहा, हाय मेरा हतभाग्य, क्या मैं बच्चे को जन्म दूँगी, जबकि मैं बूढ़ी हूँ और यह मेरा पति भी बूढ़ा है। यह तो बड़े आश्चर्य की बात है। (73) फ़रिश्तों ने कहा क्या तुम अल्लाह के आदेश पर आश्चर्य करती हो। इब्राहीम के घरवालो, तुमपर अल्लाह की कृपा और दयालुता है। निस्सन्देह अल्लाह अत्यन्त प्रशंसनीय और बड़ा वैभवशाली है।

(74) फिर जब इब्राहीम का भय दूर हुआ और उसको शुभ सूचना मिली तो वह हमसे लूत की क़ौम के बारे में झगड़ने लगा। (75) निस्सन्देह इब्राहीम बड़ा सहनशील और कोमल हृदय था और लीन (अल्लाह की ओर) था। (76) ऐ इब्राहीम, उसको छोड़ो। तुम्हारे पालनहार का आदेश आ चुका है और उनपर एक ऐसी यातना आने वाली है जो लौटायी नहीं जा सकती।

(77) और जब हमारे फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे तो वह घबराया और उनके आने से दिल संकुचित हुआ। उसने कहा आज का दिन बड़ा कठोर है। (78) और उसकी क़ौम के लोग दौड़ते हुए उसके पास आये। और वह पहले से बुरे कर्म कर रहे थे। लूत ने कहा ऐ मेरी क़ौम, यह मेरी बेटियाँ हैं, वह तुम्हारे लिए अधिक पवित्र हैं। अतः तुम अल्लाह से डरो और मुझको मेरे अतिथियों के समक्ष अपमानित न करो। क्या तुममे कोई भला व्यक्ति नहीं है। (79) उन्होंने कहा, तुम जानते हो कि हमको तुम्हारी बेटियों से कोई सरोकार नहीं, और तुम जानते हो कि हम क्या चाहते हैं।

(80) लूत ने कहा, काश मेरे पास तुमसे लड़ने की क्षमता होती या मैं जा बैठता किसी दृढ़ शरण में। (81) फ़रिश्तों ने कहा कि ऐ लूत, हम तेरे पालनहार के भेजे हुए हैं। वह कदापि तुमतक न पहुँच सकेंगे। अतः तुम अपने लोगों को लेकर कुछ रात रहते निकल जाओ। और तुममें से कोई मुड़कर न देखे, परन्तु तुम्हारी पत्नी कि उसपर वही कुछ घटित होने वाला है जो उन लोगों पर घटेगा। उनके लिए सुबह का समय नियत है, क्या सुबह का समय निकट नहीं। (82) फिर जब हमारा आदेश आया तो हमने उस बस्ती को तलपट कर दिया और उसपर पत्थर बरसाये कंकड के, लगातार। (83) तुम्हारे पालनहार के पास से निशान लगाये हुए। और वह बस्ती इन अत्याचारियों से कुछ दूर नहीं।

(84) और मदियन की ओर उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा कि ऐ मेरी क़ौम, अल्लाह की उपासना करो, उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई उपास्य नहीं। और नाप और तौल में कमी न करो। मैं तुमको अच्छी स्थिति में देख रहा हूँ, और मैं तुमपर एक घेर लेने वाले दिन की यातना से डरता हूँ। (85) और ऐ मेरी क़ौम, नाप और तौल को पूरा करो न्याय के साथ। और लोगों को उनकी चीज़ें घटाकर न दो। और धरती पर उपद्रव न मचाओ। (86) जो अल्लाह का दिया हुआ बच रहे, वह तुम्हारे लिए बेहतर है यदि तुम मोमिन (आस्थावान) हो। और मैं तुम्हारे ऊपर संरक्षक नहीं हूँ।

(87) उन्होंने कहा कि ऐ शुऐब, क्या तुम्हारी नमाज़ तुमको यह सिखाती है कि हम उन चीज़ों को छोड़ दें जिनकी उपासना हमारे पूर्वज (बाप-दादा) करते थे। या अपनी सम्पत्ति का अपनी इच्छा के अनुसार उपभोग करना छोड़ दें। बस तुम ही एक सत्यवादी और सदाचारी व्यक्ति हो।

(88) शोएब ने कहा कि ऐ मेरी क़ौम, बताओ, यदि मैं अपने पालनहार की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने अपनी ओर से मुझको अच्छी जीविका भी दी। और मैं नहीं चाहता कि मैं स्वयं वही काम करुँ जिससे मैं तुमको रोक रहा हूँ। मैं तो मात्र सुधार चाहता हूँ जहाँ तक हो सके। और मुझे सामथ्र्य तो अल्लाह ही से मिलेगा। उसी पर मैंने भरोसा किया है। और उसी की ओर मैं पलटता हूँ। (89) और ऐ मेरी क़ौम, ऐसा न हो कि मेरे विरूद्ध तुम्हारी हठधर्मी कहीं तुमपर वह विपित्ति न लेे आए जो नूह की क़ौम या हूद की क़ौम या सालेह की क़ौम पर आयी थीे, और लूत कि क़ौम तो तुमसे दूर भी नहीं। (90) और अपने पालनहार से क्षमा माँगो फिर उसकी ओर पलट आओ। निस्सन्देह मेरा पालनहार दयावान और स्नेहवाला है।

(91) उन्होंने कहा कि ऐ शुऐब, जो तुम कहते हो, उसका बहुत सा भाग हमारी समझ में नहीं आता। और हम तो देखते हैं कि तू हममे अशक्त है। और यदि तेरी बिरादरी न होती तो हम तुमको संगसार (पत्थरों से मार डालते) कर देते। और तुमको हमपर कुछ श्रेष्ठता नहीं। (92) शोएब ने कहा कि ऐ मेरी क़ौम, क्या मेरी बिरादरी तुमपर अल्लाह से अधिक शक्तिशाली है। और अल्लाह को तुमने पीछे छोड़ दिया। निस्सन्देह मेरे पालनहार के नियन्त्रण में है जो कुछ तुम करते हो। (93) और ऐ मेरी क़ौम, तुम अपने रीति के अनुसार कर्म किये जाओ और मैं अपनी रीति पर काम करता रहूँगा। शीघ्र ही तुमको ज्ञात हो जायेगा कि किसके ऊपर अपमानित करने वाली यातना आती है और कौन झूठा है। और प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करने वालो में हूँ। (94) और जब हमारा आदेश आया हमने शुऐब को और जो उसके साथ ईमान लाये थे, अपनी दया से बचा लिया। और जिन लोगों ने अत्याचार किया था, उनको कड़क ने पकड़ लिया। अतः वह अपने घरामें में मुँह के बल पड़े रह गये। (95) मानों कि वह कभी उनमें बसे न थे। सुनो, फटकार है मदयन को जैसे फटकार हुई थी समूद को।

(96) और हमने मूसा को अपनी निशानियों और स्पष्ट प्रमाण के साथ भेजा। (97) फिरऔन और उसके सरदारों की ओर। फिर वह फिरऔन के आदेश पर चले, अग्रचे फिरऔन का आदेश उचित न था। (98) कियामत (उठाये जाने) के दिन वह अपनी क़ौम के आगे होगा और वह उनको आग पर पहुँचायेगा। और कैसा बुरा घाट है जिसपर वह पहुँचेंगे। (99) और इस संसार में उनके पीछे फटकार लगा दी गयी और कियामत के दिन भी। कैसा बुरा पुरस्कार है जो उनको मिला।

(100) यह बस्तियों के कुछ विवरण हैं जो हम तुमको सुना रहे हैं। उनमें से कुछ बस्तियाँ अब तक मौजूद हैं और कुछ मिट गयीं। (101) और हमने उनपर अत्याचार नहीं किया बल्कि उन्होंने स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया। फिर जब तेरे पालनहार का आदेश आ गया तो उनके उपास्य उनके कुछ काम न आये जिनको वह अल्लाह के अतिरिक्त पुकारते थे। और उन्होंने उनके पक्ष में विनाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं बढ़ाया।

(102) और तेरे पालनहार की पकड़ ऐसी ही है जबकि वह बस्तियों को उनके अत्याचार पर पकड़ता है। निस्सन्देह उसकी पकड़ कष्टप्रद और कठोर है। (103) इसमें इन लोगों के लिए निशानी है जो परलोक की यातना से डरें। वह एक ऐसा दिन है जिसमें सब लोग एकत्र होंगे। और वह उपस्थिति का दिन होगा। (104) और हम इसको एक अवधि के लिए टाल रहे हैं जो निर्धारित है। (105) जब वह दिन आयेगा तो कोई व्यक्ति उसकी अनुमति के बिना बात न कर सकेगा। अतः उनमें कुछ अभागे होंगे और कुछ भाग्यवान।

(106) अतः जो लोग अभागे हैं वह आग में होंगे। उनको वहाँ चीखना और चिल्लाना है। (107) वह उसमें रहेंगे जबतक आकाश और पृथ्वी मौजूद है, परन्तु जो तेरा पालनहार चाहे। निस्सन्देह तेरा पालनहार कर डालता है जो चाहता है। (108) और जो लोग भाग्यवान है। वह स्वर्ग में होंगे, वह उसमें रहेंगे जबतक आकाश और पृथ्वी मौजूद है, परन्तु जो तेरा पालनहार चाहे, कृपा है अन्तहीन। (109) अतः तू उन वस्तुओं से सन्देह में न रह जिनकी यह लोग उपासना कर रहे हैं। यह तो बिलकुल उसी प्रकार उपासना कर रहे हैं जिस प्रकार उनसे पहले उनके बाप-दादा इबादत कर रहे थे। और हम उनका हिस्सा उन्हें पूरा-पूरा देंगे बिना किसी कमी के।

(110) और हमने मूसा को किताब दी। फिर उसमें फूट पड़ गयी। और यदि तेरे पालनहार की ओर से पहले ही एक बात न आ चुकी होती तो उनके बीच निर्णय कर दिया जाता। और उनको उसमें सन्देह है जो उन्हें सन्तुष्ट होने नहीं देता। (111) और निश्चित रूप से तेरा पालनहार प्रत्येक को उसके कर्मों का पूरा बदला देगा। वह भिज्ञ है उससे जो वह कर रहे हैं।

(112) तो तुम दृढ़ रहो जैसा कि तुमको आदेश दिया गया है और वह भी जिन्होंने तुम्हारे साथ क्षमा-याचना की है और सीमा से न बढ़ो, निस्सन्देह वह देख रहा है जो कुछ तुम करते हो। (113) और उनकी ओर न झुको जिन्होंने अत्याचार किया, अन्यथा तुमको आग पकड़ लेगी और अल्लाह के अतिरिक्त तुम्हारा कोई सहायक नहीं, फिर तुम कहीं सहायता न पाओगे। (114) और नमाज़ स्थापित करो दिन के दोनो हिस्सों में और रात के कुछ हिस्से में। निस्सन्देह भलाईयाँ दूर करती हैं बुराइयों को। यह संस्मरण है संस्मरण स्वीकार करने वालो के लिए। (115) और धैर्य रखो, अल्लाह भलाई करने वालों का बदला नष्ट नहीं करता।

(116) अतः क्यों न ऐसा हुआ कि तुमसे पहले की क़ौमों में ऐसे भलाई करने वाले होते जो लोगों को पृथ्वी पर उपद्रव करने से रोकते। ऐसे थोड़े लोग निकले जिनको हमने उनमें से बचा लिया। और अत्याचारी लोग तो उसी विलासता में रहे जो उन्हें प्राप्त थी और वह अपराधी थे। (117) और तेरा पालनहार ऐसा नहीं कि वह बस्तियों को अन्यायपूर्वक नष्ट कर दे, जबकि उसके वासी सुधार करने वाले हो।

(118) और यदि तेरा पालनहार चाहता तो लोगों को एक ही सम्प्रदाय (समूह) बना देता, परन्तु वह सदैव मतभेद में रहेंगे। (119) सिवाय उनके जिनपर तेरा पालनहार कृपा करे। और उसने इसीलिए उनको पैदा किया है। और तेरे पालनहार की बात पूरी हुई कि मैं नरक को जिनो और मनुष्यों से एकत्र करके भर दूँगा।

(120) और हम सन्देष्टाओं के विवरण में से सब बाते तुम्हे सुना रहे हैं, जो तुम्हारे दिल को दृढ़ करे। और उसमें तुम्हारे पास सत्य आया है और मोमिनों (आस्थावानों) के लिए उपदेश और संस्मरण। (121) और जो लोग ईमान नहीं लाये उनसे कहो कि तुम अपनी रीति पर करते रहो और हम अपनी रीति पर कर रहे हैं। (122) और प्रतीक्षा करो हम भी प्रतीक्षा में हैं। (123) और आसमानों और पृथ्वी की छुपी हुई बात अल्लाह के पास है और सभी मामलात उसी की ओर पलटेंगे। अतः तुम उसी की उपासना करो और उसी पर भरोसा रखो और तुम्हारा पालनहार उससे अनभिज्ञ नहीं जो तुम कर रहे हो।

Aafreen Seikh is an Software Engineering graduate from India,Kolkata i am professional blogger loves creating and writing blogs about islam.
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